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मैथिल समाज मे परम्परा सँ प्रचलित प्रमुख संस्कार

मैथिल समाज जन्मक  पूर्वे सँ मृत्यु  धरि विभिन्न प्रकारक संस्कार सँ संस्कारित भऽ मानव धर्म पालनक संग संग मोक्ष प्राप्तिक संधान मे परम्परा सँ संलग्न रहैत आएल अछि | एतय केर मानव संस्कार पाबि देवत्वो सँ पैघ पद प्राप्त करबा मे सक्षम रहल अछि | मिथिला मे संस्कारक शिक्षा प्राप्त करबा लय देवतो लोकनि एतय अबैत रहलाह अछि ,तकर प्रमाण वेद ,पुराण ,उपनिषद् सभ मे प्राप्त होइत अछि | कहल जाइत अछि जे देवता केँ अमरत्व तँ प्राप्त छन्हि मुदा ओ सभ मोक्षक अधिकारी नहि| मिथिला मोक्ष भूमि थिक| एतय मृत्यु काल भूमि योग देल जाइछ आ ओ मृतक मिथिलाक भूमिक स्पर्श मात्र सँ सहज मोक्ष प्राप्त कए लैत छथि |

               मिथिला मे जन्मक पूर्वे सँ मृत्यु पर्यंत सोलह टा संस्कार करबाक परम्परा रहल अछि | ओना मिथिलाक धर्मशास्त्र आ आचार शास्त्र मे एहू सम्बन्ध मे
भिन्न भिन्न मत अछि| “ गौतम स्मृति’ मे४८ गोट संस्कार करव विहित कहल गेल अछि | महाऋषि अंगिरा २५ गोट संस्कार करव अत्यावश्यक कहल अछि | महामुनि ब्यास १६ गोट संस्कार केँ अत्यावश्यक मानल अछि |”मनुस्मृति” मे सेहो ब्यासैक कथनक समर्थन भेल अछि | मिथिला मे परम्परा सँ प्रचलित  १६ गोट संस्कार निम्न्न अछि |[१] गर्भाधान संस्कार [२] पुंसवन [३] सीमान्तोन्नयन [४] जातकर्म [५] नामकरण [६] निष्क्रमण [७] अन्न्प्राशन [८] चूड़ाकरण  [९] करणवेध [१०] उपनयन [११] वेदारम्भ [१२] केशान्त  [१३] वेद्स्नान [१४] विवाह [१५] विवाह्ग्नि परिग्रह [१६] त्रेताग्नि संग्रह |

गर्भाधान संस्कार ——-
युवावस्था मे विवाहक पश्चात गर्भ धारण करब आ माए बनब प्रकृति केर नियम अछि |
ऋतुस्नानांतर पति पत्नी माहेश्वर आचार्यक सम्मुख गणपति पूजा तथा पुणा्याह  वाचनक जल सँ  पवित्र भऽआचार्य केँ भोजन कराय आशीर्वाद लय रात्रि में शुभ मुहूर्त्त में श्य्यागृह प्रवेश कए शय्या पूजा कए वास्त्राभुषण सँ पत्नी  केँ प्रसन्न कए सम्भोग करय |एहि प्रकारक गर्भ धारण संस्कार सँ गर्भस्थ रज तथा बीज दोष नष्ट भय पवित्र आ तेजस्वी संतानक प्राप्ति होइत अछि  |     गर्भाधान संस्कार सँ संस्कृति ब्यक्ति ऋषि सरिस पूज्य किम्बा ऋषि तुल्य भऽ जाइत छथि | एहि में गर्भधारण ,गर्भ शुद्धिकारक हवन बीज तथा गर्भ संबंधी दोष –पाप नष्ट भय जाइत अछि |विधिपूर्वक संस्कार युक्त गर्भाधान सँ सुन्दर ,सुयोग्य मेधावी संतान उत्पन्न होइत अछि |गर्भाधान काल पुरुष वा स्त्री जाहि भाव सँ भावित होइत अछि ओकर प्रभाव रज आ वीर्य पर पडैत अछि आ संतानों मे ओहने भाव प्रकट होइत अछि |एतएब शुभ मुहूर्त में शुभ मन्त्र सँ प्रार्थना  कए गर्भाधानक विधान अछि | एहि सँ कामुक्ताक दमन होइत अछि |एहि संस्कार मे प्रजापतिक ब्याहृती मंत्रक उच्चारण द्वारा प्रजापतिक आह्वानक विधान अछि ,एकर अर्थ ई जे प्रजननक  कार्य लोकक आत्म विस्तारक कार्य थिक |ई भावना संस्कार सँ संस्कृत भय प्रजननक ब्यापार केँ पवित्र स्वरुप प्रदान करैत अछि |                             
मिथिला मे दाम्पत्य सम्बन्ध मात्र विषय वासनाक पूर्ति लेल नहि प्रत्युत सहैतुक निर्वेद द्वारा विषय वैराग्य प्राप्त कए सायुज्य मोक्षक मार्ग प्रशस्त करब थिक |पुं”नाम नरक सँ त्र –त्रान करबा मे सक्षम हेबाक कारणेँ पुत्र उत्पादन करब एहि संस्कारक अन्यतम उद्येश्य अछि |आजुक सहवासक उद्येश्य शून्य अछि आ एहि सँ अनावश्यक संतानक उत्पति होइत अछि जे पग पग पर माता पिताक महाकष्टक कारण बनैत अछि |आइ काल्हि कृत्रिम उपाय सँ गर्भधारण ,गर्भनिरोध ,आ गर्भपात कराओल जाइत अछि जे संस्कारक प्रतिकूल महापाप कर्म अछि |
मिथिला मे ऋषि ,मुनि ,आ दैवग्य ज्योतिषी लोकनि शुभ लग्न ,ग्रह नक्षत्रक  अध्ययन करैत रहैत छलाह आ शुभद समय में संयोग कए तेजस्वी महामानवक जन्म दैत  छलाह | उदाहरण स्वरुप परासर मुनि के मत्स्यगंधा नामक मल्लाह कन्या नाव खेबि नदी   पार करबैत छलीह |अकस्मात परासर मुनि देखल जे एकटा महादिव्य लग्न बीतल जाए रहल अछि |एहि मे जे स्त्री गर्भधारण करतीह तनिक कोखि सँ महा विद्वान शास्त्रज्ञ ऋषि प्रवरक  जन्मक संभावना अछि |आ  ओहि कन्या सँ नावे मे सम्भोग कए महामुनि ब्यासक जन्म देल   |
            मिथिला मे विवाहक
उपरान्त तीन सँ पांच साल तक कन्या पिताक गृह मे रहैत छलीह |एहि बीच यदि ओ रजस्वला होइत छलीह तँ कन्याक माए एकटा  नव ढाकन में फल फूल दय ओकरा लाल वस्त्र सँ झाँपि खावासिनीक द्वारा वरक ओतय पठबैत छलीह आ ई संकेत पाबि जामाता महोदय यथा अवसर आबि गर्भाधान संस्कार संपादित कए पत्नी सँ संपर्क साधि मेधावी .तेजस्वी संतान केँ जन्म दैत छलाह }मिथिला मे पूर्वक लोक नित्य वासनाक पूर्ति हेतु स्त्री संपर्क केँ विहित नहि मानैत छलाह |आब मिथिलो मे ई संस्कार लुप्त प्राय अछि |इएह कारण थिक जे आब एतहु ब्रह्म तेजक आभा नहि देखना जाइछ | ओना तँ जीव समस्त  केँ कामवासना आ शारीरिक आकर्षणक फलःस्वरूप नर मादा मे सहवास होइत अछि जकर परिणाम संतानोंत्पति अछि |किन्तु ई मैथुन वृत्ति पशु प्रवृति थिक |पशु सँ मानव बनबाक हेतु पाशविक वृत्ति पर धार्मिक संस्कारक आवरण देब आवश्यक |एहि संस्कारक अनुष्ठान तखन होइत अछि जखन पति पत्नी दूनू संतानोत्पतिक योग्य आ स्वस्थ होथि | गर्भाधान  संस्कारक लोप भेने आब एतय  केर अधिकाँश संतान तेजहीन .धीहीन ,श्रीहीन .स्वास्थ्य हीन जन्म लय रहल अछि |

पुंसवन संस्कार ——
पुत्र प्राप्तिक हेतु शास्त्र मे पुंसवन संस्कारक विधान अछि |मातृ गर्भ सँ पुत्र उत्पन्न हो एही लेल पुंसवन संस्कार कएल जाइत अछि |जखन गर्भ दू तीन मासक होइछ किम्बा गर्भिनीक गर्भ चिन्ह स्पष्ट भय जाइछ तखन पुंसवन संस्कारक विधान करब कहल गेल अछि | शुभ मंगल मुहूर्त्त मे माँगलिक पाठ कए गणेशादि देव पूजन कए वटवृक्षक नवीन अंकुर ,पल्लव तथा कुश मूल केँ जलक संग पीसि ओहि रसौषधि केँ पति द्वारा गर्भिणी केँ दाहिना नाकक पूरा सँ पिआओल जाइछ | एहि सँ अनुमान अछि जे गर्भक मांस पिंड मे पुरुषक चिन्ह उत्पन्न होइत अछि आ गर्भस्थ शिशुक रक्षा सेहो होइत अछि | असमय मे गर्भच्युत हेवाक सेहो संभावना नहि रहैछ | ई संस्कार हस्त ,मूल ,श्रवना ,पुनर्वसु ,मृगशिरा आ पुष्य मे सँ कोनो एक नक्षत्र मे पति वा बंशक कोनो पुरुष द्वारा करबाक विधान अछि | सम्प्रति इहो संस्कारक प्रचलन कमे बेश देखना जाइत  अछि |

सीमन्तोन्नयन संस्कार —-  सीमान्तोन्नयन संस्कार गर्भ धारण केर छः वा आठम मास मे करबाक विधान अछि | एकर उद्येश्य गर्भ शुद्धि अछि | प्रायः गर्भ मे चारि मासक उपरान्त शिशुक अंग प्रत्यंग ह्रदय आदि प्रगट भय जाइत अछि तथा चेतना आबि जाइत अछि |शिशु मे ईच्छा जागृत होमय लगैछ जे माए केर ह्रदय मे प्रतिबिंबित होमय लगैत अछि | एकरे “दोहद” कहल जाइत अछि | एहिकाल शिशु मे जे संस्कार देल जाइछ ओकर शिशु पर गंभीर प्रभाव पडैत अछि |एही काल मे प्रह्लाद केँ नारद द्वारा भक्ति उपदेश तथा अर्जुन पुत्र अभिमन्यु केँ चक्रब्यूह प्रवेशक शिक्षा भेटल छल | एहि संस्कार मे घृतयुक्त यज्ञ अवशिष्ट ,सुपाच्य पौष्टिक खीर आदि गर्भवती केँ भोजन देवाक  विधान अछि | एहि सँ गर्भस्थ शिशु केँ दीर्घ जीवन प्राप्त होइत अछि | एहि संस्कार मे पुरुष दुभिक तीनटा मूड़ी वा फलयुक्त गुल्लारिक टहनी सँ स्त्रीक सीथ केँ बीच सँ विभाजित करैत छथि आ केश मे जयन्ती बान्हि दैत छथि |स्त्री रातिक तरेगन देखबा तक मौन धारण करैत छथि आ मौनक समाप्ति गाएक  बाछाक स्पर्श कय करैत छथि | सम्प्रति मिथिला मध्य इहो संस्कार गोटेक सुसंस्कृत परिवार संपादित करइत छथि |

जातकर्म संस्कार —
एहि संस्कार सँ गर्भस्राव जन्य दोष नष्ट भय जाइत अछि | जन्म होइतहि ई संस्कार करवाक विधान अछि |नाल छेदन सँ पूर्व शिशु केँ स्वर्ण शलाका सँ मधु तथा घृत चटाओल जाइत अछि |स्वर्ण त्रिदोष नाशक अछि ,घृत आयुबर्द्धक तथा मधु कफ नाशक अछि | अतएब एहि तीनूक समिश्रण आयु ,लावण्य ,मेधाशक्ति बर्द्धक तथा पवित्रकारक होइत अछि | पुनः एहि संस्कार मे माएक स्तन नीक जेकाँ धो केँ शिशु केँ प्रथम दूध पिएबाक विधान अछि ,कारण माए केर रक्त आ मांस सँ उत्पन्न दूध शिशुक लेल सर्वाधिक पोषक पदार्थ अछि | एहि संस्कार केँ आइ आधुनिक विग्यानौक मान्यता प्राप्त अछि |एहि संस्कार मे आगिक धूनी मे सरिसव देल जाइत अछि | एकटा पाथर पर सोना तथा लोहा राखि ओकरा उनटाय पाथर पर शिशु केँ राखि कामना कएल जाइछ जे शिशु पाथर सनक दृढ ,लोहक सरिस रक्षक तथा स्वर्णक समान तपि कांतिमय बनल रहय | मिथिला मे एखनहुँ ई संस्कार आंशिक रूपेँ सम्पादन करवाक प्रचलन अछि |
नामकरण –संस्कार —–
जन्मक दस रातिक उपरान्त कुल क्रमानुसार नामकरण संस्कार करबाक विधि अछि | एकर अत्यंत प्रभाव कहल गेल अछि | नामेँ सँ ब्यक्ति तथा समुदायक प्रवृति तथा संस्कृतिक परिज्ञान होइत अछि | श्रीमद्भागवतक अजामिलक कथा मे नामक महत्व देखाओल गेल अछि | शिशुक नाम उपास्यमय हो | आइ काल्हि मिथिलो मे अधिकाँश लोक प्रत्येक कार्य मे पाश्चात्यक अंध अनुकरण करबाक चेष्टा करैत छथि से मैथिल संस्कारक कथमपि अनुरूप नहि अछि |  एहि संस्कार मे अग्नि स्थापन कएल जाइत अछि आ ओहि मे आहुति दय पृथ्वी तथा वरुणक  प्रार्थना कएल जाइत अछि | तदुपरांत दू सँ चारि अक्षरक नाम देल जाइत अछि | शिशु केँ नाम दुइ प्रकारक देल
जाइत अछि १, जन्म नक्षत्रक नाम जे गुप्त होइत अछि दोसर पुकारू नाम जे ब्यबहारक लेल अछि | नामकरण संस्कार हिन्दू चिंतनक  द्योतक अछि |नामकरण करबाक काल एहि बातक ध्यान राखल जाइत अछि जे संतानक पिता –पितामहक नामक एक आध नामाक्षर ओहि मे अवश्य आबय | नाम सँ क्रियाशीलता शिशु मे अएबाक चिंतन प्रधान अछि | सांसारिक जीवन मे वस्तु जेकाँ ब्यक्तिक स्वयं केर परिचय हेतु नामकरण केँ आवश्यक मानल गेल अछि | वास्तव मे नामकरण ब्यक्तिवाचक संज्ञाक निर्धारणक संस्कारित स्वरुप मानल गेल अछि |  नामकरण  संस्कार हेतु मिथिलाक प्राचीन ऋषि महर्षि अत्यंत वैज्ञानिक एबं सूक्ष्म चिंतन कय नामकरण सँ जातकक ब्यक्तित्वक  स्वरुप आत्मोन्नति कारक बनेबाक प्रयाश कएल अछि | सुविचारित नामकरणक पश्चात जातक नामक अनुरूप बनबाक आजीवन सतत प्रयाश करए से संस्कार देवाक प्रयत्न कएल अछि | एहि प्रकारेँ मिथिलाक सनातन धर्म मे नामकरण संस्कारक गहन वैज्ञानिक महत्व अछि |शिशुक नाम ऋषि ,मुनि .देवता ,देवी ,गुरु ,आदिक नाम पर मंगलकरी राखब उत्तम मानल गेल अछि |ई संस्कार मिथिलाक कुलीन परिवार मे एखनहुँ प्रचलित अछि |
निष्क्रमण –संस्कार —-
एकर फल आयुवृद्धि कहल गेल अछि | ई संस्कार शिशुक  चारिम वा छठम् मास मे करवाक विधान अछि |एहि में सूर्य तथा चंद्रादि देवताक पूजन कए शिशु केँ हुनिक प्रथम दर्शन कराओल जाइत अछि | शिशुक शरीर पृथ्वी ,जल ,तेज , वायु ,तथा आकाश सँ बनैत अछि तदर्थ एहि पंचभूत तत्व सँ शिशुक कल्याणक कामना कएल जाइत अछि | निष्क्रमण संस्कार मे लोकाचार अधिक प्रचलन मे अछि | ई प्रायः घर सँ बाहर नवजात शिशु केँ खूजल वातावरण मे लय जेबाक संस्कार अछि | आँगन सँ बाहर भूमि साफ़ कए नीपि पोति  ओहि पर स्वस्तिक चिन्ह बनाओल जाइत अछि तथा शिशु केँ सूर्य दर्शन कराओल जाइत अछि |एकर अभिप्राय असतक गर्भ सँ सत् क प्रकाश मे शिशु केँ अनबाक प्रयाश अछि | मिथिला मे ई संस्कार प्राचीन काल मे अवश्य मनाओल जाइत छल मुदा एखुनका समाज प्रायः एकरा विसरल जेकाँ अछि |                                                           

अन्न प्राशन संस्कार —–
एहि संस्कारक माध्यमे माएक गर्भ मे मलिन भक्षण जन्य दोष शिशु मे जे आबि जाइत अछि ओकर परिहार करब अछि | जखन शिशु छः सात मासक होइत अछि तँ ओकरा दाँत  निकलैत अछि ,पाचनक्रिया बढए लगैत अछि ,तखन ई संस्कार करबाक विधान अछि | शुभ मुहूर्त्त मे ईष्ट देवक पूजन कए माता पिता द्वारा सोंन  वा  चानीक शलाका सँ मन्त्र द्वारा शिशु केँ हविष्यान्न तथा पुष्टिकारक अन्न चटाओल जाइछ | एहि संस्कारक अन्तर्गत देवता ,ब्राह्मण आ कुमारि कन्या केँ स्वादिष्ट खाद्यपदार्थ निवेदित कए शिशु केँ अन्न खुएबाक विधान अछि | एहि मे दुग्ध पक्व अन्न अर्थात खीर खुएबाक प्रथा अछि| एहि मे अन्नप्राशन काल मे जे मन्त्र पढ़ल जाइत अछि ताहि मे कामना कएल जाइछ जे शिशु केँ शक्ति ,स्वाद आ सुगंधिक आनंद प्राप्त हो | एहि संस्कारक उद्येश्य अछि जे अन्न मानवाक लेल एकटा पवित्र आ अत्यावश्य्क वस्तु थिक ,एहि लेल एकर प्रथम आस्वाद मे एकर माधुर्यक परिचय तथा ऐन्द्रिक अनुभव प्राप्त हो | एहि में देव पितरक पूजा आ बन्धु वान्धव केँ भोजन करेवाक प्रथा प्रचलित अछि |

मुण्डन संस्कार —
एहि संस्कार केँ चूडाकरण ,चौल वा वपन संस्कार सेहो कहल जाइत अछि |एहि संस्कारक फल बल , आयु , तथा तेजो बृद्धि करब अछि |ई संस्कार प्रथम ,तेसर ,पंचम ,वा सप्तम वर्ष मे जन्मकालिक केशक मुंडन संस्कार थिक | ई केश एक प्रकार सँ पूर्वकालिक अशुचिताक अवशेष मानल जाइत अछि आ एकर मुंडनक उद्येश्य स्वास्थ्य तथा शरीरक नव संस्कार करव थिक | माथ  केर अंतर्गत जतय केशक भंवर होइत अछि ओतय सम्पूर्ण नाडी तथा संधिक मेल होइत अछि ,ओकर सुरक्षा लेल ओहि स्थान पर शिखा अर्थात टीक रखबाक विधान अछि | मुंडन सँ पूर्व शिशुक केश तीन बेि गर्म आ शीतल जल सँ धोल जाइत अछि | तखन मन्त्र द्वारा शुभ मुहुर्त्त्त मे हजाम द्वारा मुंडन कराओल जाइत अछि | बांसक पात ,शमी वृक्षक पातक संग शिशुक केश मातृे आँचर मे राखल जाइत अछि |बरुआक माथ मे दही हरदि मक्खन लगाय माँगलिक क्रिया आ गीत ,ब्राह्मण आ कुमारि आ बंधुबांधव केँ भोजन दय संस्कार संपादित कएल जाइत अछि |ई बालक तथा बालिका दूनू केँ करबाक विधान अछि  |
मिथिला में मुंडन संस्कार मे दैवग्य ज्योतिषी सँ बरुआक नामेँ शुभ लग्न आ दिन गुनाओल जाइत अछि | मुंडन सँ एकदिन पहिनेँ संध्याकाळ सपरिवार मिलि गोसओनि के अभिमंत्रित कए अभ्यर्थना कएल जाइत अछि | प्रातकाल आँगन गाएक गोबर सँ नीपि अरिपन दय बरुआक केश कटाओल जाइत अछि
एहिलए अवसर पर यथा विभव भोज आ परिवार कुटुंब केँ नव वस्त्र प्रदान कएल जाइत अछि आ गीत नादक संग उत्सव मनाओल जाइत अछि |
उपनयन –संस्कार —–
एहि संस्कार सँ ब्राह्मणत्वक प्राप्ति होइत अछि | कहलो गेल अछि” जन्मना जायते शुद्रः संस्कारात् द्विजोच्यते “| एहि संस्कार केँ लोक शिशुक दोसर जन्म सेहो कहैत अछि | “मातुर्यदग्रे  जायन्ते ,द्वितीय मौंजि बन्धनात्|
ब्राह्मण ,क्षत्रिय विशस्त स्मादेते द्विजा स्मृता |”
विधिवत जज्ञोपवीत धारण करब एहि संस्कारक मुख्य अंग अछि | एहि संस्कार द्वारा वटु केँ आत्यंतिक कल्याण निमित्त वेदाध्यन ,गायित्री जप तथा श्रौत स्मार्त कर्म करवाक अधिकार प्राप्त होइत अछि | ई संस्कार वैदिक तथा लौकिक शास्त्रक ज्ञान करबै बला वेदव्रत तथा विद्याव्रत स्थापन करैत अछि | वटु यज्ञोपवीत धारण कए ब्रह्मचर्य व्रत लय शिक्षादि ग्रहण हेतु गुरुकुल चल जाइत छलाह आ विद्याध्यानक उपरान्ते प्रायः बारह वर्षक
बाद पितृगृह वापस होइत छलाह | उपनयनक अर्थ अछि दोसर नयनक प्रादुर्भाव | एकर एकटा आओरो अर्थ अछि गुरूक निकट लय जाएब | ई मानवक आध्यात्मिक जगत मे प्रवेशक प्रथम द्वारि थिक | एक प्रकारेँ शूद्रवत शारीरक अंत आ तथा ओहि में एकटा नूतन भावक आविर्भाव वा जन्म होइत अछि | एक प्रकारेँ ई स्वछंदता मे स्वत्रन्ताक संक्रमणक प्रारम्भिक विन्दु थिक | गुरूक बंधन स्वीकार कय आत्म संयम सँ अपना केँ समष्टिक कामना सँ जोड़बाक प्रयाश अछि | उपनयन मे गायित्री ,सावित्री तथा सविताक दीक्षा देल जाइत अछि जे आत्मा केँ प्रकाशित कए सक्रिय  करैत अछि | उपनयन मे यज्ञोपवीत धारणक पश्चात ब्रह्मचर्य आश्रम मे प्रवेशक अधिकार प्राप्त होइत अछि | ब्रह्मचर्यक अर्थ ब्रह्माक कार्य करक थिक | एहि मे स्वाध्यायक संग विश्व सँ भीक्षा माँगक भाव निहित अछि | एहि सँ उदार दृष्टि प्रात होइत अछि | वटु केँ बुद्धि ,ज्ञान तथा मानसिक शक्ति सँ संपन्न कराओल जाइत अछि  | वटु केँ विशेष प्रकारक वेष धारण करबाओल जाइत अछि |देझ झँपबालय मृगचर्म ,कटि में  मुंज मेषला ,दाहिना हाथ में पलाश दंड देल जाइत अछि |ई सभ धारण करवाक अर्थ अछि जे स्व्देहक रक्षा करैत दृढ निश्चय सँ मन केँ नियंत्रित रखैत  ,ब्रह्मचर्य व्रत पालन करैत वेद विद्या पाप्त करब|                          
     मिथिला मे उपनयन अनेक विधि विधानक संग संपादित होइत अछि |साधारणतया एहि मे मासबधि समय लगैत अछि | एहि संस्कारक अंतर्गत सर्वप्रथम उद्योग पर्व वा  बँसकट्टी तदुपरांत मड़वा बंधन ,चरखकट्टी,,माँटिमंगल ,कुमरम ,जुटीकाबंधन,कौल्ही कल्याणी , आ उपनयन यज्ञ सम्पादित होइत अछि |एकटा बरुआक उपनयन मे एकटा आचार्य ,दूटा ब्रह्मा ;एकटा केश परिछनिहारि ,एकटा पुरोहित आ एकटा  हजामक प्रयोजन होइत अछि |उपनयनक सामिग्री मे मुख्यतया काठक रथ ,माँटिक हाथी ,श्रूव ,मेधडम्बर ,पलास दंड ,कांचकरची ,मृगचर्म ,शाहीकाँट ,ताम चानी वा लोहक अस्तुरा ,पवित्री ,कौपीन ,मुजक मेषला ,मौंजी ,होमक समिधा ,घृत ,प्रोक्षणी पात्र ,पूर्ण पात्र ,चौर ,सुपारी ,जनेउ ,खराम ,अग्निस्थापनक हेतु कांस्य पात्र ,कुश ,तील जव ,फल फूल आदिक प्रयोजन होइत अछि

वेदारम्भ संस्कार ——
उपनयनक पश्चात वटु केँ वेदाध्ययनक  अधिकार प्राप्त भऽ जाइत अछि| ज्ञान स्वरुप वेदक सम्यक अध्ययन सँ पूर्व “मेधा जनन “नामक एकगोट उपांग संस्कार करबाक विधान अछि जे बालकक मेधा ,प्रज्ञा ,विद्या ,श्रद्धाक अभिवृद्धि कए वेदाध्ययन  मे सहायक सिद्ध होइत अछि | वेदक अध्ययन सँ सभ पापक लोप तथा आयुक वृद्धि होइत अछि आ सभ सिद्धिक प्राप्त होइत अछि |    एहि संस्कार मे गणेश तथा सरस्वतीक पूजा करबाक पश्चात् वेदारम्भ आ विद्यारम्भ मे प्रवेश हएबाक विधान अछि | एहि संस्कार में चारि प्रकारक वेदव्रतक संकल्प लेल जाइत अछि | एहि संस्कार में वेद राशि रूपी आलोकित ज्ञानक लेल प्रजापतिक होम कएल जाइत अछि | तदनंतर संहिता ,ब्राह्मण ,आरण्यक उपनिषद ,ब्याकरण ,ज्योतिष ,छंद ,कल्प ,निरुक्त आदि वेदाँगक
शिक्षा आरम्भ कएल जाइत अछि | वेदारम्भ सस्कारक आरम्भ मे ब्रह्मचारी केँ आचार्य गायित्री मंत्रक उपदेश दैत छथि |वटु केँ  कौपीन ,कटिवस्त्र,उत्तरीय तथा दंड ग्रहण  करबाय प्रतिज्ञा करबैत छथि जे ओ क्रोध ,तथा अनृत आदि दुर्गुक त्याग ,अतिस्नान ,अतिभोजन ,अतिनिद्रा ,अतिजागरण सँ पृथक रहिलोभ ,मोह ,भय , शोकआदि सँ दूर रहताह | मेषला  दंड धरी भय भिक्षा माँगव दिनचर्या मे रहत |ओ अपन आचार्य सँ शास्त्रक अध्ययन करताह |संयम नियम सँ ओ अपन गुरुजनक सेवा मे तत्पर
रहताह |

केशान्त संस्कार —
वेदारम्भ संस्कारक उपरान्त ब्रह्मचारी गुरुकुल में वेदक अध्ययन करैत छथि |एहि काल में ओ ब्रह्मचर्यक  पूर्ण रूपेण पालन करैत छथि | ओ केश ,दाढी ,मौंजी ,मेषला धारण केने रहैत छथि |जखन हुनक विद्याध्ययन पूर्णता केँ प्र्राप्त कए लैत अछि तखन गुरुकुल मे केशान्त संस्कार संपादित होइत अछि | एहि संद्कार में प्रारम्भ मे गणेशादि  देवक पूजन कए यज्ञक सभ अंगभूत कर्मक सम्पादन कए केश आ दाढी कटेबाक विधान अछि |ई संस्कार उत्तरायण सूर्यक समक्ष प्रायः सोलह वर्षक अवस्था मे कएल जाइत अछि |

समावर्त्तन –संस्कार  —
समावार्त्तन विद्याध्ययनक अंतिम संस्कार थिक | विद्याध्ययन पूर्ण कए स्नातक ब्रह्मचारी अपन गुरूक आज्ञा पाबि अपन घर मे समावार्त्तित होइत छथि अर्थात वापस होइत छथि एतएव एकरा समावार्त्तन संस्कार कहल जाइत अछि | आब ब्रह्मचारी स्नातक गृहस्थाश्रम मे प्रेवश करवाक अधिकारी भय जाइत छथि |वेदमंत्र सँ गृह प्रवेशकाल जलक आठ कलश सँ विशेष विधि पूर्वक  स्नान कराओल जाइत अछि अतः एकरा वेद्स्नान संस्कार सेहो कहल जाइत अछि| एकर उपरान्त ब्रह्मचारी केँ मौंजी ,मेषला परित्याग कए गृह परिधान धोती ,छाता ,जूता ,माला .पगरी आभूषण धारण करबाक आ विवाहक अधिकार प्राप्त भय जाइत अछि |

विवाह संस्कार —–                                    “तदिदं विपर्या सेन सम्बन्धनयनं विवाहम्|”
विवाह स्त्री पुरुषक सम्बन्ध केँ सामाजिक मान्यता प्रदान करबाक तथा गृहस्थाश्रम मे प्रवेश हेतु स्त्री पुरुषक साहचर्य तथा सह धर्माचरणक भूमिका प्रारम्भ करैत अछि | विवाहक लेल अनेक शव्दक प्रयोग भेटैत अछि | उद्वाह अर्थात कन्या केँ उर्ध्व [ऊपर] लऽ जाएब विवाह ,अर्थात कन्या केँ विशेष प्रयोजन सँ लयजाएब ,परिणय ,कन्याक संग जीवन परिक्रमा करब ,तथा पाणिग्रहण अर्थात हाथ पकड़ब |एहि संस्कार द्वारा दू कुल में सम्बन्ध होइत अछि | विवाह संस्कारक पश्चात् स्त्री पुरुष मिलि पूर्णता प्राप्त करैत अछि | विवाह संस्कार एकटा आहुतिक तैयारी अछि जाहि मे  पति पत्नी दूनूक सहभागिता होइत अछि आ ओहि मे परिवार ,गाम, जनपद, देश आ विश्वक कल्याण भावना समाहित अछि |विवाह एकटा स्थायी सम्बन्ध थिक |विवाह मिथिले नहि प्रत्युत  भारतीय संस्कृति मे अत्यधिक महत्व रखैत अछि | एकर किछु नियम आ विधान अछि जाहि सँ स्त्री पुरुषक स्वेच्छाचारिता पर नियंत्रण राखल जाइत अछि | पाणिग्रहण संस्कार देवता मानव आ अग्निक साक्षित्व मे करबाक विधान अछि | मिथिला मे ई संस्कार दाम्पत्य सम्बन्धक जन्म जन्मांतर युग युगांतरक  सम्बन्ध मानल गेल अछि | आइ लोक विवाह केँ मात्र एकटा उत्सव मानैत छथि जे संस्कारक अर्थ नहि बुझैत छथि |सस्कारक अर्थ अछि दोषक नाश तथा गुणक प्रवेश वा जन्म |एहि सँ आत्माक उन्नत्ति होइत अछि |एहि सँ पवित्र प्रेम ,अर्थ धर्म काम, मोक्ष पुरुषार्थक प्राप्ति आ मर्यादाक पोषण होइत अछि |मिथिला मे एहि संस्कारक अंतर्गत वाग्दान ,मंडप निर्माण ,देव पूजा .आभ्युदयिक श्राद्ध ,मात्रिका पूजा ,आममहुविवाह, वरपूजन ,गोत्रोच्चार ,कन्यादान ओठंगर विधि जूटिका बंधन , ,पाणिग्रहण ,अग्नि प्रदक्षिणा ,लाजाहोम ,सप्तपदी ,अश्मारोहण ,ह्रदयस्पर्श ,ध्रुव दर्शन ,सिंदूरदान ,चतुर्थी कर्म कएल जाइत अछि मिथिला मे ब्राह्म विवाहक प्रथा अछि | कन्या केँ यथा शक्ति वस्त्रालंकार सँ विभूषित कए विद्या ,गुण संपन्न शीलवान वर केँ घर बजाए वैदिक विधि सँ कन्यादान कएल जाइत अछि | एतय विवाहक अंतिम विधि दनऽही  कए संपन्न कएल जाइत अछि                           

विवाहाग्नि परिग्रह —
विवाह संस्कार मे लाजा होम आदि जे अग्नि मे संपन्न कएल जाइत अछि ,ओहि अग्निक आरहरण तथा परिसमूहन आदि क्रिया एहि संस्कारक माध्यमे संपन्न होइत अछि | एहि अग्निक प्रदक्षिणा कए स्वस्तिकृत होम तथा पूर्णाहुति करबाक विधान अछि |विवाहक उपरान्त जखन वर वधु अपन घर जाए लगैत छथि तखन ओहि स्थापित अग्नि केँ अपन घर आनि कोनो पवित्र स्थान में प्रतिष्ठित कए अपन कुल  परम्परागत नुसार सायं प्रात हवन करबाक विधान अछि | आब ई संस्कार मिथिलो मे समाप्त प्राय अछि |
त्रेताग्निसंग्रह संस्कार ——-
विवाह मे संस्कारक अंत मे आनल गेल “  आवसथ्य “अग्नि प्रतिष्ठित कएल जाइत अछि आ ओही सँ स्मार्त कर्म आदिक अनुष्ठान कएलजाइत अछि | एहि स्थापित अग्निक अतिरिक्त तीन अग्नि दक्षिणाग्नि ,गार्हपत्य तथा आह्वानीय अग्निक स्थापना तथा ओकर रक्षादिक् विधान अछि |इएह तीनू अग्नि त्रेताग्नि कहबैछ जाहि में श्रौत कर्म संपादित होइत अछि |

अंत्येष्ठि संस्कार —-
उपरोक्त सोलह संस्कारक अतिरिक्त किछु आचार्य लोकनि मृत शरीरक अंत्येष्ठि क्रिया केँ सेहो एकटा संस्कार मानल अछि | मिथिला मे एकर विधान निम्न अछि –
“ मृत्यु सँ पूर्व गाएक गोबर स भूमि नीपि कुशाच्छादित कए कारी तिल छीटि ओहि  पर मरय बला केँ उत्तर सिरमे चित्त सुता देवाक चाही |गोदान कराय तुलसी पात गंगाजल मुँह मे दैत रहबाक चाही |ओतय उपस्थित सभ जन के हरिस्मरण करबाक चाही | मृत्यु भय गेलाक उपरान्त मृतक के शमसान मे लय  जाय स्नान कराय ,नववस्त्र धारण करबाय उत्तराभिमुख चिता मे स्थापित करबाक  विधान अछि | तदुपरांत औरस पुत्र वा सपिंडी या सगोत्री ब्यक्ति सुसंकृत अग्नि सँ मन्त्र सहित मुखाग्नि प्रदान करए | अग्निदाता केँ तेसर दिन अस्थि संचय कए बारह दिन तक सपिंड पर्यंत सभ कर्म संपादित करबाक चाही |पुनः मृतक केँ प्रेतत्व सँ मुक्ति हेतु दशगात्रादि श्राद्ध  करबाक चाही |    ,
“मधुकर ३,६, २०१३ ,

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