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मैथिली लोकगीतमे भोजनक विन्यास डॉ. कैलाश कुमार मिश्र

मैथिली लोकगीतक संसार स्त्रीगणक संसार थिक। पुरुष पक्षक भूमिका गीत निर्माणक आओर किछु गीतक गायन तक सिमित अछि। मैथिलानी एक बेर अर्जित कयल गेल अमूर्त धरोहर जेनाँकि गीत-नाद, पाबनि-तिहार, विध-व्यवहार, व्रत-निष्ठा, कथा-पीहानी; अरिपन काढ़ब, ठांव निपब, कोबर लिखब; केथरी, सुजनी सीयब; सीकीसँ पौती-मौनी बुनब, माटिक महादेब, सामा-चकेबा, खेलोना, कोठी, चूल्हा आदि बनेबाक परंपरा कें अपन माय, पितियाईन, दाई, नानी, सासु आदिसँ सिखैत छथि आओर फेर अपन सभटा लुइरकें अपन बेटी, पूतहु, पोती, नातिन आदिकें नीक जेकाँ सिखाकS कलाकें एक पीढ़ीसँ दोसर पीढ़ीमे हस्तारंतरित करैत छथि। हस्तांतरण केर परंपरा अदौसँ आबि रहल अछि। हलांकि आधुनिकता आ उपभोक्तावादक युगमे एहि परंपराक पतन भेल जा रहल अछि परञ्च मूल भावमे थोर बहुत जोड़-तोड़क संग ई परंपरा अपन मिथिला समाजक महिला वर्गमे एखनो शाश्वत अछि।
आश्चर्य आ दुःख तखन होइत अछि जखन एहि समाजक स्त्रीगनक चर्चा होइत छैक। बहुत स्त्रीगन अपने सँ ई कहैत छथि जे “हम किछु नहि करैत छी, निठल्ली छी कियैक तँ (हाउसवाइफ) गृहणी छी। पुरुष वर्गमे बहुतो एहेन छथि, पुछला पर कहता – हमर कनियाँ किछु नहि करैत छथि। हलांकि ओकर बाद कहबाक तात्पर्य कें पूर्ण करैत जरुर करताह – “हमर आँगनसँ सहीमे मात्र गृहणी / हाउसवाइफ छथि”। औजी कहियो अपन आँगनबालीक भूमिकामे जीब कS देखियौ तखन पता लागत जे कतेक पैघ जवाबदेही कें निमाहि रहल छथि ! नहितँ कहियो छुट्टी, ने कहियो आराम, आने कहियो केओ मदति केनिहार ! आओर ताहि जवाबदेहिक मतलब किछु नहि ? ई एकटा बड्ड पैघ प्रश्न अछि एहि पर विचार जरुर करक चाही।
भोजन आ भोजनक विन्यास सभसँ पैघ आओर त्वरित आ शाश्वत कला अछि। एकटा कहबी छैक – “जे निक खैएत सैह नीक भोजन बनायेत”। इहो कहल जैत छैक जे जखन कुनो महिला सुचिता आ समर्पण कें भावसँ भाँनस करैत छथि तँ भोजन सुअदगर आ रुचिगर हेबेटा करत। यैह कारण छैक जे भगबान राम माता कौशल्या, सुमित्रा, कैकेई; सासु सुनयना; गुरुपत्नी अरुंधती, पत्नी सीता हिनका लोकनिक हाथक रान्हल भोजन खेलाह, मुदा जे स्वाद हुनका भीलनी सबरी के आंइठ बैरमे लगलनि तेहेन सुआद कत्तहुने लगलनि! ई भेल भोजन जे करा रहल अछि तकर अनुराग। आई तँ सब सुविधा – गैस, या आनो तरहक जारैन उपलब्ध अछि जाहिसँ चट्टहि भाँनस भअ जाइत अछि। कल्पना ओहि समयकें करू जखन साओन-भादबक मुसलाधार बरखामे खड़हक छप्पर चुबैत घरमे अपन सभक बहुतो गोटेके माय, पितियाईन, दाई कोन धरानी भाँनस करैत छली! जारैनमे भीजल चेरा, गोइठा, करची, झाँखी चुल्हामे घोंसिया कखनो मूंहसँ तS कखनो बियनि होंकि आंच पजारब, धुआंसँ आँखिमे नोर भरल आ तैयो रंग-बिरंगक पकमान आ भोजनक सचार। ताहूमे अगर घरमे केओ पैघ पाहून जेनांकि जमाय, समधि इत्यादि आबि गेलाह तS घोर बिकट, तथापि बिना मोन मलीन केने हुल्लसित मोनसँ भोजनक विन्यासमे लागि जैत छली। तरकारीक अभावमे बारीक़ साग, कंद, खम्हारु, ओल, लती-फत्तीक पात जेना कन्ना, तिलकोड़क पात; लटकल चारक सजमनि, कदीमा; झाड़क झीमनी, करैल; घर-पछुआरमे लागल गाछक फल जेनाँकि- केरा, कटहर आदिसँ चीज़ जोरिया कS अनेक तरहक तरकारी, तरुआ-बघरुआ, भुजिया-सन्ना-चटनी बनबैत छली तकरा बादो टारासँ नाना तरहक़ अंचार जाहिमे फारा, कुच्चा, खटमिट्ठीबला आदि ब्यंजन परोसि पाहूनक सत्कारमे १५-२० तरहक सचार लागि जैत छलै। आब पाहून भोजन पर बैसता आ महिला लोकनि गीत नहि गेती से कोना हेतैक तें बिनु थकने विहुँसैत मोनसँ दाई-माई सभकें संगौर कS गीत-नाद शुरू होइत छल। पाहून खाईतो रहैत छलाह आ गीतक आनंद लैत छलाह। जखन कखनो हमसब कोनो पांच सितारा होटल भोजन करैत छी आ कोनो गीतगैन गबैत देखैत छी तS होइत अछि जे एहिसँ बढ़ियाँ कोरसमे गीत-नादक गीतगैन हमरा सभक समाजक महिला गबैत छथि। वैह खानसामा, वैह परोसय बाली, वैह गीत गेनिहारि, वैह वस्तुक व्यवस्था केनिहारि। मल्टीटास्किंग कें अहिसँ पैघ उदाहरण भला आर की भS सकैत अछि ।
पहिने समय में लोक बिबाह स पहिने ई जानय चाहैत छल जे जाहि घर में बेटीक बिबाह भ रहल अछि ओहि घरक चीनबार कहेन छैक। मतलब कतेक साफ़-सफाई, कुन-कुन तरहक बरतन-बासन, कुन द्रव्य केर बरतन-बासन, इत्यादि। भोजन कहेन हो, लोक के भोजनक विन्यास, दुखक भोजन, सुखक भोजन, पाबनि-तिहारक भोजन, यात्रा में जएबाक काल बाट में खेबा बला भोजन, खाद्य भोजन, अखाद्य भोजन, पथ्य बला भोजन, कुन समय में की खाई की नहि खाई, इत्यादि सब बातक जानकारी अगर सही अर्थ में विवेचन करी आ विभिन्न अवसर पर मैथिलानी सब द्वारे गैल गीत सबके देखी त पता चलत जे ओ सब केवल विधपुरौआ या मनोरंजन बला गीत नहि अछि अपितु ज्ञान के खान अछि। ओहि गीत में ज्ञान, विज्ञान, संस्कार, सामग्रीक वर्णन आ विवरण सब किछु समाविष्ट अछि।
मैथिली में अगर अंग्रेजीक शब्द culture के अनुबाद कैल जै त हमरा हिसाबे ओ शब्द जे culture के सब स समीप अछि मैथिली में ओ थिक “मिथिलाम”। ई मिथिलाम अछि जे मैथिल के भारते नहि अपितु समस्त संसार में अलग पहचान दैत अछि। आ मिथिलाम केर चर्चा बिना, भोजन विन्यास, बिना महिला सबहक भूमिका, बिना गीत-नाद आ विध-व्यवहार के संभव नहि अछि. वस्तुतः भोजन विन्यास, गीत-नाद, विध-व्यबहार, जीवन जीबाक अंदाज़, वस्त्र विन्यास, धर्मक आचरण आ प्रकृति आ संस्कृति में समन्वय केर नाम भेल मिथिलाम।
बात भोजन विन्यास के क रहल छी त कनिक मिथिलाक इतिहास के देख पडत।
ज्योतिरीश्वर वर्णरत्नाकर मे ११म् शताब्दीक  मिथिलाक भोजन विन्यास पर प्रकाश देलनि अछि। हिनका अनुसारेँ मिथिलाक प्रमुख भोजन भात, दालि, तरकारी, चूडा, दही, शक्कर, फल तथा दूध छल। ज्योतिरीश्वर अपन दोसर पोथी प्राकृति-पैँगलम् मे कहैत छथि जे “ओ गृहणी धन्य छथि जे अपन पति केँ केराक पात पर भात आ घीक भोजन करबैत छथि”। एहि पोथी मे रंग रंगक माँछ रान्हव आ तरकारी बनेवाक विधि सेहो लिखल अछि। वर्णरत्नाकर मे जे मिथिलाक प्राचीन परम्परागत भोजन समिग्रिक जे सूची प्रस्तुत कैल गेल अछि ताहि मे “चौर, चूडा, मुंगवा, लडुबी, सरुआरि, माँठ, फ़ेना, मधुकूप्पी, तिलबा, सिरोल, खिरसा, सिरनी, झिल्ली, फरही, भूजा, मोतीचूड़, अमृतकुंड आदिक उल्लेख अछि| ई भोजन मे दही केँ प्रधानता सेहो दैत गेल अछि।
आब लोकगीत पर अबैत छी. लोकगीत के भीतर फकरा, पीहानी, गीत, लोककवित्त आदि सब किछु समाहित अछि। दुटा फकरा मैथिल समुदाय के भोजन विन्यास आ भोजन के प्रति आसक्ति के प्रदर्शित करबाक लेल पर्याप्त अछि:
पहिल : मिथिलाक भोजन तीन/ कदली, कबकब मीन।।
दोसर: तीन तीरहुतीया तेरह पाक। ककरो लेल चुडा दही ककरो लेल भात।।
अही दू के आधार बना सब विवरण के देखल जा सकैत अछि।
मिथिलाक भोजन तीन। कदली, कबकब मीन।।
एकर अर्थ भेल जे मिथिला के लोक लगभग सब निक स लक’ अधलाह उत्सव, काज-धज, संस्कार, पाबनि-तिहार धरि में केरा, ओल या ओले परिवारक आन कंद जेना कि खम्हरुआ; आ अंततः विविध प्रकारक माछके प्रयोग भोजन में अवश्य करैत छथि। बिबाह-दान, मुड़न, उपनयन, पाबनि तिहार सब में केराक प्रयोग हेबेटा करैत अछि. ओहुना केरा लोक पाकल, काँच आ केराक फुलक सेहो खेबाक लेल प्रयोग करैत छथि। केराक तरुआ, तरकारी, सत्यनारायण भगवानक कथा में घोरुआ प्रसाद आ ओहुना पाकल केराक प्रयोग शाश्वत अछि।
कबकब के बात करैत ई कहब जरुरी अछि जे ओल मिथिला में बहुत प्रिय अछि। एक फकरा में भादबक ओल केर बारे में कहल जैत छैक:
भादवक ओल की खै राजा आकि चोर
मिथिला आ माछ एक दोसरक पूरक अछि। पचदेवता के एकहि संगे उपासना करे बला मैथिल समाज जाहि में ब्राह्मण सेहो सम्मिलित छथि कुनो दिन आ कुनो मास माछ खेबा स परहेज नहि करैत छथि। माछ के जल-पड़ोर, जल-फूल आदि नाम स बजा कतेक गोटे त एकरा मांसाहारी भोजन के श्रेणी तक में नहि राखय चाहैत छथि। कातिक आ साबन मास में जखन लोक सामान्यतया मांसाहारी भोजन के त्यागि दैत छथि, अपन मैथिल अहू मास में खूब चटकार स माछ खाईत छथि। आ अहि मास में माछ खेबा बला लेल बैकुंठ में जगह बना दैत छथि:
कातिक मास जे गैंचा खाय। ससरि-फ़सरि बैकुंठे जाय।।
एक बारहमासा गीत एहेन भेटल जाहि में मिथला के पानि में उपलब्ध लगभग सब माछक वर्णन त अछिए ओकरा कोना बनाबी कथी खाई, कथी संगे खाई सब वर्णित अछि। अतबे नहि लगभग ७५% माछ जे मिथिलाक पानि में भेटैत अछि तकर वर्णन छैक। कनि एहि बरह्मासा के देखू:
मास हे सखि सरस अगहन भूजल चूड़ा संग यो। तरल चेचड़ा माछ कुरमुर लागय मोन भरि संग यो।। पूस हे सखि अन्न नवका संग मांगुर झोर यो। कबइ कुरमुर दाँत दबइत करय जनजन शोर यो।। माघ बदरी जाड़ थरथर काँपय तन बड़ जोर यो। सुख बोआरी खंड लखि कए मन विनोद विभोर यो।। मास फागुन मदक मातल बहय पछबा बसात यो। बढ़ल स्वादक माछ टेंगड़ा रान्हल सानल भात यो।। चैत हे सखि रोग सभदिस रूप नाना देखि यो। तरल भुन्ना पलइ रान्हल खाइत बड़ सुख लेखि यो।। मास हे सखि आबि पहुँचल गरम बड़ बइसाख यो। गेल मन रुचि माछ गामर खंड सभ दिन चाख यो।। जेठ हे सखि हे हेठ बरखा मुंड भाकुर पात यो। पड़तु बिसरतु आबि ससरतु कर नवका भात यो।। मेघ सखि बरसत अखाढ़ जत रसालक डारि यो। तोड़ि काँचे आम आमिल देल सौरा पाल यो।। मास हे सखि आओल साओन भरल अंडा घेंट यो। तरल दही माछ मारा खाथि भरि पेट यो।। माछ इचना भेटल कहुना खाय भरलहुँ कोठि यो। मास आसिन देवपूजा शंख घंटा नाद यो।। रान्हि रहुआ माछ बइसब पूर्ण भेल परसाद यो। मास कातिक बारि मरूआ बऽड़ तरल-अपूर्व यो।। पूरल बारहमास हरिनाथ गाओल सगर्व यो…
माछ के खेबाक वर्णन त अछिये माछक शिरा खेबाक परंपरा प्रबल सेहो। घरक मुखिया, पाहून, बरियाती आदि के शिरा भेटल त हुनकर उचित सत्कार भेल। निम्नलिखित फकरा एहि कथ्य के प्रमाणित करैत अछि:
शिरा खाय से मीरा। पूच्छी खाय गुलाम।।
जमाय जखन भोजन करक हेतु बैसति छथि त नाना तरहक गीत गाबि हुनका मनोरंजन कैल जैत अछि। एक डहकन जाहि में ओना त गारि देबाक परंपरा अछि मुदा गारिक संग-संग भोजन विन्यास के वर्णन सेहो अछि।
खाजा मूंगबा आर पिरिकिया
ता पर गरम सोहारी जी।
माजी के गारी पिताजी के गारी
आ बाबाजी के पढथि गारी जी।
पढु हे सारि हमरो के गारी
हम लेब देह के पसारी जी।।
एहि गीत में गारि त छैके जे डहकन के मूल प्रकृति छैक। मुदा गारि के संगे-संगे भोजन सामग्री – खाजा, मूंगबा, पुरुकिया, सोहारी आदिक विवरण सेहो छैक।
सामा-चकेबा में एक गीत में बहिन सब भोजनक बात करैत छथि:
साम-चको साम-चको अबिह हे अबिह हे।
जोतला खेत में बैसिह हे बैसिह हे।
लाले रंग पूरी पकबिह हे पकबिह हे।।
मिथिला में साग खेबाक परंपरा अदौ स अछि। अयाची मिश्रक जीवनवृत्त ककरा नहि बुझल छैक. मात्र ११ कट्ठा खेत में साग-पात कंद-मूल खाक जीवन यापन करैत छला, अध्ययन-अध्यापन करैत छलाह. कतेक बेर राजा बजेलखिन मुदा अपन गाम के गुरुकुल के छोडि कतहु नहि गेला। स्वयात संप्रभुता के सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करैत छलाह। माछक तुलना में साग के अधिक प्रधानता देबाक प्रथा मिथिला में सहज अछि। एक फकरा एहि बात के प्रमाणित करैत अछि:
माछ-भात पांच हाथ। साग-भात सात हाथ।।
विन्यास में साग के अलावे सागक आन चीज़ सब जेना अरिकोच, गुजिया, इत्यादि बनबैत छथि. खेसारी, बथुआ, केराव, चना, कर्मी, गेनहारी, पटुआ आदिक साग मिथिला लोक खाईत छथि। अपना ओतय साग तोडल नहि अपितु खोटल जैत अछि। कुनो भोज में साग एक महत्वपूर्ण तरकारी होइत अछि। मिथिलाक एहि परंपरा स प्रभावित होइत ठीके कहल गेल अछि:
कोकटा धोती पटुआ साग। तीरहुत गीत बड़े अनुराग।
भाव भरल तन तरुणी रूप। तैं त तिरहुत होइछ अनूप।।
अपन माटि स गुजरिया के अतेक सिनेह जे साग-पात खोंटि लेती, साग-भात खा लेती मुदा रहती मिथिले में:
साग-पात खोंटि- खोंटि दिवसों गेमेबै यौ हम मिथिले में रहबै
नहि चाही हमरा सुख-आराम यौ हम मिथिले में रहबै।।
तिलकोर आ कन्ना साग बिना की मिथिलाक पाहुनक सचार लागि सकैत अछि? चाउरक पीठार में डुबा शुद्ध सरिसबक तेल में छानल तिलकोर दुरो देस में रहनिहार मैथिल सबके जीभ में पानि आनि दैत अछि।
सजमनि, भाटा इत्यादि में अदौरी, त चाहबे करी तखन ने  भाटा-अदौरिक चहट्गर तरकारी बनत! भाटा के तरुआ, भटबर आर की-की नहि बनैत अछि। बारिक भाटा त बेर बिपत्ति के समय इज्जत रखैत अछि।
भांटा के भटबर, ठोपे के तेल। खेलक जमैया ठेलम ठेल।।
मिथिला के लोक के खिच्चरि में सेहो पापर, घी, दही, अचार, चटनी इत्यादि संग खाईत छथि. खिच्चरि में चारि बस्तु नहि त केहन खिच्चरि?
खिच्चरि के चार यार। घी पापर दही अचार।।
ई त भेल पद परन्तु सही अर्थ में खिच्चरि के छौ यार थिक: घी, पापर, दही, अचार, चटनी, तरुआ।
एक उचती गीत में जखन विवाहक बाद वर भोजन करवा लेल बैसैत छथि त सासु आ आन स्त्रीगन सब अपन गीत में व्यंजन केर वर्णन करैत छथि:
जाहि दिन राम जनकपुर अयला देखहु दुनिया के लोके
भाति-भाति के भोज्य लगाओल नयना बिनु परकारे जी
केरा नारियल खण्ड सोहारी परबल केर तरकारी जी
जीमय बैसला ओ चारू भाई परसथु प्रेम पीयारी जी //
दोसर उचती में बर के कृष्ण स्वरुप मानि किछु अहि तरहक विवरण भेटैत अछि:
खाजा खुरमा तपत जिलेबी तापर सक्त सुपाड़ी जी।
जेमय बैसला कृष्ण-कन्हाई सारि जे पढ़थिन गारि जी।।

भगबान कृष्णक बालकाल के एक भक्ति गीत में भोजनक किछु वर्णन भेटैत अछि:
करथि पुकार जशोदा माई मोहन प्रात नाहाई।
दही केरा गरम जिलेबी खोआ भोग लगाई।।

लोकगीत में भूख, निर्धनता, कुअन्न आदिक ऐतिहासिक संदर्भक वर्णन
लोकगीत लोकविद्या होइत अछि, लोकइतिहास होइत अछि। एहेन इतिहास जे अपन प्रमाणिकता एवं शैली के कारण जन-जन केर कंठ में लिखा जैत अछि। एहेन लिखान जकरा ने कुनो पानि गला सकैत अछि ने कुनो आगि जरा सकैत अछि आ ने कुनो कीड़ा खा सकैत अछि। एकबेर जनकंठ में रचि गेल त पीढ़ी-दर-पीढ़ी अबाध गति स चलैत रहैत अछि। मधुबनी ज़िला के शाहपुर गाम में एक जनमान्ध लोक कवि भेला। हुनकर नाम छलनि फतुरी लाल। फतुरी लाल एक बेर मिथिलाक भयानक अकाल के सामना केलनि आ अकाल के विभीषिकाक ह्रदयविदारक विवरण अपन कवित्त में केलनि। ओ रचना अकाल कवित्त के नाम स जानल जैत अछि। अब्राहम ग्रिएर्सन १८८७ ईस्वी में फतुरी लाल केर अकाल कवित्त हुनके मुहें सुनि क लिखलनि। एहि कवित्त में ई विवरण अछि जे भुखमरी केर अवस्था में लोक प्राणरक्षा हेतु की-की नहि करैत अछि। किछु पंक्ति मात्र देखला स दुखक असीम वेदनाक अनुभूति सहजे भ जैत छैक:
भेल धनतरि दुई फ़ासिल जग-राहडिऔर मकई।
अकाल पडल तिरहुति में भारी-तैं बही गेल हवा।
घर-घर मांगन करे नर नारी-फाँकि मकई केर लावा।
मालीक आउर महाजन सभ-कै-घर-घर ढेरीक अन्न।
लोक बुझओल ओहो तकै छथि मुंह्गा ऋणक शान।
सभै देखि बनियान सभ सनकल-डरें लगाओलक टट्टी।
सुन्न दोकान शहर में परि गेल-सुन्न भेल सभ चट्टी।
सूखल गात भात भौ लटपट-कतेक बात अब सहना।
नर नारी सभ सान तेआगल-बेकारी भेल अब गहना।।
बारहमासा एवं अन्य गीत में गरीबी के चित्रण करैत कोना कियोक महिला कम भोजन अथवा कुअन्न खा क दिन खेपैत छथि तकर मर्मस्पर्शी वर्णन कैल गेल अछि।  आई स करीब ३०-३५ सालक इतिहास में अगर जा सकी आ अपन मानस पटल पर वो स्थिति आ गरीबी के ऐना के रिफ्लेकशन जकां देख पाबी त सहज रूप में ई अनुमान लगा सकैत छी। एक बारहमासा एहेन भेटल जाहि में एक निर्धन महिला जिनकर पति परदेस गेल छथिन ओ केना अपन समय नितांत निर्धनता में बिता रहलि छथि तकर विवरण देल गेल अछि।
पूस गोइठा डाहि तापब माघ खेसारिक साग यो फागुन हुनका छिमरि माकरि चैत खेसारीक दालि यो बैशाख टिकुला सोहि राखब जेठ खेरहिक भात यो अखाढ़ गाड़ा गाड़ि खायब साओन कटहर कोब यो भादव हुनको आंठी पखुआ आसिन मडुआक रोटी यो कातिक दुख-सुख संगहि खेपब अगहन दुनू सांझ भात यो
उपरोक्त गीत में कोना एक महिला खेसारीक साग, खेसारीक दालि आमक टिकुला, खेरहिक उसिना, पाकल आमक गाड़ा, कटहरक कोआ, नेढा, आमक पखुआ, मडुआ रोटी, एक मास अनिश्चितता केर स्थिति आ अंततः अगहन में भात। कहू त कतेक सत्य के जे आई लगभग इतिहास भ चुकल अछि तकरा ई अपना मानस में रखने अछि मिथिलाक गीत-नाद।
गरीबीक बिपत्ति स मारलि आ असहाय विधवा कंद मूल आ कुअन्न बांसक ओधि स अपन टूटल मडैया में नीक स नीपल-पोतल चुलहा में पका रहल अछि। बांसक ओधि धुआंक घर होइत अछि। फटने ने फाटैत अछि। जरने ने जरैत अछि। ओहने विधवा के दुःख स द्रवित होइत बाबा “यात्री” लिखैत छथि:
बांसक ओधि उपारि करै छी जारनि…
हमर दिन की नै घुरतै जगतारिनि //
मैथिली लोकगीत में आयुर्वेद
लोकगीत लोकविद्या के अंग अछि। लोक विद्या के अनेक पक्ष वैज्ञानिक होइत अछि। कृषिकार्य एवं अन्य सब कार्य में डाक बचन कतेक सटीक अछि से हमरा लोकनि बहुत निक जकां बुझैत छी। बहुतो लोकगीत एहेन अछि जे कहेन अन्न अथवा भोज्य सामग्री सेहो कुन दिन, कुन मास में खेला स की भ सकैत अछि तकर बहुत तथ्यपरक जानकारी दैत अछि. गीत सुनब अथवा पढ़ब त लागत जेना आयुर्वेद के कुनो वैद्य के देल नुस्खा हो। हरेक गाछ आ हरेक भोज्य सामग्री में प्राचीन भारतीय परंपरा के अनुसार किछु-ने-किछु औषधि के तत्व छैक। भारतीय परम्परा में औषधि आ भोजन अलग-अलग चीज़ नहि छैक। ताहि अपना सबहक भोजन में पथ्य आ कुपथ्य के बात प्रबल मानल जैत अछि।
अपन शोधकार्य के अवधि में जखन मिथिला के गाम सब स गीतक संकलन करैत रही त एक गीत एहेन भेटल जे ओ ई बतबैत छल जे कुन दिन कथिक प्रयोग भोजन में करक चाही जाहि स तन आ मोन दुनु स्वस्थ्य रहत। ई वर्णन ज्योतिष विचार पर सेहो आधारित अछि।
रबि के पान सोम के दर्पण
मंगल के किछु धनियाँ चर्पण
बुध के गुड़ बृहस्पति राई
शुक्र कहे मोहे दही सुहाई
शनिबार जे अदरख खाई
कालौं काल कटति घर जाईं।।
ई त भेल कहिया की खेबाक चाही। एक एहेन गीत  भेटल जे बारहमासा के रूप में रचित गेल अछि। ई एक वैद्य जकां बहुत वैज्ञानिकता के आधार पर लिखल अछि। गीत मैथिली लोकगीतमे भोजनक विन्यास
डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
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मैथिली लोकगीतक संसार स्त्रीगणक संसार थिक। पुरुष पक्षक भूमिका गीत निर्माणक आओर किछु गीतक गायन तक सिमित अछि। मैथिलानी एक बेर अर्जित कयल गेल अमूर्त धरोहर जेनाँकि गीत-नाद, पाबनि-तिहार, विध-व्यवहार, व्रत-निष्ठा, कथा-पीहानी; अरिपन काढ़ब, ठांव निपब, कोबर लिखब; केथरी, सुजनी सीयब; सीकीसँ पौती-मौनी बुनब, माटिक महादेब, सामा-चकेबा, खेलोना, कोठी, चूल्हा आदि बनेबाक परंपरा कें अपन माय, पितियाईन, दाई, नानी, सासु आदिसँ सिखैत छथि आओर फेर अपन सभटा लुइरकें अपन बेटी, पूतहु, पोती, नातिन आदिकें नीक जेकाँ सिखाकS कलाकें एक पीढ़ीसँ दोसर पीढ़ीमे हस्तारंतरित करैत छथि। हस्तांतरण केर परंपरा अदौसँ आबि रहल अछि। हलांकि आधुनिकता आ उपभोक्तावादक युगमे एहि परंपराक पतन भेल जा रहल अछि परञ्च मूल भावमे थोर बहुत जोड़-तोड़क संग ई परंपरा अपन मिथिला समाजक महिला वर्गमे एखनो शाश्वत अछि।
आश्चर्य आ दुःख तखन होइत अछि जखन एहि समाजक स्त्रीगनक चर्चा होइत छैक। बहुत स्त्रीगन अपने सँ ई कहैत छथि जे “हम किछु नहि करैत छी, निठल्ली छी कियैक तँ (हाउसवाइफ) गृहणी छी। पुरुष वर्गमे बहुतो एहेन छथि, पुछला पर कहता – हमर कनियाँ किछु नहि करैत छथि। हलांकि ओकर बाद कहबाक तात्पर्य कें पूर्ण करैत जरुर करताह – “हमर आँगनसँ सहीमे मात्र गृहणी / हाउसवाइफ छथि”। औजी कहियो अपन आँगनबालीक भूमिकामे जीब कS देखियौ तखन पता लागत जे कतेक पैघ जवाबदेही कें निमाहि रहल छथि ! नहितँ कहियो छुट्टी, ने कहियो आराम, आने कहियो केओ मदति केनिहार ! आओर ताहि जवाबदेहिक मतलब किछु नहि ? ई एकटा बड्ड पैघ प्रश्न अछि एहि पर विचार जरुर करक चाही।
भोजन आ भोजनक विन्यास सभसँ पैघ आओर त्वरित आ शाश्वत कला अछि। एकटा कहबी छैक – “जे निक खैएत सैह नीक भोजन बनायेत”। इहो कहल जैत छैक जे जखन कुनो महिला सुचिता आ समर्पण कें भावसँ भाँनस करैत छथि तँ भोजन सुअदगर आ रुचिगर हेबेटा करत। यैह कारण छैक जे भगबान राम माता कौशल्या, सुमित्रा, कैकेई; सासु सुनयना; गुरुपत्नी अरुंधती, पत्नी सीता हिनका लोकनिक हाथक रान्हल भोजन खेलाह, मुदा जे स्वाद हुनका भीलनी सबरी के आंइठ बैरमे लगलनि तेहेन सुआद कत्तहुने लगलनि! ई भेल भोजन जे करा रहल अछि तकर अनुराग। आई तँ सब सुविधा – गैस, या आनो तरहक जारैन उपलब्ध अछि जाहिसँ चट्टहि भाँनस भअ जाइत अछि। कल्पना ओहि समयकें करू जखन साओन-भादबक मुसलाधार बरखामे खड़हक छप्पर चुबैत घरमे अपन सभक बहुतो गोटेके माय, पितियाईन, दाई कोन धरानी भाँनस करैत छली! जारैनमे भीजल चेरा, गोइठा, करची, झाँखी चुल्हामे घोंसिया कखनो मूंहसँ तS कखनो बियनि होंकि आंच पजारब, धुआंसँ आँखिमे नोर भरल आ तैयो रंग-बिरंगक पकमान आ भोजनक सचार। ताहूमे अगर घरमे केओ पैघ पाहून जेनांकि जमाय, समधि इत्यादि आबि गेलाह तS घोर बिकट, तथापि बिना मोन मलीन केने हुल्लसित मोनसँ भोजनक विन्यासमे लागि जैत छली। तरकारीक अभावमे बारीक़ साग, कंद, खम्हारु, ओल, लती-फत्तीक पात जेना कन्ना, तिलकोड़क पात; लटकल चारक सजमनि, कदीमा; झाड़क झीमनी, करैल; घर-पछुआरमे लागल गाछक फल जेनाँकि- केरा, कटहर आदिसँ चीज़ जोरिया कS अनेक तरहक तरकारी, तरुआ-बघरुआ, भुजिया-सन्ना-चटनी बनबैत छली तकरा बादो टारासँ नाना तरहक़ अंचार जाहिमे फारा, कुच्चा, खटमिट्ठीबला आदि ब्यंजन परोसि पाहूनक सत्कारमे १५-२० तरहक सचार लागि जैत छलै। आब पाहून भोजन पर बैसता आ महिला लोकनि गीत नहि गेती से कोना हेतैक तें बिनु थकने विहुँसैत मोनसँ दाई-माई सभकें संगौर कS गीत-नाद शुरू होइत छल। पाहून खाईतो रहैत छलाह आ गीतक आनंद लैत छलाह। जखन कखनो हमसब कोनो पांच सितारा होटल भोजन करैत छी आ कोनो गीतगैन गबैत देखैत छी तS होइत अछि जे एहिसँ बढ़ियाँ कोरसमे गीत-नादक गीतगैन हमरा सभक समाजक महिला गबैत छथि। वैह खानसामा, वैह परोसय बाली, वैह गीत गेनिहारि, वैह वस्तुक व्यवस्था केनिहारि। मल्टीटास्किंग कें अहिसँ पैघ उदाहरण भला आर की भS सकैत अछि ।
पहिने समय में लोक बिबाह स पहिने ई जानय चाहैत छल जे जाहि घर में बेटीक बिबाह भ रहल अछि ओहि घरक चीनबार कहेन छैक। मतलब कतेक साफ़-सफाई, कुन-कुन तरहक बरतन-बासन, कुन द्रव्य केर बरतन-बासन, इत्यादि। भोजन कहेन हो, लोक के भोजनक विन्यास, दुखक भोजन, सुखक भोजन, पाबनि-तिहारक भोजन, यात्रा में जएबाक काल बाट में खेबा बला भोजन, खाद्य भोजन, अखाद्य भोजन, पथ्य बला भोजन, कुन समय में की खाई की नहि खाई, इत्यादि सब बातक जानकारी अगर सही अर्थ में विवेचन करी आ विभिन्न अवसर पर मैथिलानी सब द्वारे गैल गीत सबके देखी त पता चलत जे ओ सब केवल विधपुरौआ या मनोरंजन बला गीत नहि अछि अपितु ज्ञान के खान अछि। ओहि गीत में ज्ञान, विज्ञान, संस्कार, सामग्रीक वर्णन आ विवरण सब किछु समाविष्ट अछि।
मैथिली में अगर अंग्रेजीक शब्द culture के अनुबाद कैल जै त हमरा हिसाबे ओ शब्द जे culture के सब स समीप अछि मैथिली में ओ थिक “मिथिलाम”। ई मिथिलाम अछि जे मैथिल के भारते नहि अपितु समस्त संसार में अलग पहचान दैत अछि। आ मिथिलाम केर चर्चा बिना, भोजन विन्यास, बिना महिला सबहक भूमिका, बिना गीत-नाद आ विध-व्यवहार के संभव नहि अछि. वस्तुतः भोजन विन्यास, गीत-नाद, विध-व्यबहार, जीवन जीबाक अंदाज़, वस्त्र विन्यास, धर्मक आचरण आ प्रकृति आ संस्कृति में समन्वय केर नाम भेल मिथिलाम।
बात भोजन विन्यास के क रहल छी त कनिक मिथिलाक इतिहास के देख पडत।
ज्योतिरीश्वर वर्णरत्नाकर मे ११म् शताब्दीक  मिथिलाक भोजन विन्यास पर प्रकाश देलनि अछि। हिनका अनुसारेँ मिथिलाक प्रमुख भोजन भात, दालि, तरकारी, चूडा, दही, शक्कर, फल तथा दूध छल। ज्योतिरीश्वर अपन दोसर पोथी प्राकृति-पैँगलम् मे कहैत छथि जे “ओ गृहणी धन्य छथि जे अपन पति केँ केराक पात पर भात आ घीक भोजन करबैत छथि”। एहि पोथी मे रंग रंगक माँछ रान्हव आ तरकारी बनेवाक विधि सेहो लिखल अछि। वर्णरत्नाकर मे जे मिथिलाक प्राचीन परम्परागत भोजन समिग्रिक जे सूची प्रस्तुत कैल गेल अछि ताहि मे “चौर, चूडा, मुंगवा, लडुबी, सरुआरि, माँठ, फ़ेना, मधुकूप्पी, तिलबा, सिरोल, खिरसा, सिरनी, झिल्ली, फरही, भूजा, मोतीचूड़, अमृतकुंड आदिक उल्लेख अछि| ई भोजन मे दही केँ प्रधानता सेहो दैत गेल अछि।
आब लोकगीत पर अबैत छी. लोकगीत के भीतर फकरा, पीहानी, गीत, लोककवित्त आदि सब किछु समाहित अछि। दुटा फकरा मैथिल समुदाय के भोजन विन्यास आ भोजन के प्रति आसक्ति के प्रदर्शित करबाक लेल पर्याप्त अछि:
पहिल : मिथिलाक भोजन तीन/ कदली, कबकब मीन।।
दोसर: तीन तीरहुतीया तेरह पाक। ककरो लेल चुडा दही ककरो लेल भात।।
अही दू के आधार बना सब विवरण के देखल जा सकैत अछि।
मिथिलाक भोजन तीन। कदली, कबकब मीन।।
एकर अर्थ भेल जे मिथिला के लोक लगभग सब निक स लक’ अधलाह उत्सव, काज-धज, संस्कार, पाबनि-तिहार धरि में केरा, ओल या ओले परिवारक आन कंद जेना कि खम्हरुआ; आ अंततः विविध प्रकारक माछके प्रयोग भोजन में अवश्य करैत छथि। बिबाह-दान, मुड़न, उपनयन, पाबनि तिहार सब में केराक प्रयोग हेबेटा करैत अछि. ओहुना केरा लोक पाकल, काँच आ केराक फुलक सेहो खेबाक लेल प्रयोग करैत छथि। केराक तरुआ, तरकारी, सत्यनारायण भगवानक कथा में घोरुआ प्रसाद आ ओहुना पाकल केराक प्रयोग शाश्वत अछि।
कबकब के बात करैत ई कहब जरुरी अछि जे ओल मिथिला में बहुत प्रिय अछि। एक फकरा में भादबक ओल केर बारे में कहल जैत छैक:
भादवक ओल की खै राजा आकि चोर
मिथिला आ माछ एक दोसरक पूरक अछि। पचदेवता के एकहि संगे उपासना करे बला मैथिल समाज जाहि में ब्राह्मण सेहो सम्मिलित छथि कुनो दिन आ कुनो मास माछ खेबा स परहेज नहि करैत छथि। माछ के जल-पड़ोर, जल-फूल आदि नाम स बजा कतेक गोटे त एकरा मांसाहारी भोजन के श्रेणी तक में नहि राखय चाहैत छथि। कातिक आ साबन मास में जखन लोक सामान्यतया मांसाहारी भोजन के त्यागि दैत छथि, अपन मैथिल अहू मास में खूब चटकार स माछ खाईत छथि। आ अहि मास में माछ खेबा बला लेल बैकुंठ में जगह बना दैत छथि:
कातिक मास जे गैंचा खाय। ससरि-फ़सरि बैकुंठे जाय।।
एक बारहमासा गीत एहेन भेटल जाहि में मिथला के पानि में उपलब्ध लगभग सब माछक वर्णन त अछिए ओकरा कोना बनाबी कथी खाई, कथी संगे खाई सब वर्णित अछि। अतबे नहि लगभग ७५% माछ जे मिथिलाक पानि में भेटैत अछि तकर वर्णन छैक। कनि एहि बरह्मासा के देखू:
मास हे सखि सरस अगहन भूजल चूड़ा संग यो। तरल चेचड़ा माछ कुरमुर लागय मोन भरि संग यो।। पूस हे सखि अन्न नवका संग मांगुर झोर यो। कबइ कुरमुर दाँत दबइत करय जनजन शोर यो।। माघ बदरी जाड़ थरथर काँपय तन बड़ जोर यो। सुख बोआरी खंड लखि कए मन विनोद विभोर यो।। मास फागुन मदक मातल बहय पछबा बसात यो। बढ़ल स्वादक माछ टेंगड़ा रान्हल सानल भात यो।। चैत हे सखि रोग सभदिस रूप नाना देखि यो। तरल भुन्ना पलइ रान्हल खाइत बड़ सुख लेखि यो।। मास हे सखि आबि पहुँचल गरम बड़ बइसाख यो। गेल मन रुचि माछ गामर खंड सभ दिन चाख यो।। जेठ हे सखि हे हेठ बरखा मुंड भाकुर पात यो। पड़तु बिसरतु आबि ससरतु कर नवका भात यो।। मेघ सखि बरसत अखाढ़ जत रसालक डारि यो। तोड़ि काँचे आम आमिल देल सौरा पाल यो।। मास हे सखि आओल साओन भरल अंडा घेंट यो। तरल दही माछ मारा खाथि भरि पेट यो।। माछ इचना भेटल कहुना खाय भरलहुँ कोठि यो। मास आसिन देवपूजा शंख घंटा नाद यो।। रान्हि रहुआ माछ बइसब पूर्ण भेल परसाद यो। मास कातिक बारि मरूआ बऽड़ तरल-अपूर्व यो।। पूरल बारहमास हरिनाथ गाओल सगर्व यो…
माछ के खेबाक वर्णन त अछिये माछक शिरा खेबाक परंपरा प्रबल सेहो। घरक मुखिया, पाहून, बरियाती आदि के शिरा भेटल त हुनकर उचित सत्कार भेल। निम्नलिखित फकरा एहि कथ्य के प्रमाणित करैत अछि:
शिरा खाय से मीरा। पूच्छी खाय गुलाम।।
जमाय जखन भोजन करक हेतु बैसति छथि त नाना तरहक गीत गाबि हुनका मनोरंजन कैल जैत अछि। एक डहकन जाहि में ओना त गारि देबाक परंपरा अछि मुदा गारिक संग-संग भोजन विन्यास के वर्णन सेहो अछि।
खाजा मूंगबा आर पिरिकिया
ता पर गरम सोहारी जी।
माजी के गारी पिताजी के गारी
आ बाबाजी के पढथि गारी जी।
पढु हे सारि हमरो के गारी
हम लेब देह के पसारी जी।।
एहि गीत में गारि त छैके जे डहकन के मूल प्रकृति छैक। मुदा गारि के संगे-संगे भोजन सामग्री – खाजा, मूंगबा, पुरुकिया, सोहारी आदिक विवरण सेहो छैक।
सामा-चकेबा में एक गीत में बहिन सब भोजनक बात करैत छथि:
साम-चको साम-चको अबिह हे अबिह हे।
जोतला खेत में बैसिह हे बैसिह हे।
लाले रंग पूरी पकबिह हे पकबिह हे।।
मिथिला में साग खेबाक परंपरा अदौ स अछि। अयाची मिश्रक जीवनवृत्त ककरा नहि बुझल छैक. मात्र ११ कट्ठा खेत में साग-पात कंद-मूल खाक जीवन यापन करैत छला, अध्ययन-अध्यापन करैत छलाह. कतेक बेर राजा बजेलखिन मुदा अपन गाम के गुरुकुल के छोडि कतहु नहि गेला। स्वयात संप्रभुता के सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करैत छलाह। माछक तुलना में साग के अधिक प्रधानता देबाक प्रथा मिथिला में सहज अछि। एक फकरा एहि बात के प्रमाणित करैत अछि:
माछ-भात पांच हाथ। साग-भात सात हाथ।।
विन्यास में साग के अलावे सागक आन चीज़ सब जेना अरिकोच, गुजिया, इत्यादि बनबैत छथि. खेसारी, बथुआ, केराव, चना, कर्मी, गेनहारी, पटुआ आदिक साग मिथिला लोक खाईत छथि। अपना ओतय साग तोडल नहि अपितु खोटल जैत अछि। कुनो भोज में साग एक महत्वपूर्ण तरकारी होइत अछि। मिथिलाक एहि परंपरा स प्रभावित होइत ठीके कहल गेल अछि:
कोकटा धोती पटुआ साग। तीरहुत गीत बड़े अनुराग।
भाव भरल तन तरुणी रूप। तैं त तिरहुत होइछ अनूप।।
अपन माटि स गुजरिया के अतेक सिनेह जे साग-पात खोंटि लेती, साग-भात खा लेती मुदा रहती मिथिले में:
साग-पात खोंटि- खोंटि दिवसों गेमेबै यौ हम मिथिले में रहबै
नहि चाही हमरा सुख-आराम यौ हम मिथिले में रहबै।।
तिलकोर आ कन्ना साग बिना की मिथिलाक पाहुनक सचार लागि सकैत अछि? चाउरक पीठार में डुबा शुद्ध सरिसबक तेल में छानल तिलकोर दुरो देस में रहनिहार मैथिल सबके जीभ में पानि आनि दैत अछि।
सजमनि, भाटा इत्यादि में अदौरी, त चाहबे करी तखन ने  भाटा-अदौरिक चहट्गर तरकारी बनत! भाटा के तरुआ, भटबर आर की-की नहि बनैत अछि। बारिक भाटा त बेर बिपत्ति के समय इज्जत रखैत अछि।
भांटा के भटबर, ठोपे के तेल। खेलक जमैया ठेलम ठेल।।
मिथिला के लोक के खिच्चरि में सेहो पापर, घी, दही, अचार, चटनी इत्यादि संग खाईत छथि. खिच्चरि में चारि बस्तु नहि त केहन खिच्चरि?
खिच्चरि के चार यार। घी पापर दही अचार।।
ई त भेल पद परन्तु सही अर्थ में खिच्चरि के छौ यार थिक: घी, पापर, दही, अचार, चटनी, तरुआ।
एक उचती गीत में जखन विवाहक बाद वर भोजन करवा लेल बैसैत छथि त सासु आ आन स्त्रीगन सब अपन गीत में व्यंजन केर वर्णन करैत छथि:
जाहि दिन राम जनकपुर अयला देखहु दुनिया के लोके
भाति-भाति के भोज्य लगाओल नयना बिनु परकारे जी
केरा नारियल खण्ड सोहारी परबल केर तरकारी जी
जीमय बैसला ओ चारू भाई परसथु प्रेम पीयारी जी //
दोसर उचती में बर के कृष्ण स्वरुप मानि किछु अहि तरहक विवरण भेटैत अछि:
खाजा खुरमा तपत जिलेबी तापर सक्त सुपाड़ी जी।
जेमय बैसला कृष्ण-कन्हाई सारि जे पढ़थिन गारि जी।।

भगबान कृष्णक बालकाल के एक भक्ति गीत में भोजनक किछु वर्णन भेटैत अछि:
करथि पुकार जशोदा माई मोहन प्रात नाहाई।
दही केरा गरम जिलेबी खोआ भोग लगाई।।

लोकगीत में भूख, निर्धनता, कुअन्न आदिक ऐतिहासिक संदर्भक वर्णन
लोकगीत लोकविद्या होइत अछि, लोकइतिहास होइत अछि। एहेन इतिहास जे अपन प्रमाणिकता एवं शैली के कारण जन-जन केर कंठ में लिखा जैत अछि। एहेन लिखान जकरा ने कुनो पानि गला सकैत अछि ने कुनो आगि जरा सकैत अछि आ ने कुनो कीड़ा खा सकैत अछि। एकबेर जनकंठ में रचि गेल त पीढ़ी-दर-पीढ़ी अबाध गति स चलैत रहैत अछि। मधुबनी ज़िला के शाहपुर गाम में एक जनमान्ध लोक कवि भेला। हुनकर नाम छलनि फतुरी लाल। फतुरी लाल एक बेर मिथिलाक भयानक अकाल के सामना केलनि आ अकाल के विभीषिकाक ह्रदयविदारक विवरण अपन कवित्त में केलनि। ओ रचना अकाल कवित्त के नाम स जानल जैत अछि। अब्राहम ग्रिएर्सन १८८७ ईस्वी में फतुरी लाल केर अकाल कवित्त हुनके मुहें सुनि क लिखलनि। एहि कवित्त में ई विवरण अछि जे भुखमरी केर अवस्था में लोक प्राणरक्षा हेतु की-की नहि करैत अछि। किछु पंक्ति मात्र देखला स दुखक असीम वेदनाक अनुभूति सहजे भ जैत छैक:
भेल धनतरि दुई फ़ासिल जग-राहडिऔर मकई।
अकाल पडल तिरहुति में भारी-तैं बही गेल हवा।
घर-घर मांगन करे नर नारी-फाँकि मकई केर लावा।
मालीक आउर महाजन सभ-कै-घर-घर ढेरीक अन्न।
लोक बुझओल ओहो तकै छथि मुंह्गा ऋणक शान।
सभै देखि बनियान सभ सनकल-डरें लगाओलक टट्टी।
सुन्न दोकान शहर में परि गेल-सुन्न भेल सभ चट्टी।
सूखल गात भात भौ लटपट-कतेक बात अब सहना।
नर नारी सभ सान तेआगल-बेकारी भेल अब गहना।।
बारहमासा एवं अन्य गीत में गरीबी के चित्रण करैत कोना कियोक महिला कम भोजन अथवा कुअन्न खा क दिन खेपैत छथि तकर मर्मस्पर्शी वर्णन कैल गेल अछि।  आई स करीब ३०-३५ सालक इतिहास में अगर जा सकी आ अपन मानस पटल पर वो स्थिति आ गरीबी के ऐना के रिफ्लेकशन जकां देख पाबी त सहज रूप में ई अनुमान लगा सकैत छी। एक बारहमासा एहेन भेटल जाहि में एक निर्धन महिला जिनकर पति परदेस गेल छथिन ओ केना अपन समय नितांत निर्धनता में बिता रहलि छथि तकर विवरण देल गेल अछि।
पूस गोइठा डाहि तापब माघ खेसारिक साग यो फागुन हुनका छिमरि माकरि चैत खेसारीक दालि यो बैशाख टिकुला सोहि राखब जेठ खेरहिक भात यो अखाढ़ गाड़ा गाड़ि खायब साओन कटहर कोब यो भादव हुनको आंठी पखुआ आसिन मडुआक रोटी यो कातिक दुख-सुख संगहि खेपब अगहन दुनू सांझ भात यो
उपरोक्त गीत में कोना एक महिला खेसारीक साग, खेसारीक दालि आमक टिकुला, खेरहिक उसिना, पाकल आमक गाड़ा, कटहरक कोआ, नेढा, आमक पखुआ, मडुआ रोटी, एक मास अनिश्चितता केर स्थिति आ अंततः अगहन में भात। कहू त कतेक सत्य के जे आई लगभग इतिहास भ चुकल अछि तकरा ई अपना मानस में रखने अछि मिथिलाक गीत-नाद।
गरीबीक बिपत्ति स मारलि आ असहाय विधवा कंद मूल आ कुअन्न बांसक ओधि स अपन टूटल मडैया में नीक स नीपल-पोतल चुलहा में पका रहल अछि। बांसक ओधि धुआंक घर होइत अछि। फटने ने फाटैत अछि। जरने ने जरैत अछि। ओहने विधवा के दुःख स द्रवित होइत बाबा “यात्री” लिखैत छथि:
बांसक ओधि उपारि करै छी जारनि…
हमर दिन की नै घुरतै जगतारिनि //
मैथिली लोकगीत में आयुर्वेद
लोकगीत लोकविद्या के अंग अछि। लोक विद्या के अनेक पक्ष वैज्ञानिक होइत अछि। कृषिकार्य एवं अन्य सब कार्य में डाक बचन कतेक सटीक अछि से हमरा लोकनि बहुत निक जकां बुझैत छी। बहुतो लोकगीत एहेन अछि जे कहेन अन्न अथवा भोज्य सामग्री सेहो कुन दिन, कुन मास में खेला स की भ सकैत अछि तकर बहुत तथ्यपरक जानकारी दैत अछि. गीत सुनब अथवा पढ़ब त लागत जेना आयुर्वेद के कुनो वैद्य के देल नुस्खा हो। हरेक गाछ आ हरेक भोज्य सामग्री में प्राचीन भारतीय परंपरा के अनुसार किछु-ने-किछु औषधि के तत्व छैक। भारतीय परम्परा में औषधि आ भोजन अलग-अलग चीज़ नहि छैक। ताहि अपना सबहक भोजन में पथ्य आ कुपथ्य के बात प्रबल मानल जैत अछि।
अपन शोधकार्य के अवधि में जखन मिथिला के गाम सब स गीतक संकलन करैत रही त एक गीत एहेन भेटल जे ओ ई बतबैत छल जे कुन दिन कथिक प्रयोग भोजन में करक चाही जाहि स तन आ मोन दुनु स्वस्थ्य रहत। ई वर्णन ज्योतिष विचार पर सेहो आधारित अछि।
रबि के पान सोम के दर्पण
मंगल के किछु धनियाँ चर्पण
बुध के गुड़ बृहस्पति राई
शुक्र कहे मोहे दही सुहाई
शनिबार जे अदरख खाई
कालौं काल कटति घर जाईं।।
ई त भेल कहिया की खेबाक चाही। एक एहेन गीत  भेटल जे बारहमासा के रूप में रचित गेल अछि। ई एक वैद्य जकां बहुत वैज्ञानिकता के आधार पर लिखल अछि। गीत अर्थ के स्वतः प्रमाणित करैत अछि:
सावनक साग ने भादबक दही। आसिनक ओस ने ने क़ातिकक मही। अगहनक जीर ने पूसक धनी। माघक मिसरी ने फ़ागुनक चना। चैतक गुड़ ने बैसाखक तेल। ज़ेठक चलब ने अषाढ़क बेल। कहे धनवनतरि अहि स बचे। वैद्यराज काहे पुरिया रचे।।
मैथिली लोकगीत अनंत महासागर अछि। अहि महासागर में स भोजनक सम्बन्ध में जे किछु जानकारी छल से समयसीमा आ पोथी के पन्ना के ध्यान में राखि पाठक के समक्ष राखल। नीक लागल त मैथिली लोकगीत परम्परा केर महानता अधलाह लागल त हमर ज्ञानक विपन्नता। के स्वतः प्रमाणित करैत अछि:
सावनक साग ने भादबक दही। आसिनक ओस ने ने क़ातिकक मही। अगहनक जीर ने पूसक धनी। माघक मिसरी ने फ़ागुनक चना। चैतक गुड़ ने बैसाखक तेल। ज़ेठक चलब ने अषाढ़क बेल। कहे धनवनतरि अहि स बचे। वैद्यराज काहे पुरिया रचे।।
मैथिली लोकगीत अनंत महासागर अछि। अहि महासागर में स भोजनक सम्बन्ध में जे किछु जानकारी छल से समयसीमा आ पोथी के पन्ना के ध्यान में राखि पाठक के समक्ष राखल। नीक लागल त मैथिली लोकगीत परम्परा केर महानता अधलाह लागल त हमर ज्ञानक विपन्नता।

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