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विभिन्न प्रकारक सिरपट:- मूल लेख : पं० गोविन्द झा

लगभग १९म शतक धरि कियो भद्रजन उघार माथेँ घर सँ
बहराइत नहि छलाह ।विभिन्न देश , क्षेत्र आ समाज मे
विभिन्न प्रकारक मूल लेख :
लगभग १९म शतक धरि कियो भद्रजन उघार माथेँ घर सँ
बहराइत नहि छलाह ।विभिन्न देश , क्षेत्र आ समाज मे
विभिन्न प्रकारक सिरपट(पाग ,मुरेठा,टोपी,टोप आदि मँथ-
झँपना )चलल ।मोन पड़ैत छथि राजा राममोहन राय,
लोकमान्य तिलक , डॉ० राधाकृष्णन् ,महाराज रमेश्वर सिंह , माउँटबेटन आदि । सभ कियो अपन-अपन सिरपट
अपनहि सँग लेने गेलाह । तेहेन बिहारि उठल जे सभक
सिरपट सहसा उड़ियाऽ गेल ।मिथिलाक कोन कथा , ऑक्सफोर्डहु मे टोप बिलाऽ गेल ।बसात उनटल ।नौकाकार उजरा टोपी आएल आ जे अनलनि से
अपनहि सँग स्वर्ग लेने गेलाह ।संसद मे एकर स्थान
लेलक नाना रंग आ नाना आकार- प्रकारक सिरपट।
कोनो राजनैतिक , कोनो क्षेत्रीय तँ कोनो धार्मिक ।
सभ सँ पछाति पहुँचल #मिथिलाकपाग ।धन्य मा०
कीर्ति आजाद ।
एक मैथिल युवक पूछि देलनि , पाग कहिया सँ चलल ?
विकट प्रश्न ! विकटे नहि अप्रासंगिको ।किछु कहि टारि
देलियैन ।हमरा जनैत पागक सभसँ प्राचीन नाम थिक
‘उष्णीष’ । एकर व्युतपत्यर्थ थिक ‘उष्ण रौद सँ बचबाक
वस्त्र ‘ । सुदूर अतीत सँ हमरा लोकनि तीन टुक कपड़ा
पहिरैत एलहुँ अछि । प्रागवस्त्र(पाग), उत्त्तरवस्त्र वा उत्तरीय (उतरी , दोपटा , चादरि , तौनी ) आ अधोवस्त्र
(धोती) ।एकर सरलतम आ मूलरूप थिक #मुंडवेष्ठक
(मुरेठा) अर्थात मूड़ी मे लपेटबाक कपड़ा । एकर दोसर
प्रकार थिक प्राग्र(पाग)जे माथ पर नहि , ठेहुन पर वा
मस्तकाकार साँच पर बान्हल जाइत अछि आ ओहि पर
सँ कलबल उठाए स्थायी राखल जाइत अछि ।बेर-बेर बान्हए नहि पड़ैत अछि ।मैथिली मेँ ई #पाग कहबैत
अछि आन ठाम पगड़ी । पागक दू प्रकार अछि व्यावहारिक आ आलंकारिक ।पहिल प्रकार सामान्य
व्यवहार मे चलैत अछि। दोसर विवाह मे वर पहिरैत
छथि । जे #मौर (मउड़, मुकुट) कहबैत अछि तथा
दरबार मे राजा-महाराज पहिरैत छथि जे मुकुट वा
ताज कहबैत अछि ।
मिथिला मे पाग समय-समय पर अपन स्वरूप बदलैत
रहल अछि ।पागक ई परिवर्त्तन क्रम हम ८० वर्ष अपना
आँखिए देखने छी आ ताहि सँ पूर्व ८० वर्षक हाल गुरूजनक मुँहे सुनने छी ।
हमर बाल्यकाल मे मैथिल ब्राह्मण आ करण कायस्थक
बीच दू प्रकारक पाग चलैत छल -पहिल #साठा आ दोसर #बूटपरक । साठि हाथ नाम आ चारि आँगुर चौड़ा जोलही कपड़ा कीनि आनू । अपन ठेहुन पर आन कपड़ा
लेपटाए -लेपटाए अपन माथक भजारक साँच (फरमा )
बनाउ । ताहि पर सँ प्रचलित आकृतिक मुरेठा बान्हू ।#पाग तैयार भऽ गेल । ओकरा ठेहुन पर सँ कलबल
उठाकए अपना माथ पर राखि लियऽ । ई साठि हाथ
कपड़ा सँ बनैत छल तैँ #साठापाग कहबैत छल ।
एहेन भारी भरकम पाग विशिष्ठे लोक पहिरैत छल ।
साधारण लोक एहि आकृतिक छोट आ सरल पाग
पहिरैत छल जे अन्तत: मुरेठा कहबए लागल । क्रमश:
पाग संभ्रान्त आ सम्पन्न वर्ग (मुख्यत: मैथिल ब्राह्मण आ
मैथिल कायस्थ )धरि सीमित रहि गेल ।आन वर्ग आ जाति सभ मे जँ-जँ विभव आ चेतना घटैत गेल तँ -तँ
पागक आकार घटैत गेल । साठि हाथक कपड़ाक जगह
अढ़ाए हाथक गमछा माथ मे लपेटल जाय लागल ।एकरा
#मुरेठहु कहब #मुरेठाक अपमान होयत । वास्तव मे इहए तँ छल होयत सिरपटक मूल रूप जे कालक्रमे धनाढ्य वर्ग मे अगह सँ विगह होइत पागक मूल रूप
सँ साठा पाग भऽ गेल होयत ।
ई सट्ठा पाग परम असुविधाजनक छल ।ठेहुन पर बन्ह
बाक लूरि सभकेँ नहि रहैत छल ।एहिलेल आनक खोशामद करय पड़ैत छल ।एक-दू बेर पहिरलाक
बाद ई उजड़ि जाइत छल ।जँ मूड़ी भूलहु सँ एमहर
उमहर भेल कि पाग भूलुण्ठित भए उजड़ि जाइत छल।
एहि कारण सँ पागक प्रचलन घटैत-घटैत मात्र पण्डितक
माथ पर रहि गेल ।एहने समय मे एक मुसलमान जे नाना
प्रकारक टोपी बनबैत छल , कोढ़िलाक साँच बनाए  , ओहि मे माँड़ मे भीजल कपड़ा साटि आ सीबि केँ तेहेन
सुन्दर पाग बनओलक जे टोपी जकाँ माथ मे खप्प दऽ
बैसय आ फूल सन हल्लुक । हठेँ उजड़बो नहि करय ।
एहेन पागक नाम भेल बूट परहक पाग । एहि नबका पागक आविष्कार सुनतहि एकटा नैष्ठिक पण्डित जे
पाही टोलक छलाह , चुपचाप ई लुरि सीखि एकर
व्यवसाय आरम्भ केलनि । प्रचार हेतु एक पण्डित सँ
श्लोक बनबौलन्हि —
“शुद्धेन यवचूर्णेन ब्राह्मणेन विनिर्मितम ।
उष्णीषं घार्यतां विप्रा: पवित्रं सुंदरं दृढं ।।”
किछुए दिन मे एकरा आँगा प्रतिष्ठितो पण्डित लोकनि नतमस्तक होइत सहर्ष धारण करय लगलाह । साठा पाग
१९६० धरि जीबैत छल । जे ब्राह्मण आ करण कायस्थक
माथ धरि सीमित छल । विद्यापति समारोहक हूलि मे आबि ई सब ठाम , सभक माथ धरि जाय लागल । लोक
पहिरैत गेलाह , आनंदित आ विस्मित होइत गेलाह ।
तत्काल मिथिला केँ बिसरि जँ बिहारक चिन्ता कयल जाय
तँ एहेन एक मात्र अलंकरण अभरैत अछि #पाग जे बिहारक प्रतीक मानल जायत । आ ओहि सँ अतिथि लोकनिक अर्चन कयल जाय । मुदा ई तँ मिथिलाक थिक । बिहारी लोकनि प्रतिवाद करताह । एकर एकमात्र कारण थिक बिहार मे पसरल जातिवादी भूत ।इहए भूत
इहो बकबैत अछि जे ई बिहारक ब्राह्मण आ कायस्थक
प्रतीकचिन्ह थिक । इहए आरोप #मैथिलिओ पर लागल
छल । मुदा समय बहुत, बहुत बदलि गेल अछि । आब
आनक बूझि छोड़बाक प्रवृतिक बदला नीक बूझि छिनबाक वा अपनेबाक प्रवृत्ति जागल अछि । सभ वर्गक
मैथिल ई बूझि रहल छथि जे #पाग जातिक नहि , व्यक्तिक प्रतिष्ठाक प्रतीक थिक !! (पाग ,मुरेठा,टोपी,टोप आदि मँथ-
झँपना )चलल ।मोन पड़ैत छथि राजा राममोहन राय,
लोकमान्य तिलक , डॉ० राधाकृष्णन् ,महाराज रमेश्वर सिंह , माउँटबेटन आदि । सभ कियो अपन-अपन सिरपट
अपनहि सँग लेने गेलाह । तेहेन बिहारि उठल जे सभक
सिरपट सहसा उड़ियाऽ गेल ।मिथिलाक कोन कथा , ऑक्सफोर्डहु मे टोप बिलाऽ गेल ।बसात उनटल ।नौकाकार उजरा टोपी आएल आ जे अनलनि से
अपनहि सँग स्वर्ग लेने गेलाह ।संसद मे एकर स्थान
लेलक नाना रंग आ नाना आकार- प्रकारक सिरपट।
कोनो राजनैतिक , कोनो क्षेत्रीय तँ कोनो धार्मिक ।
सभ सँ पछाति पहुँचल #मिथिलाकपाग ।धन्य मा०
कीर्ति आजाद ।
एक मैथिल युवक पूछि देलनि , पाग कहिया सँ चलल ?
विकट प्रश्न ! विकटे नहि अप्रासंगिको ।किछु कहि टारि
देलियैन ।हमरा जनैत पागक सभसँ प्राचीन नाम थिक
‘उष्णीष’ । एकर व्युतपत्यर्थ थिक ‘उष्ण रौद सँ बचबाक
वस्त्र ‘ । सुदूर अतीत सँ हमरा लोकनि तीन टुक कपड़ा
पहिरैत एलहुँ अछि । प्रागवस्त्र(पाग), उत्त्तरवस्त्र वा उत्तरीय (उतरी , दोपटा , चादरि , तौनी ) आ अधोवस्त्र
(धोती) ।एकर सरलतम आ मूलरूप थिक #मुंडवेष्ठक
(मुरेठा) अर्थात मूड़ी मे लपेटबाक कपड़ा । एकर दोसर
प्रकार थिक प्राग्र(पाग)जे माथ पर नहि , ठेहुन पर वा
मस्तकाकार साँच पर बान्हल जाइत अछि आ ओहि पर
सँ कलबल उठाए स्थायी राखल जाइत अछि ।बेर-बेर बान्हए नहि पड़ैत अछि ।मैथिली मेँ ई #पाग कहबैत
अछि आन ठाम पगड़ी । पागक दू प्रकार अछि व्यावहारिक आ आलंकारिक ।पहिल प्रकार सामान्य
व्यवहार मे चलैत अछि। दोसर विवाह मे वर पहिरैत
छथि । जे #मौर (मउड़, मुकुट) कहबैत अछि तथा
दरबार मे राजा-महाराज पहिरैत छथि जे मुकुट वा
ताज कहबैत अछि ।
मिथिला मे पाग समय-समय पर अपन स्वरूप बदलैत
रहल अछि ।पागक ई परिवर्त्तन क्रम हम ८० वर्ष अपना
आँखिए देखने छी आ ताहि सँ पूर्व ८० वर्षक हाल गुरूजनक मुँहे सुनने छी ।
हमर बाल्यकाल मे मैथिल ब्राह्मण आ करण कायस्थक
बीच दू प्रकारक पाग चलैत छल -पहिल #साठा आ दोसर #बूटपरक । साठि हाथ नाम आ चारि आँगुर चौड़ा जोलही कपड़ा कीनि आनू । अपन ठेहुन पर आन कपड़ा
लेपटाए -लेपटाए अपन माथक भजारक साँच (फरमा )
बनाउ । ताहि पर सँ प्रचलित आकृतिक मुरेठा बान्हू ।#पाग तैयार भऽ गेल । ओकरा ठेहुन पर सँ कलबल
उठाकए अपना माथ पर राखि लियऽ । ई साठि हाथ
कपड़ा सँ बनैत छल तैँ #साठापाग कहबैत छल ।
एहेन भारी भरकम पाग विशिष्ठे लोक पहिरैत छल ।
साधारण लोक एहि आकृतिक छोट आ सरल पाग
पहिरैत छल जे अन्तत: मुरेठा कहबए लागल । क्रमश:
पाग संभ्रान्त आ सम्पन्न वर्ग (मुख्यत: मैथिल ब्राह्मण आ
मैथिल कायस्थ )धरि सीमित रहि गेल ।आन वर्ग आ जाति सभ मे जँ-जँ विभव आ चेतना घटैत गेल तँ -तँ
पागक आकार घटैत गेल । साठि हाथक कपड़ाक जगह
अढ़ाए हाथक गमछा माथ मे लपेटल जाय लागल ।एकरा
#मुरेठहु कहब #मुरेठाक अपमान होयत । वास्तव मे इहए तँ छल होयत सिरपटक मूल रूप जे कालक्रमे धनाढ्य वर्ग मे अगह सँ विगह होइत पागक मूल रूप
सँ साठा पाग भऽ गेल होयत ।
ई सट्ठा पाग परम असुविधाजनक छल ।ठेहुन पर बन्ह
बाक लूरि सभकेँ नहि रहैत छल ।एहिलेल आनक खोशामद करय पड़ैत छल ।एक-दू बेर पहिरलाक
बाद ई उजड़ि जाइत छल ।जँ मूड़ी भूलहु सँ एमहर
उमहर भेल कि पाग भूलुण्ठित भए उजड़ि जाइत छल।
एहि कारण सँ पागक प्रचलन घटैत-घटैत मात्र पण्डितक
माथ पर रहि गेल ।एहने समय मे एक मुसलमान जे नाना
प्रकारक टोपी बनबैत छल , कोढ़िलाक साँच बनाए  , ओहि मे माँड़ मे भीजल कपड़ा साटि आ सीबि केँ तेहेन
सुन्दर पाग बनओलक जे टोपी जकाँ माथ मे खप्प दऽ
बैसय आ फूल सन हल्लुक । हठेँ उजड़बो नहि करय ।
एहेन पागक नाम भेल बूट परहक पाग । एहि नबका पागक आविष्कार सुनतहि एकटा नैष्ठिक पण्डित जे
पाही टोलक छलाह , चुपचाप ई लुरि सीखि एकर
व्यवसाय आरम्भ केलनि । प्रचार हेतु एक पण्डित सँ
श्लोक बनबौलन्हि —
“शुद्धेन यवचूर्णेन ब्राह्मणेन विनिर्मितम ।
उष्णीषं घार्यतां विप्रा: पवित्रं सुंदरं दृढं ।।”
किछुए दिन मे एकरा आँगा प्रतिष्ठितो पण्डित लोकनि नतमस्तक होइत सहर्ष धारण करय लगलाह । साठा पाग
१९६० धरि जीबैत छल । जे ब्राह्मण आ करण कायस्थक
माथ धरि सीमित छल । विद्यापति समारोहक हूलि मे आबि ई सब ठाम , सभक माथ धरि जाय लागल । लोक
पहिरैत गेलाह , आनंदित आ विस्मित होइत गेलाह ।
तत्काल मिथिला केँ बिसरि जँ बिहारक चिन्ता कयल जाय
तँ एहेन एक मात्र अलंकरण अभरैत अछि #पाग जे बिहारक प्रतीक मानल जायत । आ ओहि सँ अतिथि लोकनिक अर्चन कयल जाय । मुदा ई तँ मिथिलाक थिक । बिहारी लोकनि प्रतिवाद करताह । एकर एकमात्र कारण थिक बिहार मे पसरल जातिवादी भूत ।इहए भूत
इहो बकबैत अछि जे ई बिहारक ब्राह्मण आ कायस्थक
प्रतीकचिन्ह थिक । इहए आरोप #मैथिलिओ पर लागल
छल । मुदा समय बहुत, बहुत बदलि गेल अछि । आब
आनक बूझि छोड़बाक प्रवृतिक बदला नीक बूझि छिनबाक वा अपनेबाक प्रवृत्ति जागल अछि । सभ वर्गक
मैथिल ई बूझि रहल छथि जे #पाग जातिक नहि , व्यक्तिक प्रतिष्ठाक प्रतीक थिक !!

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