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Manjusha Art

मंजूषा कला:-

मंजूषा कला अंग देश की प्राचीन राजधानी चंपा, अब भागलपुर एवं उसके आस -पास के क्षेत्रों से की प्राचीन विषहरी पूजा से जुड़ी हुई है.
मंजूषा कला को राष्ट्रीय विरासत में भी शामिल किया गया है. मंजूषा बांस ,जूट ,पुआल और कागज के बने मंदिर के आकार के बॉक्स जैसे हैं ,जिन्हें सावन और भादो माह के सिंह नक्षत्र में विषहरी पूजा के अवसर पर बनाया जाता है.
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक ‘ संस्कृति के चार अध्याय’ में द्वितीय शताब्दी के चंपा का जिक्र किया है.चंपा अंग प्रदेश (अब ,भागलपुर)की राजधानी थी,जो बाली के पुत्र अंग के नाम पर पड़ा था.यह मौर्य शासक सम्राट अशोक के साथ – साथ 12 वें तीर्थंकर वासुपूज्य की जन्मस्थली भी है.मंजूषा कला को विश्व की प्रथम कथा आधारित चित्र कला माना जाता है ; मंजूषा कला में तीन रंगों का प्रयोग होता है ये है हरा गुलाबी और पीला ! इसे अंगिका चित्रकला भी कहते है जो आधुनिक समय में भागलपुर क्षेत्र के रूप में विख्यात है ! मंजूषा कला में बॉर्डर धार्मिक चिन्हों और x रूपी आकृति में पात्रों को दर्शाया जाता है ! साँप भी प्रमुखता से इस कला में उपयोग होता है !

मंजूषा कला से जुडी लोकगाथा –
मंजूषा कला की कथा छठी शताब्दी ईसापूर्व की है.भगवान् शिव की मानस पुत्रियाँ मनसा , मैना ,अदिति,
जया और पद्मा, लोगों द्वारा भगवान शिव ,पार्वती,गणेश और कार्तिक की पूजा किये जाने से ईर्ष्यालु होकर भगवान शिव के पास गई और अपनी समस्या बताई. भगवान शिव ने कहा कि ,तुम पृथ्वी पर तभी पूजी जाओगी, जब चंपा के निवासी चांदो तुम्हारी पूजा करेंगे.इतना सुनने के बाद मनसा चांदो के पास गई और उनकी पूजा करने को कहा,लेकिन चांदो ने इंकार कर दिया.
इससे कुपित होकर व्यापार के लिए जा रहे चांदो के नाव को उसने डुबा दिया , इससे चांदो(चंद्रधर) के छह पुत्रों की डूबने से मौत हो गई, फिर भी चन्द्रधर ने उनकी पूजा करने से इंकार कर दिया. चंद्रधर के सातवें पुत्र बाला लखेन्द्र का विवाह बिहुला से हुआ. इतनी लम्बी अवधि के बाद भी मनसा बहनों का क्रोध थमा नहीं था और बाला को विवाह के रात ही मारने की धमकी दी ,तथापि एहतियाती उपाय के रूप में लोहे और बांस से बने घर में बाला और बिहुला को रखा गया. लेकिन विवाह की रात,सर्प के डंसने से बाला की मौत हो गई .
बिहुला ने विश्वकर्मा से मंजूषा के आकार का एक बड़ा नाव तैयार करवाया और अपने पति के शव को लेकर , देवताओं से अनुरोध कर , उसे पुनर्जीवित करवाने के लिए देवलोक रवाना हुई.देवताओं के अनुरोध पर बाला की जिंदगी वापस मिल गई और कहते हैं कि बाला और बिहुला देवलोक से वापस लौट आए. तब उन्होंने चंद्रधर को मनसा (विषहरी) की पूजा के लिए मनाया.
तब से विषहरी पूजा ,लगातार तीन दिनों के लिए भाद्र माह के सिंह लग्न में मनाया जाता है , क्योंकि इसी दिन बाला को सर्प ने डंसा था.ऐसा विश्वास किया जाता है कि सर्प की देवी की पूजा करने से, सर्प के काटने का भय नहीं रहता. इस दिन बाला और बिहुला से संबंधित नाटकों का भी मंचन होता है.

मंजूषा कला इसी गाथा का चित्र रूपांतरण है !

मंजूषा 4 कोने पर बनता है, लेकिन कुछ विशेष प्रकार के मंजूषा में 6 एवं 8 कोने भी होते हैं. मंजूषा के विशेष प्रकार में, कई अलग अलग तरह के डिजाइन एवं सुंदर बनाने के लिए अन्य सामग्रियों का भी उपयोग किया जाता है. सामान्य या विशेष तौर पर, मंजूषा में पत्ते,विषहरी बहनों, व्यापारी चंद्रधर, बाला लखेंद्र, मगरमच्छ, चंपा प्रदेश और सांप के चित्र बनाये जाते हैं, जिनमें जीवन के पूर्ण रंग के साथ शानदार तरीके से बाला-बिहुला की कहानी का चित्रण बोर्ड पर किया जाता है. मगरमच्छ ,गंगा, चाँद, सूरज आदि के प्रतीक मुख्य रूप से महत्वपूर्ण हैं. बिहुला के खुले बालों के साथ चित्र और बगल में सांप एवं विषहरी बहनों के प्रतीक बनाये जाते हैं.मंजूषा कला को आम तौर पर जीवंत बनाने के लिए हरा, पीला और लाल रंगों का इस्तेमाल किया जाता है.
यह विश्वास किया जाता है कि आज भी भागलपुर और उसके आस-पास उसी तरह से मंजूषा का निर्माण होता है जैसा विश्वकर्मा के द्वारा बनाया गया था.प्रत्येक वर्ष सिंह नक्षत्र के आगमन के साथ ही लोग मंजूषा बनाना प्रारंभ करते हैं. लाल , हरे और पीले मंजूषा देखने में काफी आकर्षक लगते हैं .
प्रसिद्द पुरातत्वविद डॉ. बी. पी. सिन्हा ने 1970 -71 में चंपा (भागलपुर) क्षेत्र में उत्खनन के दौरान कई सर्पाकार मूर्तियों ,जिनमें मानव सिर थे ,पाया.संभवतः यह सिन्धु सभ्यता से जुड़े लगते हैं.खुदाई से प्राप्त ‘ टेरेकोटा सर्प कला ‘ के प्राप्त होने से यह भी जानकारी मिलती है कि उस समय अंग प्रदेश में सर्प की पूजा प्रचलित थी.
मंजूषा कला. कला की कहानियाँ आस्था से जुडी होती हैं, जो हर युग में एक नए ही रूप में आती हैं, कौन जानता है कि ये कथा सच होगी, पर मंजूषा कला सच है, उस कला में उकेरी जाने वाली विषहरी सच हैं. हर चरित्र एक कहानी गढ़ता है, हर चरित्र एक कहानी कहता है, वह चित्र के माध्यम से हम सबमें उस कला के प्रति प्रेम उत्पन्न करता है. और शायद यही प्रेम रहा होगा जिसने ब्रिटिश अधिकारी आर्चर को 1940 के आसपास मंजूषा को देखकर उन्हें लन्दन भिजवाने के लिए प्रेरित किया. इन्हीं आर्चर साहब ने मधुबनी को भी पहचान दी, और इन्होने ही मंजूषा को दुनिया तक पहुंचाया
.
Artists and awards
1. First time in 2012, Late Chakravarty Devi awarded with SITA DEVI AWARD in the field of Manjusha Art.
2. In 2013, Shrimati Nirmala Devi awarded with Bihar Kala Award “SITA DEVI AWARD”.
3. In the field of Manjusha Art, First State Award given to Shri Manoj Pandit for his work towards revival of indigenous art form “Manjusha Art”. This award is given by Upendra Maharathi Shilp Anusandhan Sansthan & Dept. of Industries, Bihar.
4. On Recommendation of Art, culture and youth affairs department, Bihar; Ministry of Culture (Sanskriti Mantralaya) awarded ‘Manjusha Kala Guru Award’ to Shri Manoj Pandit in 2014.
5. In 2016 – Ulupi Jha is one of the100 successful women across the country selected by the Union ministry of women and child development on the basis of online voting for her Manjusha painting.

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