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मिथिलाक कुलदेवी भगवती गोसाउनिक परम्परागत पूजा आ सीर पाटक मान्यता

परमात्माक पुरुषवाचक सभ स्वरुप  अनादि ,अबिनाशिनी ,अनिवर्चनीय,सर्वशक्तिमयी ,परमेश्वरी ,आद्या महाशक्ति भगवती गोसाउनिक स्वरुप थिक |एही शक्ति सँ ब्रह्मादि देवताक अवतरण होइत अछि जाहि सँ विश्वक उत्त्पत्ति, आदि स्थिति होइत अछि |एही शक्ति सँ विष्णु आ शिव प्रकट भय जगतक पालन आ संहार करैत छथि | ई दया ,क्षमा , निद्रा ,स्मृति ,क्षुधा ,तृष्णा .तृप्ति ,श्रद्धा ,भक्ति ,धृति ,मति ,तुष्टि ,पुष्टि ,शान्ति ,कान्ति.लज्जा ,इत्यादि एही भगवतीक महाशक्तिक शक्ति थिक |ई गोलोक में श्री राधा ,साकेत मे श्री सीता ,क्षीर सागर मे लक्ष्मी ,कैलाश पर दक्षकन्या ,दुर्गति नाशिनी दुर्गा ,वाणी,विद्या ,सरस्वती ,सावित्री ,तथा गायित्री थिकीह | ई सूर्यक प्रभाशक्ति ,चन्द्रमाक सुधावर्षणी शोभाशक्ति ,अग्निक दाहिकाशक्ति ,वायुक वहन शक्ति ,जलक शीतलता ,धराक धारण शक्ति तथा शस्यक  प्रसूति शक्ति थिकीह | शास्त्रोक्त भगवतीक ईएह स्वरुप सरल स्वरुप धारण करैत करैत परमात्म रूपिणी माएक उपासना भगवती गोसाउनिक रूप मे मिथिला मे अपन पद्धति सँ परम्परा सँ प्रचलित अछि |हिनक सभ स्वरूप कल्याणमयी अछि | काली ,तारा ,चंडीक रूप भक्तक हेतु भयकारी नहि प्रत्युत राक्षसक हेतु भय दायिनी अछि | मातृ रूप केहनो हो ओ अपन बच्चाक लेल भायावन नहि ,बल्कि वात्सल्यमयी आ दयामयी होइत अछि |एही मातृशक्तिक  उपासना मिथिला मे भगवती गोसाउनिकरूप मे परम्परा सँ होइत आबि रहल अछि |
मिथिला परम्परा सँ शक्ति उपासनाक केंद्र भूमि रहल अछि | अदौ सँ तिरहुतिया
पंचदेवोपासक अछि जाहि मे शक्तिक मान्यता सर्वोपरि अछि | एतय आदि देवी शक्ति केँ उद्भवस्थिति,संहारकारिणी, तथा क्लेशहारिणी मानि आधि दैविक रूप सँ सर्वश्रेयषकरी आ आधि भौतिक रूप सँ भगवती शक्ति दात्री सुख सौभाग्य प्रदात्री मानलि गेल छथि | ई प्रायः मिथिलाक सभ हिन्दू जातिक घर मे कुल पूज्या छथि | प्रत्येक परिवारक एकटा घर मे तीर्थ ,नदी आ पवित्र सप्त मृतिका सँ हिनक पिणडीक निर्माण कएल जाइत अछि | हिनक स्थापन आ प्राणप्रतिष्ठा शस्त्रीय पद्धति सँ करवाक विधान अछि | मिथिला मे पारिवारिक कोनो माँगलिक यज्ञ कार्य बिना हिनक अभ्यर्थना सँ प्रारम्भ नहि
होइछ |मुण्डन ,उपनयन ,विवाह ,द्विरागमन मे हिनक प्रथम भक्ति भाव सँ आराधना कएल जा इत अछि आ यज्ञक पहिल पाता निवेदित कएल जाइत अछि | ई कुलदेवी प्रत्येक कुलक भिन्न भिन्न होइत छथि | कुलक पूर्वज अपन –अपन सहायक ,उपकारी ईष्ट देवी केँ चूनि हुनक स्थापन आ प्राणप्रतिष्ठा दय नित्य पूजा कए अपन हितैषी देवीक मान्यता प्रदान कएने छथि | प्राचीन कालहि सँ परमेश्वरक नारी रूप देवी ,शक्ति स्वरूपा दुर्गा ,काली ,चण्डी ,तारा ,पद्मा ,शितला ,बिषहरि इत्यादि अनेक नाम सँ प्रसिद्द छथि आ हुनिक पूजा युग युग सँ लोक प्रचलित रहल अछि| मिथिले नहि देवी पूजा समस्त भारत मे कोनो ने कोनो रूप मे प्रचलित अछि | ई देवी सभ प्रकृति आ मायाक पर्याय मानल गेल छथि |महाकवि विद्यापति अपन गोसाउनिक वंदना मे”जय जय भैरवि असुर भयाओनि पशुपति भामीनि माया “कहि अभ्यर्थना कएल अछि | ई गोसाउनि मिथिलान्तर्गत भिन्न भिन्न कुलक भिन्न भिन्न नाम धारिणी छथि| खोजक क्रम मे अधिकाँश परिवार मे हिनक जे तीन स्वरुप प्राप्त भेल अछि से थिकीह महालक्ष्मी ,महासरस्वती ,आ महाकाली |
महालक्ष्मी — ई देवी कुल परिवार केँ सभ प्रकारेँ वैभव प्रदायिनी देवी थिकीह | हिनक आराधना सँ दरिद्रा भागि दूर चल जाइछ आ कृपाक स्वरुप धन ,विभव ,सुख .समृद्धि प्राप्त होइत अछि | मानवाक हेतु सभ सँ कठिन दुःख दरिद्रता केँ मानल गेल अछि | अभावक स्थिति मे लोक शील ,संयम ,विवेक  ज्ञान आ लोकमान्यता सँ वंचित रहैत अछि |मिथिला मे परम्परा सँ प्रचलित अछि जे कुलदेवीक रूप मे महा लक्ष्मीक अराधना कएने ओहि बंश केँ हिनक कृपा सँ कोनो प्रकारक अभावाक कष्ट नहि भोगय पडैत अछि |लोक हिनक आराधना लाल फूल .पान ,नवैद्य ,नारिकेल आ लाल पाटक आँचर चढ़ाय आ परम्परागत स्तुति गीत सँ कएल जाइत अछि — —
“हे ,महा लक्ष्मी ,हे ,महामाया ,| करहु कृपा निज जन पर दाया _|
अन्न ,वस्त्र ,गृह ,गुजर योग्य हो | वैभव सुखकर सतत भोग्य हो |
निर्मल मन हो ,निर्मल काया | हे ,महा लक्ष्मी ——
लाल कमल केर देलहुँ आसन | सोना चानी केर सभ वासन |
करू कुटुंब सहित प्रतिपालन ,माँगी संतति सेवक सज्जन |
देहु भक्त करुणा केर छाया | हे !महालक्ष्मी ,हे !महामाया |
हिनक अभ्यर्थना संस्कृतक बीज मन्त्र सँ
केने इष्ट साधन होइतii अछि |
महासरस्वती —- भगवतीक दोसर स्वरुप मे महासरस्वतीक आह्वान कएल जाइत अछि |ई अनुगत केँ विद्या ,ज्ञान प्रदायिनी छथि |हिनका श्वेत कमल ,श्वेत वस्त्र आ श्वेत वस्तु सँ आराधना कएल जाइत अछि |मान्यता अछि जे यदि कुल मे एकोटा सरस्वती पुत्र अर्थात विद्वान जन्म लिअए तँ सात पुश्त तक नाम यश लोक चर्चित रहैत अछि | हिनक स्तुति गीत द्रष्टब्य —
“हे ! जग जननी ,मातु शारदे , बुद्धि ज्ञान भण्डार भरू माँ !
दास केँ नहि कखनहुँ बिसरू माँ ,
अज्ञानक अन्हार हरू माँ !
भव केर माया बिचरि रहल छी ,गरिमा ज्ञानक कोष भरू माँ |
मोह जाल तुअ बिसरि रहल छी ,भाव बंधन मे ससरि रहल छी ,
महासरस्वती हे ,कुल देवी ,हे ,वरदायिनी ,दया करू माँ |
महाकाली —- ई देवी दुष्ट दानव संहार कारिणी सकल कष्ट विपदा केँ टारि अनुगतक उद्धार कारिणी छथि | हिनक अराधना लाल अरहूल फूल तथा कारी वस्त्र सँ कएल जाइत अछि | ई बलि सँ अत्यधिक प्रसन्न होइत छथि |
प्रस्तुत अछि हिनक स्तुति गीत—
१,“सिंह पर एक कमल राजित ताहि ऊपर भगवती |
दाँत ख़ट-खट जीह लह -लह ,स्वर्ण दन्त मढावती |
असुर बध कय खप्पर भरि भरि,शोणित पीबथी कालिका |
घालिका माँ दुष्ट दानव ,संत सज्जन पालिका |
२, |सिंह सवार कमल दल आसन ,काल बिनासिनी माँ काली |
लाल लाल अरहूल के माला ,मैया खड्ग खप्पर वाली |
जिह्वा लाल शोनितक धारा ,विकट स्वरूपा माँ काली |
कृपा दृष्टि हेरथि जगदम्बा ,सदा रहय मुख पर लाली |”
मिथिलाक समाज मे कुलदेवी भगवतीक तीन पिंडी मे एकटा काली ,दोसर शीतला ,आ तेसर विषहरि देवीक पूजा अर्चा होइत अछि |
शितला माए रोग शोक हारिणी ,छथि | कुल परिवारक सकल दुःख दैन्य हरण कए ई सतत भक्त जनक ह्रदय मानस शीतल रखैत छथि |मिथिला मे कोदवा ,दामस ,बड़ी माता छोटी माता नामक रोग महामारीक स्वरुप धय पसरि उठैत छल आ लोक एकरा देवीक कोप मानि रोग मुक्ति लय एकटा कल्पित देवी शितलाक पूजा अर्चना कए त्रानक कामना करैत छल | मिथिला मे एकटा वर्ग छल पचनियाँ जे अपना केँ माँ शितलाक भक्त कहि रोगीक प्राकृतिक उपचार आ पूजा करैत छल आ बदला मे पारिश्रमिक प्राप्त करैत छल |  हिनक पूजा अर्चना पीतवस्त्र दूवि नीमक पात सँ कएल जाइत अछि _ | हिनक स्तुति गीत मे हिनका सँ आरोग्यक कामना कएल  जाइत अछि —
“रोग ,सोग ,दुःख हरु माँ शितले ! करू आरोग्य प्रदाने माँ |
अहाँ दयामयि, अहँ करुणामयि ,दिय अभय वारदाने माँ |
मानव काया रोगक छाया ,आधि बेयाधिक दावानल अछि ,
अहँक अहैतुक कृपा बिना माँ ,अनुगत संतति भक्त विकल अछि ,
जननी बिनु के सूत परिपालत ? हमर ने आन ठेकाने माँ !
विषहरि——ई विष हारिणी,सर्प भय बिनाशिनी तथा अभय दायिनी देवी छथि |मिथिला नदीक क्षेत्र अछि | एकर उत्तरी सीमा पर नेपाल अछि |नेपालक पहाडी पर अत्यधिक वर्षा भेने एतय सभ साल भयानक बाढ़ि अबैत छल आ बाढिक संग अशंख्य विषधर आबि जाइत छल आ सर्प दंश सँ अनेको लोक काल कबलित भय जाइत छल| सर्प दंशक उपचार एक मात्र ओझा गुणी आ झार फूंक छल | एतय केर लोक एकरो देवी प्रकोप मानि सर्प पूजा प्रारम्भ कएल आ सर्प माताक रूप मे विषहरि देवी केँ प्रसन्न करवाक लेल घरे  घर हिनक पिंडी स्थापित कए अर्चना प्रारम्भ कएल |कुल बंश मे ककरो सर्प दंश सँ मृत्यु नहि हो ताहि लेल हिनक आराधना कएल जाइत अछि | हिनक स्तुतिक गीत  द्रष्टब्य—-
१,“ विषहरि,विशहरि ,मैया है ,करै छी पुकार ,राम ! विषहरि काया माया नेह अपार |
भूल चुक छमियोउ मैया रहियोऊ उदार ,राम! मैया क्रोधे होएत दुनियाँ उजार |
अहाँ जगदम्बा राखू ह्रदय विशाल , राम ! पूजा लय संतति करू प्रतिपाल ||”
२, नामी नामी केसिया विषहरि अँगना लोटाय ,राम !अँह बिनु विषहरि कियो ने सहाय| |विषहरि ,नाग मैया ,करू ने कल्याण ,राम ! अहीँ केर हाथ में अम्बे ,जीव केर प्राण |
पूजा करब मैया ,दूध लाबा देव ,राम ! कंठ लगौता विषहरि देव ,महादेव |”
एबम क्रमे कोनो परिवार में तीनटा भगवतीक पिंडी मे काली ,दुर्गा आ भवानी छथि |
भवानी — ई माँ पार्वतीक पर्याय स्वरूपिणी छथि | ई भव भय सँ त्रान दायीनी ,अपन प्रजावर्ग केँ शिशुवत् पोषित कए सतत कल्याण प्रदायिनी छथि | ई शिव प्रिया ,गणेश जननी ,उमा ,गिरिजा क रूप मे सेहो पूजित छथि ,|देखू हिनक अराधनाक एकटा गीत — “हे ,भवानी ,दुःख हरू माँ ,पुत्र अबला जानि केँ|
हम निराशा मे फंसल छी ,कहब ककरा कानि केँ|
हम भजन पूजा ने जानी ,एकटा रटना भवानी ,
दीन प्रतिपालन करू माँ ,अपन संतति मानि केँ|
विष्णु ,शिव ,विधि शरण गेलहुँ, कए तपस्या फल ने पेलहुँ’
अहीँ शक्ति स्वरुप सभहक , शरण एलहुँ मानि केँ |”
दुर्गा —-असुर भय बिनासिनी ,अशुभ ग्रह संकटादि सँ त्रान दायिनी ,अपन भक्त जनक सतत कल्याण पथ प्रदायिनी छथि | ई आदि शक्ति भगवती दुर्गाक रूप मे हिनक आराधना कएल जाइत अछि |  अष्टभुजा धारिणीक अभ्यर्थना पूजा तंत्राधारित मन्त्र तथा बलिक माध्यमे कएल जाइत अछि|वर्षक सभ नवरात्रा मे हिनक विशेष पूजा अर्चा करवाक विधान अछि |हिनक प्रीत्यर्थ निवेदित एकटा स्तुति गीत —
“दुर्गा दुर्गति नाशिनी अम्बे ! असुर संहारिणी माँ ,जगदम्बे !
सृष्टि कारिणी ,पालन हारिणी , खड्ग धारिणी माँ अम्बे !
दीन हीन अबलम्बे माता ,स्वजन रक्षिणी जगदम्बे
दुःख ,शोक भय ,रोग बिनासिनी ,देहु अभय वर माँ अम्बे ,
कोंनहु घर परिवार मे भगवतीक सीर मे चौदहो देवान सेहो स्थापित रहैत छथि जाहि मे धर्मराज , सोखा सोमनाथ ,जयराज .उदयराज ,कालिदास आदि छथि | ई भगवतीक सेवकगण छथि से माएक भक्तक सभ प्रकारेँ रक्षा मे सनद्ध रहैत छथि | हिनका लोकनिक पूजा भगवतीक संग देव रूपेँ होइत अछि |
मिथिला मे गोसाउनिक बिभिन्नता कोना ,कहिया ,भेल से कहब संभव नहि अछि अनुमान अछि जे कुलक पूर्वज केँ जाहि देवीक भाव भक्ति सँ कोनहुँ कष्ट ,शोक सँ त्रान प्राप्त भेल ,अभ्यर्थना सँ कल्याण भेल ओ हुनका अपन कुल देवीक रूप मे पूज्य मानि स्थापित कएलन्हि जे परम्परागत मान्यता प्राप्त कए पीढी दर पीढी चल अबैत अछि | एहि कुलाचार मे परिवर्त्तन परिबर्द्धन
अमंगलकारी मानल गेल अछि |
अनेक परिवार मे नव दुर्गाक रूप मे सँ कोनो कोनो सेहो पाओल जाइत अछि | किछु घर मे वाग्लामुखी ,घुमावती,चण्डिका ,तारा ,कस्तुरा ,शाकम्भरी ,ज्वालामुखी ,भ्रामरी ,कंकाली मातंगी ,आदि बिभिन्न देवी प्रतिष्ठित भेटतीह |एहि मे किछु पौराणिक आ किछु लोक कल्पित देवी छथि |एहि सभटाक नाम आ विवरण देब संभव नहि |बिभिन्न्ता रहनहुँ ई एकटा तथ्य सर्वब्यापी अछि जे ई सभ मिथिलाक कुल पूज्या गोसओनि छथि |घर परिवारक कोनो माँगलिक कार्य मे हिनक विशेष रूपेँ मात्रिका पूजा होइत अछि जाहि में भगवतीक सीरा मे सोलह मातृकाक बिभिन्न नामेँ पंचोपचार पूजा आ घृतढार देवाक प्रथा अछि | एहि षोडस मात्रिका मे क्रमशः –
१,दुर्गा २, गौरी ३., पद्मा ४, शची ५, मेधा ६, सावित्री ७, विजया ८,जाया ९, देवसेना १०, स्वधा ११, स्वाहा १२, मातरः १३ लोकमातरः १४, हृष्टि १४ पुष्टि १५, तुष्टि १६, आत्म्कुल देवता ,|–                 ,
मिथिला मे समन्वित रूपेँ भगवती गोसाउनिक आराधना ,आँचर ,फूल .पान ,धुप ,दीप ,मधुर ,झाप ,मौर ,अरिपन ,पातरि आ कुमारि भोजनक माध्यमे होइत अछि | किछू भगवती केँ परम्परा सँ बलि प्रदान देल जाइछ आ शेष केँ फल फूल मधुर निवेदित कए अभ्यर्थना कएल जाइत अछि | आब हम मिथिला मध्य प्रचलित भगवतीक मैथिली गीत प्रस्तुत कए रहल छी |
१, काली के महिमा अपार हे ,जगदम्बे माता !
अँह बिनु वसुधा अन्हार हे ,जगदम्बे माता !
गंग यमुन सँ माँटि मंगाएब ,उँचगर सुन्दर पिरिया बनाएब ,
आँचर सँ करब श्रृंगार हे ,जगदम्बे माता !
कोने फुल ओढन माँ के ,कोने फुल पहिरन? ‘
कोने फुल माँ के श्रृंगार हे ,जगदम्बे माता !
बेली फुल ओढ़नमाँके ,चमेली फुल पहिरन .
अरहुल फुल माँ के श्रृंगार हे ,जगदम्बे माता !
ओढ़ि पहिरि काली ठाढ़ि भेली गहवर ,
सुरुजक ज्योति मलीन हे ,जगदम्बे माता !|
२, चन्द्र लहि लहि चक्र गहि गहि ,खड्ग कर माता भगवती |
स्वर्ण आसन ,रतन वासन ,ताहि बैसाएब माता भगवती |
सोना के झारी गंगाजल पानी चरण पखारव माता भगवती |
रूपा थार बत्तीसो ब्यंजन ,भोग लगाएब माता भगवती |
सोनक थार कपूरक बाती ,आरती उतारब माता भगवती |
३,अम्बे अम्बे ,जय जगदम्बे ,जय जय कार करै छी हे |
त्रिभुवन माता अहँ जगजननी ,करुना नयन तकै छी हे !
सिंह वाहन कमल आसन ,बैसल अहाँ हँसै छी हे !
योगिनी झालि मृदंग बजाबय ,अहँ सभ केँ नचबै छी हे |
चुनि चुनि दुष्ट संहार करै छी ,भक्त आश पुरबै छी हे !
अहँ कल्याणी मातु भवानी ,विनती अहँक करै छी हे !
४, तारा नाम तोहार ,हे जननी काली नाम तोहार |
युग युग केर माँ शक्ति स्वरूपा ,तीनू भुवन आधार हे जननी ,काली नाम—-
अष्ट भुजा मे अश्त्र शस्त्र गहि सिंहक उपर स्वर हे जननी ,
सुर नर मुनि जन ध्यान करै छथि ,क्यों नहि पाबय पार हे जननी ,तारा नाम तोहार —
५, ,जय जय दुर्गा ,जय माँ तारा ,| जय महालक्ष्मी विद्यागारा |
दुर्गति नाशिनी दुर्गा जय जय | काल विनाशिनी काली जय जय |
उमा ,रमा ,ब्रह्माणी जय जय | राधा सीता माता जय जय |
जयति गोसाउनि जननी अम्बे | जयति भगवती जय जगदम्बे |
पूजा अर्चा किछु नहि जानी | करहु कृपा बुझि सुत अज्ञानी |
एहि प्रकारेँ मिथिला मे शक्तिक अनेक रूप केँ एक भगवती गोसाउनिक रूप मे महाश्क्तिक पूजा आ सिर पाट कएल जाइत अछि |
“मधुकर “२९-५-२०१३

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