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बापू के साथ मरते दम तक थी मिथिला नगरी मुंगेर में बनी गोरघट की लाठी:-

मिथिला नगरी मुंगेर जिले के गंगा तट पर बसे घोरघट गांव में 12 अक्टूबर 1934 को महात्मा गांधी के कदम पड़े थे। इस गांव में उन्हें लाठी प्रदान की गई थी। जो आजीवन उनके संग रही।  स्वतंत्रता सेनानी बोढ़न पासवान उस टीम के हिस्सा रहे जिन्होंने गांधी जी का स्वागत घोरघट में किया और उन्हें लाठी प्रदान की थी।
इस गांव में बापू की याद में हर वर्ष लाठी महोत्सव का आयोजन होता है। आयोजन का समन्वय गांव के बासुकी पासवान करते हैं।
इस गांव में पहुंचे बापू ने कहा था कि घोर यानी पवित्र और घट यानि आत्मा। अर्थात यहां पवित्र आत्मा वाले लोग निवास करते हैं।
घोरघट के पास स्थित ढोल पहाड़ी स्वतंत्रता सेनानियों का गढ़ थी। आजादी के दीवानों का यह एक गोपनीय केंद्र था। उन दिनों स्वतंत्रता सेनानियों का जमघट घोरघट में लगा करता था। वैसे घोरघट गरम दल के नेता”ं की धुरी रहा है, पर बापू तब इस गांव में आए थे। घोरघट के कठईटोला में विशेष किस्म की लाठी बनाई जाती थी। स्थानीय हवेली खड़गपुर के जंगलों से लाठी आती थी।
इस गांव के मो. आलम और मो. कयूम नें गांधीजी को प्रदान करने वाली लाठी का निर्माण किया। घोरघट में लाठी खास तकनीक से तेल और चूने में डालकर आग में सेंकी जाती थी। लाठी का इस्तेमाल मजबूती और खास गुणवत्ता के कारण मुगल काल में युद्ध में होता था। अंग्रेजों के जमाने में इसे पुलिस बल इस्तेमाल करते थे। इसे बिहार सरकार के पुलिस फोर्स में भी इस्तेमाल किया जाता रहा। बहरहाल उन दिनों यहां की लाठी ब्रिटेन, अफगानिस्तान, भूटान और नेपाल जाती थी। घोरघट आकर बापू का उद्देश्य साफ था वे स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों से मिलना चाहते थे। साथ ही चाहते थे कि घोरघट गांव में लाठी से जुड़ी ग्रामीण अर्थव्यवस्था से वे सीधे रू-ब -रू हों।
बापू ने घोरघटवासियों से कहा था- ‘प्यारे गांववासियों मुझे पता है कि इस गांव की लाठी पूरी दुनिया में चर्चित है लेकिन जानकर दुख हुआ कि आपके गांव की बनी लाठी को ब्रिटिश हुकूमत खरीदती है और निरीह देशवासियों पर ही बरसाती है। आज से शपथ लें कि घोरघट की लाठी आप किसी भी ब्रिटिश के हवाले नहीं करेंगे। आपकी लाठी अंग्रेजों को भगाने का काम करे। मैं तो चाहता हूं आपकी लाठी मेरे बुढ़ापे का सहारा बने और देश की सुरक्षा करे।’ तब लोगों ने अंग्रेजी सरकार को घोरघट की लाठी देने से मना कर दिया था।
तकरीबन 4 घंटे महात्मा गांधी इस गांव में ठहरे। कौन जानता था कि वह पल चुपके-चुपके मिथिला नगरी मुंगेर जिले के लिए एक कभी नहीं भूलने वाला इतिहास को रच रहा था।

(मिथिला नगरी मुंगेर गांव में लाठी भेंट करते हुए ग्रामीण(लाल घेरे में बापू))

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