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History of Mithila

मिथिलाक इतिहास
वैदिक युगक भूमिका:- प्राचीन वैदिक साहित्‍यकेँ अंग मगध आ मिथिलाक कोनो स्‍पष्‍ट उल्‍लेख नहि भेटइत अछि। ऋग्‍वेद संहितामे उपरोक्‍त तीनू खण्‍डमे सँ कोनो खण्‍डक नाम उल्लिखित नहि अछि। ऋग्‍वेदक तेसर अष्‍टकक ५३म सूक्तक चौदहम ऋचामे ‘कीकट’क उल्‍लेख अछि आ ओहिठामक राजा ‘प्रमगन्‍द’क सम्बन्‍धमे बहुत रास निन्‍दनीय बात सेहो। यास्कक अनुसार ‘कीकट’ देशमे अनार्य लोकनिक निवास छल। सायणाचार्य एहि मतसँ सहमत होइतहुँ आगाँ कहैत छथि जे ‘कीकट’क निवासी नास्तिक छलाह आ योग, दान, होम इत्‍यादिपर हुनका लोकनिकेँ एक्को रत्ती विश्‍वास नहि छलन्हि। ओ लोकनि इहलोकिक छलाह आ परलोकमे हुनका लोकनिकेँ कोनो प्रकारक विश्‍वास नहि छलन्हि। ओ लोकनि भौतिकवादी छलाह। वायुपुराणक गया माहात्म्य पाँचालमे कहल गेल अछि—
“कीकटेषु गया पुण्‍या नदी पुण्‍या पुन: पुन:,
च्‍यवनस्‍या श्रमं पुण्‍यं पुण्‍यं राजगृहं वनम्”।
एहिसँ स्पष्ट अछि जे ‘कीकट’ दक्षिण विहारमे छल आ ओहिठामक निवासी भौतिकवादी दर्शनमे विश्‍वास रखैत छलाह। ‘कीकट’क सम्बन्धमे वैदिक विद्वान लोकनिक मध्‍य मतभेद अखनो बनल अछि आ आहि विवादमे पड़ब हमरा लोकनिक हेतु एतए आवश्‍यक नहि बुझना जाइछ।
एहन मानल जाइत अछि जे संहिता कालमे आर्य-सभ्‍यताक प्रधान केन्‍द्र सरस्‍वती आ हृषदूती नदीक मध्‍यमे छल आ ओहि स्‍थानकेँ मनु ब्रह्मावर्त्त कहने छथि। ब्राह्मण कालमे आहि संस्‍कृतिक केन्‍द्र छल कुरू–पाँचाल जकरा मनु ब्रह्मर्षि देश कहने छथि। शतपथ ब्राह्मणमे कुरू पाँचाल देशक विशेष प्रशंसा भेल, अछि आ ऐतरेय ब्राह्मणमे आर्य देशक हेतु अस्‍याँ श्रुवायां प्रतिष्‍ठायां विशेषणक प्रयोग भेल अछि। सदानीरा नदी (गण्‍डक) पार ककए जखन आर्य लोकनि मिथिलाक क्षेत्रमे उतरलाह तखन अत्‍यंत द्रूतगतिसँ आर्य संस्‍कृतिक प्रसार आहि क्षेत्रमे भेल आ मिथिला विदेह समस्‍त पूर्वी भारतमे आर्य सभ्‍यताक प्रसार-प्रचारक एकटा प्रधान केन्‍द्र बनि गेल।
कोनो संहितामे स्‍पष्‍ट रूपे विदेहक उल्‍लेख नहि भेटइत अछि। तैत्तिरीय आ काठक संहितामे “वैदेह्य”, “वैदेही” एवँ “वैदेह” शब्दक प्रयोग भैटेत अछि परञ्च आहि सभहिक व्‍यवहार गाय आ बरदक हेतु भेल अछि। ऐतरेय ब्राह्मणमे जाहिठाम आर्य देशक चर्चा भेलो अछि ताहुठाम “विदेह’’ शब्दक पृथक उल्लेख नहि भेटइत अछि। काशी, कोशल, मगध, अंग, आदि शब्‍द संग ‘विदेहो’केँ प्राच्य देशमे साटि देल गेल अछि। ‘विदेहक’ पृथक उल्लेख स्‍पष्‍ट रूपें शतपथ ब्राह्मणमे भेटइत अछि ओहिठाम इ कहल गेल अछि जे विदेघ माथव अपन पुरोहित गौतम राहूगणक संग वैश्‍वानर अग्निक अनुशरण करैत-करैत सरस्‍वती नदीक तीरसँ सदानीराक तीर धरि पहुँचलाह। एहिसँ पूर्व आर्य लोकनि सदानीराक पारकर पूब दिसि नहि गेल छलाह तै तँ इ एक महत्‍वपूर्ण घटना मानल जाइत अछि। वैश्‍वानर विदेघ माथवकेँ सदानीरा टपबाक आदेश देलथिन्‍ह। विदेघ अपन पुरोहितक संग ओकरा पार केलन्हि आ तखनेसँ ओ देश ‘विदेह’ कहबे लागल। सदानीरा विदेह आ कोशलक बीचक सीमा रेखा बनल।
ताहि दिनसँ विदेह आर्य सभ्‍यताक प्रधान केन्‍द्र बनि गेल। शतपथ बाह्मणक शेष अध्यायमे जनकक दरबारक कथा सुरक्षित अछि। मिथिलाक राजा जनक अपना ओहिठाम देशक विभिन्‍न भागसँ ब्रह्मज्ञानी लोकनिकेँ आमंत्रित कऽ कए बजबैत छलाह, आ हुनक दरबारमे तँ कुरू पाँचालसँ बरोबरि ऋषि-मुनि लोकनि आबिते रहैत छलाह। ऋषि याज्ञवल्क्य विदेहमे रहैत छलाह आ ताहु हेतु मिथिलाक प्रसिद्ध समस्‍त आर्यावर्तमे छल। जनक याज्ञवल्क्य तँ बुझु जेना आर्य संस्‍कृतिक द्योतक बुझल जाइत छलाह आ ब्रह्मज्ञानक क्षेत्रमे हिनका लोकनिक कोनो ककरोसँ तुलना ताहि दिनमे नहि छल। कुरु पाँचालक ऋषिगणक कुटियामे शिक्षित रहितहुँ याज्ञवल्क्य जखन जनकक ओहिठाम शास्‍त्रार्थमे पहुँचलाह तखन ओ ओहिठाम उपस्थित कुरू पाँचालक ऋषिगणकेँ शास्त्रार्थमे पराजित केलन्हि आ अपन विद्वताक प्रकाश सेहो। हुनक वचन मात्र अध्‍यात्‍म विधेटामे नञ अपितु वैदिक क्रियाकलापमे सेहो सर्वथा प्रामाणिक मानल जाइत छल। परम्परामे हिनका शुक्‍ल यजुर्वेदक प्रवर्तक मानल गेल अछि। शतपथ ब्राह्मण एवँ बृहदारण्यकोपनिषदक अनेकानेक स्‍थल पर जनक–याज्ञवल्क्यक ब्रह्मज्ञानक विवेचनाक वर्णन अछि आ ठाम-ठाम विभिन्‍न ऋषि लोकनिक शास्‍त्रार्थक सेहो। ब्रह्मज्ञानक हेतु तैतिरीय ब्राह्मणमे सेहो राजा जनकक प्रशंसा कैल गेल अछि। जनक ब्रह्मज्ञानक हेतु केहेन प्रसिद्ध रहल हेताह तकर एकटा सामान्‍य संकेत हमरा लोकनिकेँ कौशीतकी उपनिषदक एक कथामे भेटइत अछि जाहिमे कहल गेल अछि कि गर्गवंशक ‘बाल्मकि’ नामक एक ब्रह्मज्ञानी काशीराज अजातशुत्रक ओतए ब्रह्मज्ञानक निरूपणकेँ जखन पहुँचलाह तँ राजा हुनकासँ प्रसन्‍न भए एक हजार गाय देलथिन्‍ह आ कहलथिन्‍ह जे देखु तइयो लोक सब “जनक-जनक’’ चिकैरि रहल अछि। वैदिक युगमे ब्रह्मज्ञानक चरम उत्‍कर्ष विदेहमे भेल छल। ब्रह्मज्ञान आर्य संस्‍कृतिक चरम उत्‍कर्ष बुझल जाइत छल–वैदिक मंत्रक उत्‍थान ब्रह्मावर्तमे, क्रिया कलापक विकास ब्रह्मर्षि देशमे एवँ “ब्रह्मविद्या”क विवेचन विदेहमे भेल। एहि हेतु ताहि दिनसँ समस्‍त आर्यावर्तक लोककेँ विदेह आवए पड़इत छलन्हि। विदेह पूर्वी भारतमे वैदिक कालमे आर्य सभ्‍यताक प्रधान केन्‍द्र छल। एहिठाम क्षत्रिय सेहो वेदवत्ता होइत छलाह।
संस्‍कृत साहित्‍य मध्य मिथिला, विदेह एवँ तीरभुक्तिक वर्णनः
बालकाण्‍ड (बाल्‍मीकि)मे मिथिलाक वर्णन एवँ प्रकारे अछि-
रामायण (बालकाण्‍ड, सर्ग४८)- “रामोऽपि परमांपूजाँ गौतमस्‍य महामन:”
सकाशाद् विधिवत् प्राप्य जगाम मिथिलाँतत”॥
अनर्घ राघवमे (अंक २)
“श्रृणोषि विदेहेषु मिथिलां नाम नगरीम”
जयदेव-प्रसन्‍नराघव-(अंक २)
“तदिह मिथिलायां पंचरात्र निवासेन श्रमोपऽनेतव्‍य।
प्रसंगादयं च राजा जनको द्रष्टव्यः।”
रघुवंश-(सर्ग–११)
“संन्‍यमन्‍वयन सम्भृतक्रतु हेतु मैथिलः
स मिथिलां व्रजन् वशी”।
नैषधीयचरित-(सर्ग–१२)
“अपीयमेनं मिथिला पुरन्दरं निपीय दृष्टि: शिथिला स्तुते वरम्।”
‘रामायण चम्‍पू’ (बालकाण्‍ड)
“अथ मिथिलां प्रतिप्रस्थित:
कौशिकस्‍तमित्थम कथयत्”
दशकुमारचरित (उत्तरपीठिका–३ उच्छ्वास)
“एषोब्रऽह्मस्मि पर्य्यटने कदा गतो
विदेहेषु मिथिलाम प्रविश्यैव”
कथासरितसागर (जम्बक ३, तरंग–५)
“ददो वैदेह देशे च राज्यं गोपालकार्यसः।
सत्कार हेतोर्नृपतिः श्वशुर्यायानुगच्छतेः॥
भृंगदूत (गंगानंद झा)-१७म शताब्दी–
“गंगातीरावधिरधि गता यद् भुवोभृंगभुक्ति
नीम्नासैव त्रिभुवनतले विश्रुता तीरभुक्तिः॥
भृंगदूतमे दरभंगाक वर्णन एवँ प्रकारे अछि–
नस्यापाथः परमाविमणं सन्निपियाभिरामा–
गारांकामायुध दरभंगा राजधानी-मुपेयाः॥
रघुवीर कवि–“लक्ष्मीश्वरोपायना”मे–
“देशाः संतु सहस्त्रोऽपिममतु स्वाभाविक प्रीतये,
श्रेयान् देश विशेष एषं मिथिलानामा क्षमामंडले”।
बदरी नाथ झा- ‘गुणेश्वर चरित चम्पू’
“अस्तिस्वस्ति समस्त भूमिबल श्रेय प्रशस्तीश्रुता
प्रत्यर्थिस्मयमन्थनाप्त मिथिला नामाऽभिरामाकृति:।
प्रेक्ष्माशालिविपश्चिदालिललितोत्संगाऽभिषंगार्दिनी,
नीवृद्-वृन्दम चर्चिकाऽर्चिततरश्रीस्तीरभुक्तिः सदा”।
गंगा गण्डकी संगमसँ पश्चिम सुप्रसिद्ध सोनपुर टीसनक समीप जे हरिहर क्षेत्र अछि तकरो उल्लेख भृंगदूतमे भेटइत अछि। एहि भृंगदूतमे गाण्डवीश्वर स्थान, ब्रह्मपुर, वाग्वती (वाग्मती) एवँ कमला नदीक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। कहबी छैक जे गाण्डवीश्वर महादेव राजा जनकक दक्षिणक द्वारपाल रहथिन्ह आ ओ स्थान सम्प्रति जोगिआरा टीसनक समीप अछि। ओना मिथिला नामसँ प्राचीन जनक राजक राजधानीक बोध होइछ परञ्च एतए स्मरण राखबि आवश्यक जे मिथिला, तीरभुक्ति, विदेह, आदि शब्द एक एहन भौगोलिक इकाइक द्योतक थिक जे गंगाक उत्तरमे छल आ विभिन्न छोट-छोट गणराज्यमे बटल छल। प्राचीन कालक बिहारमे गंगाक दक्षिणमे छल अंग आ मगध आ उत्तरमे छल मिथिला जकरा अंतर्गत कैकटा छोट–छीन राज्य सब छल। जातक कथा आ जैन साहित्यक अतिरिक्त वृहद विष्णुपुराणक मिथिला महातायमे मिथिलाक जे वर्णन अछि ताहिसँ एकर महत्व एवँ जनप्रियताक पता लगइयै। एहि मिथिलाक अंतर्गत छल तँ प्राचीन कालक वैशाली जकर विस्तृत विवरण रामायण, रामायण चम्पू एवँ भृंगदूतमे भेटइत अछि। प्राचीन ‘विशाला’ नगरिये बौद्ध कालक वैशाली थिक। विशालाक नामक अद्यतन “बिसारा” परगनासँ होइत अछि। एहि क्षेत्रमे एकटा भैरव स्थान सेहो छल जकर चर्च भृंगदूतमे भेल अछि। बाल्मिकीय रामायणक बालकाण्डमे गौतमाश्रम अहल्यास्थानक उल्लेख भेल अछि। अहियारी गाँव (कमतौल टीसन)सँ अधुना एकर बोध होइछ। भृंगदूतमे “सरिसव” ग्राम आ कोटिश्वर महादेवक उल्लेख सेहो भेटइत अछि।

मिथिलाक संस्थापक आ हुनक वंशावली
१.निमि(विदेह)
२.मिथि (जनक)
३.उदावसु
४.नन्दिवर्धन
५ सुकेतु
६.देवरात
७.बृहद्रथ
८.महावीर्य
९.सुधृति
१०. धृष्टकेतु
११.हर्यस्व
१२.मरू
१३.प्रतिबन्धक
१४.कृतिरथ
१५.देवमीढ
१६.विवुध
१७.महाधृति
१८.कीर्तिरात
१९. महारोमा
२०.सुवर्ण रोमा
२१.ह्रस्वरोमा
२२.सिरध्वज ***** हिनकर अयोनिजा कन्या सीता ,योनिजा
उर्मिला
२३. भानुमान
२४. शतद्युम्न
२५.शुचि
२६. ऊर्डावह
२७ .सत्यध्वज
२८.कुणि
२९अञ्जन
३०.ऋतुजित
३१.अरिष्टनेमि
३२.श्रुतायु
३३.सुपार्श्व
३४.संजय
३५.क्षेमारी****महाभारत मे पाण्डव के विरूद्ध दुर्योधनक
पक्ष मे युद्ध केनिहार
३६.अनेनस्
३७. मीनरथ
३८ .सत्यरथ
३९.सत्यसारथि
४०.उपगु (रू)
४१.श्रुत
४२.शाश्वत
४३.सुधन्वा
४४.सुभाष
४५.सुश्रुत
४६.जय
४७.विजय
४८.ऋत
४९.सुनय
५०वीतहव्य
५१.धृति
५२.बहुलाश्व
५३.कृति…….

सा०म०म०परमेश्वरझा.
आधार ग्रंथ -वाल्मीकि रामायण
वृहद विष्णु पुराण
महाभारत

मिथिला आ नेपाल
नेपाल शब्दक उद्गम एखन धरि रहस्यमय अछि। अति प्राचीन कालसँ नेपालक इतिहास मिथिलाक इतिहास संग निकटतम रूपें संबंधित अछि। मिथिला एहेन स्थान रहल अछि जाहिठाम नाना प्रकारक धार्मिक आन्दोलन एवँ दर्शनक उत्पत्ति भेल छैक आ नेपाल ओहि आन्दोलन सबकेँ उर्वरा शक्ति देलकै जाहिसँ वो आन्दोलन सब पुष्पित वो फलदायक भेल। नेपालमे आर्यत्वक विकास मिथिले बाटे भेलैक। एहिठाम हम मिथिला आ नेपालक मात्र राजनैतिक सम्बन्धक चर्चा करब।
किरातः- भूतकालक कुहेसक मध्य नेपालक प्रारंभिक इतिहासक विषयमे किछु विशेष ज्ञात नहि अछि। ई.पू. ५९०सँ ११०ई. धरि नेपाल किरात संस्कृतिक प्रधान केन्द्र छल। किरातक वर्णन शुक्ल यजुर्वेदमे आएल छैक। इहो कहल जाइत छैक जे अति प्राचीन कालसँ किरात लोकनि पूर्वी नेपालमे रहैत जाइत छलाह। ‘किराते’ शब्द जंगली अनार्य जातिकेँ सूचित करैछ जे पहाड़पर एवँ भारतक उत्तरपूर्वी भागमे रहैत छलाह। सिल्वाँ लेवीक विचार छन्हि जे किरातक उत्पत्ति मंगोलसँ भेल छल आ दुनू एक्के छलाह। महाभारतसँ ज्ञात होइछ जे जखन अर्जुन हिमालयमे तपस्या करैत छलाह तखन महादेव किरातक भेषमे अर्जुनक परीक्षा लेने छलाह। महाभारतक वनपर्वमे एकटा किरातपर्व सेहो अछि आ यजुर्वेद शतरूद्रीयसँ सेहो एहिपर प्रकाश पड़इयै। भारतक उत्तरी पूर्वी सीमा सेहो किरात संस्कृतिसँ सम्बन्धित छल। ओ सब पूर्वी हिमालयक वासी छलाह। अपन दिग्विजयक क्रममे भीमकेँ विदेह देश छोड़लाक पश्चात किरात सबसँ भेंट भेल छलन्हि। किरात लोकनि पीअर रंगक होइत छलाह। लेभीक अनुसार किरातक सम्पर्क चीन आ म्लेच्छसँ सेहो छलन्हि। रामायणसँ सेहो प्रमाणित अछि जे किरात लोकनि पीअर रंगक होइत छलाह। विष्णु पुराण एवँ मार्कण्डे पुराणसँ ज्ञात होइछ जे इ लोकनि पूर्वी भारतमे रहैत छलाह। वो हिमालयक दक्षिणी मार्गपर सम्पूर्ण उत्तर–पूर्वी भारतमे, नेपालसँ सटले उत्तरी बिहारमे आ गंगाक उत्तरी भागमे बसि गेल छलाह। इ उएह प्रदेश छल जाहि मध्यसँ चीनक व्यापार भारतक गंगावर्ती धरातलसँ होइत छलैक। नेपाल–मिथिलाक संस्कृतिक इतिहासमे हिनका लोकनिक महत्वपूर्ण स्थान छैक। प्रारंभमे संभवतः किरात लोकनि नेपालक स्थानीय राजवंशी छलाह।
नेपालपर किरात लोकनिक राज्य बहुत दिन धरि छलन्हि। वो लोकनि ई.पू, ६००सँ संभवतः नेपालपर राज्य करैत छलाह। हिन्दू संस्कृतिक विकासमे वो नेपालमे भारतीय मंगोलियनक प्रमुखताक हेतु सब पृष्ठाधार बनौलन्हि। प्रायः ई.पू.३१२मे जखन संभूत विजय मरि गेला तखन जैन धर्मावम्बीमे विभाजन भेल आ तकर पश्चात उत्तर भारतमे बारह वर्ष धरि अकाल रहलैक। भद्रवाहु नामक एक जैन साधु अकाल भेलापर दक्षिण दिसि चल गेला आ अकाल समाप्त भेलापर घुरला। जैन धर्मसँ छुटकारा लए ओ अपन शेष जीवन व्यतीत करबाक हेतु नेपाल चल गेला। जैनी सबहक जुटान पटनामे भेल आ हुनका तकबाक हेतु स्थूलभद्र नेपाल गेला आ ओतए हुनकासँ चौदह पर्व पओलन्हि। गौतम बुद्धक जन्म तँ नेपाल क्षेत्रमे भेल परञ्च ओ नेपाल भ्रमण केने छलाह अथवा नहि से कहब कठिन। अशोकक प्रयाससँ नेपालमे बौद्ध धर्मक प्रसार भेल। कहल जाइछ जे कौटिल्यकेँ सेहो नेपालक पूर्ण ज्ञान छलन्हि। अशोकक समकालीन नेपालमे छलाह स्थुमिको। नेपाल उनक हेतु विशेष प्रसिद्ध छल। लुम्बिनीमे अशोक ४८ गोट स्तूपक निर्माण करौने छलाह आ स्थुमिकोक शासन कालमे वो स्वयं नेपालो गेल छलाह। अशोकक समयमे नेपालक शासन किरात लोकनिक हाथमे छलैक। अशोकक पुत्री आ जमाय नेपालमे छलाह। अशोकक बादो दशरथक प्रभाव नेपालमे बनल छलैक। नेपाल आ मिथिलाक सम्पर्क मौर्य साम्राज्यक ह्रासक समय धरि बनल छलैक। शूंग कालक मुद्रा पश्चिमी नेपालसँ प्राप्त भेल अछि जाहि आधारपर इ अनुमान लगाओल जाइत अछि जे शुंग लोकनिक एक प्रकारक दुर्बल नियंत्रण नेपालपर छलन्हि। कुषाण लोकनिक शासन चम्पारण धरि छल आ तिरहूतोपर हुनका लोकनिक प्रभाव छलन्हि। नेपालपर कुषाण शासन हेबाक समर्थन स्वर्गीय जायसवाल महोदय केने छथि। कुषाण मुद्राक पता काठमाण्डु लग सेहो लगलैक अछि तैं जायसवाल महोदयक विचारकेँ मान्यता भेटइत छैक। ‘रधिया’ नामक ग्रामसँ सेहो कतेक रास ताँमाक मुद्रा विम कैडफिसेज आ कनिष्कक भेटल छैक आ जँ एहि प्रमाणपर किछुओ विश्वास कैल जाइक तँ कुषाण शासनक प्रमाण सिद्ध होइत छैक।
कैक शताब्दी धरि नेपालपर शासन करैत काल किरात सबकेँ जखन–तखन अनायास विड़रो सबसँ संघर्ष करए पड़लन्हि। राजनैतिक अस्थायित्वक रहितहुँ ओ सांस्कृतिक जीवन आ राजनीतिक नियमक स्थापनामे बहुत किछु केलन्हि। किछु विद्वानक मत छन्हि जे इण्डो मंगोलाइड सब सर्वप्रथम भारतपर शासन केलन्हि आ तब नेपाल गेला। सुसंस्कृत इण्डो मंगोलाइडक रूपमे नेपालक नेवारक उल्लेख भेल छैक। नेवार लोकनि प्रायः ई.पू. तेसर शताब्दीमे एला। ताधरि अशोक पाटनमे बहुत रास बौद्ध चैत्यक निर्माण कऽ चुकल छलाह। तहियासँ ओहि क्षेत्रमे बौद्ध धर्मक प्रसार बनले रहल आ बादमे महायान सम्प्रदायक पद्धति ओ विचार सेहो बिहारेसँ ओतए गेल। ओहिठामक शैव, शक्ति आ वैष्णव धर्मक सम्बन्धमे सेहो इएह कहल जा सकैत अछि। इ सभ आंशिक रूपमे उत्तरी बिहारक आरंभक मंगोलाइडक प्रतिक्रिया स्वरूप छल। आर्यीकरणक पूर्व मिथिला सेहो किरात संस्कृतिक प्रधान केन्द्र छ्ल। इण्डो मंगोलाइड एकटा सामूहिक संस्कृतिक विकासमे पैघ योगदान देलन्हि।
११०ई.क आसपास किरात वंशक अंत नेपालमे भेल आ तखनसँ लऽ कए २०५ ई. धरि नेपालक इतिहास अन्धकारपूर्ण अछि। एहि बीच कोनो लिखित प्रमाण नहि भेटइयै। गुणाढ़यक ‘बृहत्कथा’मे नेपाल देशक शिव नामक नगरमे राजा यशकेतुक शासन करबाक उल्लेख भेटइयै। कखन आ कोन प्रकारे किरात लोकनिक ह्रास भेल से हमरा लोकनि नहि जनैत छी आ ने तकर कोनो ठोस सबुते भेटइत अछि। इहो कहल जाइत अछि जे ‘निमिष’ नामक एक गोट राजा नेपालमे विजय प्राप्त केने छलाह आ निमिष राजवंश करीब १४५ वर्ष धरि ओतए शासन केने छलाह आ एहि वंशमे पाँच गोट राजा भेल छलाह– निमिष मनाक्ष, काकवर्मन, पशुप्रेक्ष देव, आ भास्कर वर्मन। एहि राजवंशक समयमे आर्य लोकनिकेँ नेपालमे शरण भेटलन्हि। पशुप्रेक्ष देव नेपालमे पशुपतिनाथक मन्दिरक स्थापना केलन्हि आ भारतसँ आर्यसबकेँ अनलन्हि। एकर बाद नेपालमे लिच्छवी वंशक शासन शुरू होइत अछि।
लिच्छवी वंशक इतिहास:- लिच्छवीक सम्बन्ध मनु लिखैत छथि–
“द्विजातयः सर्वणासु जनयन्त्य व्रतांस्तुयान्।
तांसावित्री परिभ्रष्टान् व्रात्यानितिविनिर्हिशेत्॥
व्रात्यातु जायते विप्रात्पापात्मा भूजकण्टकः।
आवंत्यवाट धानौच पुष्पधः शैख एवचः॥
झल्लोमल्लश्च राजन्यांद् व्रात्यन्निच्छिविरेवच।
नरश्य करणश्चैव खसाँ द्रविड् एवच”॥
(एहि सम्बन्धमे देखु हमर “व्रात्यज इन एंसियेंट इण्डिया”)
लिच्छवी लोकनिक सम्बन्ध नेपालसँ बड्ड घनिष्ट छलैक। किछु विद्वानक विचार छन्हि जे इहो लोकनि मंगोलाइडसँ अद्भुत छलाह। नेपालक मल्ल, खस आदिक कोटिमे मनु लिच्छवी (निच्छवी)केँ रखने छथि। लिच्छवी लोकनिक प्रभाव मिथिलामे अत्यधिक विकसित छलैक आ ओतहिसँ इ लोकनि नेपाल धरि अपन शक्तिक प्रसार केलन्हि। नेपालमे किरात शासनक अवसान भेलापर सोमवंशी एवँ सूर्यवंशी लोकनिक शासनक संदिग्ध प्रमाण अछि। निमिष वंशकेँ सोमवंशी कहल गेल अछि आ ओकर बादे सूर्यवंशी राज्यक स्थापना भेल।
लिच्छवी लोकनि निमिष वंशकेँ उखाड़ि फेकलन्हि आ तकर बाद लगभग ५००वर्ष धरि नेपालपर शासन केलन्हि। नेपाली संवत जे १११ई.सँ आरंभ छैक सैह संभवतः लिच्छवी लोकनिक राज्यारोहणक संकेत दैत अछि। ओहुना अखन इएह मान्य अछि जे लिच्छवी लोकनि नेपालमे इस्वी सन् प्रथम शताब्दीक समीप अपन साम्राज्यक स्थापना केने छलाह आ अपन संवतक प्रारंभ सेहो। सूर्यवंशी शासनक स्थापनाक पश्चाते नेपालमे यथार्थ एतिहासिक कालक प्रारंभ मानल जाइत अछि। दुनू राजवंश मिथिलासँ आएल छल एहि सब राजवंशक समयमे नेपाल आ मिथिला नियमित रूपें राजनैतिक आ साँस्कृतिक सन्दर्भ बनल रहलैक। प्रथम ऐतिहासिक राजा भेलाह जयदेव। हुनका आ जयदेव द्वितीयक बीचमे 33टा राजा भेल छलाह।
समुद्रगुप्तक समयमे नेपाल गुप्त साम्राज्यक चाङ्गुरमे पड़ल छल। प्रयाग प्रशस्तिसँ एकर स्प्ष्टीकरण होइछ– नेपालक सीमांत शासकक सेवा प्राप्त करबाक संदर्भ अछि। सूर्यवंशी लिच्छवी कोनो शासक नेपालमे तखन रहल होएताह जनिका हेतु “प्रत्यन्त नेपाल नृपति” शब्दक व्यवहार कैल गेल अछि। मिथिलासँ नेपाल धरि तखन लिच्छवी लोकनिक विस्तार छलन्हि आ समुद्रगुप्त लिच्छवी दौहित्र छलाह तैं एहि घटनाकेँ मात्र घरेलु घटना मानल जा सकइयै। एहि युगमे नेपालमे वैष्णवबादक प्रवेश भेल। मान देवक चंगुनारायण मन्दिरक शिलालेख एवँ आन–आन शिलालेखसँ इ ज्ञात होइछ जे लिच्छवी राजा लोकनि बौद्ध धर्म, ब्राह्मण धर्म, शैव धर्म, वैष्णव धर्म, शाक्त आदि सबकेँ प्रोत्साहन दैत छलाह। नरेन्द्र देवक शासन कालमे मत्स्येन्द्र नाथ नामक संप्रदायक प्रचलन भेल। लिच्छवीक समयमे महायान शाखा सेहो अपन आकार ग्रहण केलक। लिच्छवी लोकनि ३५०सँ ८९९ धरि शासन केलन्हि–बीचमे मात्र अंशुवर्मन आ जिश्नुगुप्त छोड़िकेँ जे स्वतंत्र शासन केने छलाह।
अंशुवर्मन:- महासामंत अंशुवर्मन सातम शताब्दीक पूर्वार्द्धक एकटा महत्वपूर्ण शासक भेल छथि। वो अपनाकेँ महासामंत कहने छथि। वो बेश शक्तिशाली शासक छलाह आ तराइ राज्यक विशिष्ट भागकेँ अपना राज्यमे मिला लेने छलाह। अपन राज्यक विस्तार ओ बेतिया धरि कऽ लेने छलाह जतए हुनक साम्राज्यक सीमा हर्षक साम्राज्यसँ मिलैत छल। प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य चन्द्रवर्मन एवँ नालन्दा विश्वविद्यालयक प्रसिद्ध शिक्षक अंशुवर्मनक दरबारक शोभा बढ़ौने रहथिन्ह। अंशुवर्मन जाहि नेपाल राज्यक स्थापना केलन्हि ताहि परम्पराकेँ जिश्नुगुप्त रखलन्हि आ बढ़ौलन्हि। ६४३मे अंशुवर्मनक मृत्युक पश्चात नरेन्द्र देवक नेतृत्वमे नेपालमे लिच्छवी शासनक पुनर्जन्म भेलैक।
लिच्छवी शासन नेपालमे किछु अवधि धरि रहलैक एकर प्रमाण हमरा मंजूश्री मूलकल्पसँ भेटइत अछि–
“भविष्यति तदाकाले उत्तरां दिशिमाश्रृतः।
नेपाल मण्डले ख्याते हिमाद्रे कुक्षिमाश्रिते॥
राजा मानवेन्द्रस्तु लिच्छवीनां कुलोद्भवः।
सोऽपि मंत्रार्थ सिद्धस्तु महाभोगी भविष्यति॥
पतनक कारण–
“उदयः जिहनुनोह्यंते म्लेच्छानां विविधास्तथा।
अभ्योधे भ्रष्ट मर्यादा बहिः प्राज्ञोपभोजिनः॥
शस्त्र सम्पात विध्वस्ता नेपालाधिपतिस्तदा।
विद्या लुप्ता लुप्तराजानो म्लेच्छ तस्कर सेविनः”॥
(राहुलजी द्वारा सम्पादित)
मानदेव लिच्छवी छलाह आ तकर बादो कैकटा लिच्छवी शासक भेलाह। लिच्छवी शासनक प्रसंगक उल्लेख हियुएन संग सेहो केने छथि। अंशुवर्मन ‘महासामंत’ कहबै छथि जाहिसँ मान होइयै जे जो ६३३ई.धरि लिच्छवी राजाक प्रभुत्वक स्वीकार करैत छलाह। नेपालक वैवाहिक सम्बन्ध सेहो बिहारसँ चलैत छल। सोमदेवक विवाह मौखरी भोगवर्मनक पुत्री ओ आदित्य सेनक प्रपौत्री वत्स देवीसँ भेल छलन्हि।
अहीर:-मंजूश्री मूलकल्पमे मानदेव द्वितीयक पश्चात राज विप्लवक वर्णन भेटइयै जाहिसँ ज्ञात होइछ जे नेपालमे गोलमाल भेल छल। अहीर लोकनिक आक्रमणसँ नेपाल आक्रांत छल। वंशावलीक अनुसार वो लोकनि भारतक समतलसँ आएल अहीर छलाह। हिनका लोकनि अहीरगुप्त सेहो कहल गेल छन्हि। ५००सँ ५९०क बीच एहिमे पाँचटा शासक भेलाह जाहिमे परमगुप्त पराक्रमी छलाह आ ओ लिच्छवी लोकनिकेँ शिकस्त केने छलाह। हुनक एकटा पौत्र सिमरौनगढ़मे शासन करैत छलाह। ओहि राजवंशक दोसर शाखा तराइमे शासन करैत छल। जयगुप्त द्वितीयक मुद्रा चम्पारण आ मगधमे भेटल अछि।
६४३–४४मे जिश्नुगुप्तक पश्चात अहीरवंश दू भागमे बटि गेल छल आ लिच्छवी लोकनि पुनः अपन राज्यकक स्थापना कऽ लेने छलाह। तकर बाद नेपालकेँ तिब्बतमे मिलि जेबाक संभावना बुझि पड़इयै आ मंजूश्री मूलकल्पमे एकर अप्रत्यक्ष प्रमाण अछि। इ उएह समय छल जखन तिब्बती राजा चीनी राजदूतकेँ तिरहूतपर आक्रमण करबाक हेतु साहाय्य देने रहथिन्ह आ संभव जे ओहिक्रममे नेपालपर तिब्बती प्रभाव बढ़ि गेल हो। मंजूश्री मूलकल्पसँ ज्ञात होइत अछि नेपाल शासन अन्यायी म्लेच्छपर निर्भर रहए लागल छल तथा राज्यक प्रथा समाप्त भऽ गेल छलैक। तिब्बती शासक श्राँगक विवाह अंशुवर्मनक बेटीसँ भेल छलैक। ७०३क बाद नेपाल विदेशी शासनसँ मुक्ति पेवाक हेतु माथ उठौलक। धर्मदेवक पुत्र मानदेव तृतीय विजयक चारिटा स्तंभ निर्मित केने छलाह। लिच्छवी लोकनिक पुनरागमनसँ नेपालक सवतोमुखी विकास भेल। ७०५ ई. मानदेव तृतीयक चंगुनारायण अभिलेखसँ ज्ञात होइछ जे ओ मल्ल सबहिक संग युद्ध कएने छलाह आ गण्डक धरि पहुँचि गेल छलाह। स्वंयभुनाथ शिलालेखसँ तत्कालीन संविधानपर सेहो प्रकाश पड़इत अछि। एहिठाम इ स्मरणीय थिक जे नेपालक लिच्छवी बरोबरि मिथिलासँ सम्पर्क बनौने रखैत छलाह। शिवदेवक विवाह आदित्यसेनक पौत्रीसँ छलन्हि। शिवदेवक जयदेव गद्दीपर बैसलाह आ हुनक पदवी छलन्हि ‘परचक्रकाम’। जयदेव शक्तिशाली शासक छलाह। शिवदेव अपना शिलालेखमे अपनाकेँ–“भट्टारक महाराज लिच्छवी कुलकेतु” कहने छथि। जयदेवकेँ कश्मीर धरि विजयक श्रेय देल जाइत छन्हि। जयदेव मिथिलाक सीमा धरि अपन राज्यक विस्तार केने छलाह आ हुनक सम्पर्क पाटलिपुत्र आ गौड़सँ सेहो बढ़िया छलन्हि। ८७९–८८०मे राघव देव नेपालक संवत चलौलन्हि मुदा हिनका जयदेवसँ कोन सम्बन्ध छलन्हि से हमरा लोकनि नहि जनैत छी।
लिच्छवीक पश्चात नेपालक ठाकुरी राजवंशक सम्पर्क अपना सबहिक क्षेत्रसँ बढ़िया छलैक। नेपालमे महायानक प्रधानता छल आ ओहिठामक विद्यार्थी नालंदा (आ बादमे विक्रमशिला)मे पढ़बाक हेतु अबैत छलाह। पालवंशक समयमे इ सम्बन्ध आ घनिष्ट भऽ गेल। रमेश चन्द्र मजुमदारक मत छन्हि जे इमादपुर (मुजफ्फरपुर)मे जे पाल अभिलेख भेटल अछि ताहिपर जे संवत ४८मे पढ़ल गेल अछि से भ्रामक अछि आ ओकरा नेपाली (नेवारी) संवत–१४८ बुझबाक थिक जे १०४८ई.क बरोबरि होइत अछि आ जखन मिथिलापर महिपाल प्रथम शासन करैत छलाह। सब तथ्यक स्पष्ट अध्ययन केला उत्तर हुनक मंतव्य छन्हि जे मूर्तिक समर्पित केनिहार व्यक्ति नेपाल वासी रहल होएताह आ तैं ओ नेवारी संवतक व्यवहार कएने छथि। १०३८मे नेपाली लोकनि मिथिला बाटे विक्रमशिला गेल छलाह आ ओतएसँ अतीश दीपंकरकेँ लऽ कए तिब्बत घुरल छलाह। अतीशक नेपाल पहुँचलाक बाद नेपाली महायानमे तंत्रक प्रवेश भेलैक। एग्यारहम शताब्दीमे नेपाल आंतरिक रूपें बटि गेल तीन राज्यमे–पाटन, काठमाण्डु आ भातगाँव आ ओहिठाम केन्द्रीय सत्ताक सर्वथा अभाव भऽ गेल आ एहिसँ लाभ उठाकेँ विभिन्न राज्यक आक्रमण नेपालपर शुरू भऽ गेलैक। चालूक्य, कलचुरी, यादव, जैतुंगी आदिक शिलालेखसँ ज्ञात होइछ जे इ सब नेपालपर आक्रमण कएने छलाह। एहि स्थितिसँ लाभ उठाए नान्यदेव सेहो नेपालपर आक्रमण केलन्हि। नान्यदेव नेपालपर मिथिलाक आधिपत्य स्थापित करबामे समर्थ भेलाह। राजकरैत शासक सबकेँ पदच्युत कऽ ओ अपन राजधानी भातगाँवमे बनौलन्हि। नेपाली परम्पराक अनुसार वो काठमाण्डुक जगदेव मल्ल एवँ पाटन–भातगाँवक आनंद मल्लकेँ बन्दी बनौलन्हि आ जे सब हिनक प्रभुत्व स्वीकार केलन्हि हुनका इ माफ कऽ देलथिन्ह। नेपालमे नान्यदेवकेँ कहियो चैन नहि भेटलन्हि आ बरोबरि किछु ने किछु खटपट होइते रहलैन्ह। एकमत इहो अछि जे नान्यदेवकेँ पुनः दोसर बेर (११४१मे) नेपालपर आक्रमण करए पड़लन्हि। नान्यदेवक प्रभुत्व तँ नेपालपर बनल रहलैन्ह मुदा हुनक उत्तराधिकारी लोकनि ओकरा रखबामे समर्थ भेलाह कि नहि से एकटा संदिग्ध विषय। परम्परानुसार नान्यदेवक एकटा पुत्र नेपालपर शासन करैत छलाह। संभवतः मल्लदेव एहिठामक शासक छलाह आ भीठ भगवानपुर धरि हिनक राज्यक प्रसार छल। नरसिंह देवक समयमे मिथिला आ नेपालमे फेर खटपट भेलैक आ दुनू राज्य अलग भऽ गेल। मिथिलासँ नेपाल पृथक भऽ गेल। नान्यदेवक बादहिसँ नेपालमे कर्णाट शासन दुर्बल भऽ गेल छलैक आ नेपालमे कर्णाट शासनकेँ ठाकुरी राजा लोकनि उखाड़ि फेकने छलाह। एहि आस पासमे नेपालमे मल्ल लोकनिक उत्थान सेहो देखबामे अवइयै। इ वंश अरि मल्लदेवसँ शुरू होइछ। नीलग्रीव स्तंभ अभिलेखसँ ज्ञात होइछ जे धर्ममल्ल आ रूपमल्ल नेपालक मल्ल लोकनिक पूर्वज छलाह। एहि वंशक प्रमुख शासक छलाह अरि मल्लदेव।
मल्ल लोकनिक प्रभुत्वक कालमे मिथिलाक मंत्री चण्डेश्वर नेपालपर आक्रमण केलन्हि आ नेपालक राजाकेँ पराजित केलन्हि। चण्डेश्वरक ‘कृत्य रत्नाकर’मे सेहो एकर विवरण अछि। वाग्मतीक तटपर एहि उपलक्ष्यमे तुलापुरूष दानक उल्लेख सेहो अछि। १३१४मे नेपालपर दक्षिणसँ (मिथिला) चढ़ाइक प्रमाण स्पष्ट अछि। हरिसिंह देव पराजित भेला उत्तर नेपाल गेला आ नेपाली शासक बिना प्रतिरोध आत्मसमर्पण कऽ देलखन्हि। हरिसिंह देवमे भातगाँवमे सूर्यवंशी राजवंशक परिपाटी स्थापित केलन्हि। ओ अपन शक्तिकेँ नेपालमे पुनः संगठित केलन्हि आ कर्णाट प्रभुत्वक स्थापना सेहो। भातगाँवसँ ओ शासन करैत छलाह आ ओतहि ओ तुलजादेवीक मन्दिरक स्थापना केलन्हि। नेपालमे हुनक सार्वभौम होएबाक निम्नलिखित अभिलेखसँ स्पष्ट अछि–
“जातः श्रीहरिसिंह देव नृपति प्रौढ़ प्रतापोरयः।
तद्वंर्श विमले महारिपुहरे गाम्भीर्यरत्नाकरः॥
कर्त्तायः सरसामुपेत्य मिथिलां संलक्ष्य लक्षप्रियो।
नेपाले पुनरोद्य वैभवयुते स्थैर्यं विधते चिरम्॥
हरिसिंह देवक नेपाल आक्रमणक प्रश्नपर इतिहासकारक मध्य काफी मतभेद अछि। लुसिआनो पेतेकक विचार छन्हि जे मल्ल लोकनि स्वतंत्र छलाह आ अपनाकेँ महाराजिधराज परमेश्वर परमभट्टारक कहैत छलाह जाहिसँ इ भान होइछ जे हुनका लोकनिपर कोनो विदेशी सत्ताक शासन नहि छलन्हि। मिथिलापर चण्डेश्वर द्वारा आक्रमणक बातकेँ ओ मनैत छथि परञ्च ओ इहो कहैत छथि जे ओहि आक्रमणक फले मिथिलाक आधिपत्य नेपालपर नहि भेलैक। मिथिलासँ भागलापर ओ नेपालमे अपन राज्य बनौलन्हि तकरा वो नहि मनैत छथि। एकटा वंशावली पोथीक आधारपर इहो सिद्ध कएने छथि जे हरिसिंह देव नेपाल पहुँचलाक बाद मरि गेला आ रजगाँवक माँझी भारो हुनक पुत्रकेँ गिरफ्तार कए बंदी बना लेलकन्हि आ धन–वित्त छीनि लेलकन्हि। एवँ प्रकारे हरिसिंह देवक वंश एहिठाम समाप्त भऽ गेलैन्ह।
लुसिआनो पेतेकक मतकेँ हम ओहिना राखि देने छी जेना वो लिखने छथि। इहो कहल जाइत अछि जे ओहि समयमे पश्चिमी नेपालसँ आदित्यमल्लक आक्रमण सेहो भेल छल। तिरहुतिया जगतसिंह सेहो किछु दिनक हेतु नेपालमे राज्य केने छलाह। एक विद्वानक अनुसार हरिसिंह देवक परिवार एवँ हुनक उत्तराधिकारी हुनका बादो नेपालपर शासन केलक। उत्तराधिकारी लोकनिक नाम एवँ प्रकारे अछि–
i. मतिसिंह–(१३१५–६९)–सिमरौनगढ़क राजगद्दीपर सेहो राज्य केलन्हि आ नेपालपर सेहो। चीनक सम्राट सिमरौनगढ़ शासककेँ मान्यता दैत छलथिन्ह। शमशुद्दीन इलियास जखन नेपालपर आक्रमण करबाक हेतु बढ़लाह तखन ओ सिमरौन गढ़क शासककेँ सेहो परास्त केलन्हि आ ओहि बाटे नेपाल गेलाह। मतिसिंहक नामपर मोतिहारी अछि।
ii.शक्ति सिंह
iii.श्यामसिंह– हिनका कोनो पुत्र नहि भेल आ हुनक पुत्रीक विवाह मल्लवंशक राजकुमारसँ भेल। मतिसिंहक ओतए चीनक दूत आएल छल। चीनक सम्राटक ओहिठामसँ एकटा मोहर सेहो आएल छलैक आ शक्तिसिंहक ओहिठाम सेहो एकटा चीनी सम्राटक मोहर आ पत्र आएल छलैक। श्यामसिंहक राज्यारोहणक चीनी सम्राटक हाथे भेल छल। एहि तथ्य सबसँ प्रत्यक्ष अछि चीनी सम्राट एहि कर्णाटवंशीकेँ नेपालक सार्वभौम राजा बुझैत छलाह। अहु सम्बन्धमे पेतेकक मत अछि जे इ सब बात गलत थिक। १३८२ ई. क इथाम बहाल अभिलेखसँ स्पष्ट होइयै जे मदन रामक पुत्र शक्तिसिंह नेपाली अनेक रामक वंशज छलाह ने कि कर्णाट वंशीय। नेपालक इतिहासमे अहुखन कतेको मतभेद अछि आ रहत।
रज्जलदेवीक पति जयार्जुनक शासनकालमे जयस्थिति मल्ल द्वारा राज्य शासनमे नियम विरूद्ध विप्लव कैल गेल। जयस्थितिकेँ सिमरौनक हरिसिंह देवक वंशज कहल गेल अछि। नायक देवी आ जगतसिंहक पुत्री रज्जलादेवीसँ जयस्थिति विवाह केलन्हि। जयस्थिति जयार्जुनकेँ पराजित कए नेपालक राजा भेलाह। ओ सूर्यवंशी कर्णाटक योग्य प्रतिनिधि सिद्ध भेलाह। पृथ्वीसिंहक आधिपत्य स्थापित होयबाक समय धरि हुनक वंश शासन करैत रहल। जयस्थितिमल्लक संग रज्जल्ला देवीक विवाह भेलासँ तीनटा शक्तिशाली शासक परिवार–ठाकुरी, कर्णाट ओ मल्ल संयुक्त भऽ गेल। जयस्थितिमल्ल शक्तिशाली शासक छलाह। हुनक उत्तराधिकारी यक्षमल्ल अपन अधिकार मिथिला धरि बढ़ौलन्हि। ओ अपन प्रतिद्वन्दीकेँ हराय राज्यकेँ चारि भागमे विभक्त केलन्हि।
i. भातगाँव– अपन ज्येष्ठ पुत्र राज्यमल्लकेँ
ii. बनेपा– रणमल्लकेँ
iii.काठमाण्डु– रत्नमल्लकेँ
iv.पाटन– अपन पुत्रीकेँ।
एकर परिणाम भेल नेपालक सर्वनाश। सत्रहम शताब्दीमे नेपाल अनेकानेक जागीरमे बँटि गेल। सबसँ पूबमे किरात प्रदेश छल जाहिमे दूध कोशीक समतल, ओकर शाखा तथा सून कोशीक पूबमे तराइक किछु भाग सेहो छलैक।
मुसलमानी आक्रमणः- ऐतिहासिक सम्पर्क पकड़बाक हेतु पुनः इस्वीसन् चौदहम शताब्दीक चर्चा करए पड़इत अछि। कहल जाइछ जे अलाउद्दीन खलजी सेहो अपन प्रभाव नेपाल धरि बढ़ौने छलाह यद्धपि एकर कोनो ठोस प्रमाण हमरा लोकनिकेँ उपलब्ध नहि अछि। १३४६–४७मे बंगालक शासक शमसुद्दीन हाजी इलियास नेपालपर आक्रमण केलन्हि आ एहिबातक उल्लेख स्वयंभूनाथक अभिलेखमे अछि। एहि शिलालेखक अनुसार हाजी इलियास काठमाण्डुकेँ घेर लेलक, शहरमे आगि लगादेलक, लूट पाट मचौलक एवँ मूर्त्ति सबकेँ ध्वस्त केलक। शिलालेखक तिथि अछि नेवारी ४९२=१३७१–७२इ.–मन्दिर पुनः निर्मित भेलैक आ स्तूप पुनर्स्थापित भेल आ ओकर समारोह मनाओल गेल। एहि शिलालेखक संपादन के.पी.जायसवाल केने छथि। तकर बादसँ पुनः कोनो आक्रमणक उल्लेख नहि भेटइत अछि।
मल्लक शासनः- जयस्थितिक चर्च हमर पूर्वहि कचुकल छी। हुनक उत्तराधिकारी छलाह जगज्योतिमल्ल। ओ मैथिल वंशमणिक मिलिकेँ ‘संगीत भास्कर’ नामक पुस्तकक रचना केने छलाह। हुनक उत्तराधिकारी ज्योतिमल्ल भेला आ हुनक यक्षमल्ल। यक्षमल्ल अपन अधिकारक विस्तार समतल भूमि दिसि सेहो केलन्हि। यक्षमल्लक तृतीय पुत्र रत्नमल्ल मैथिल ब्राह्मणक प्रभावक अधीन छलाह। रत्नमल्लक उत्तराधिकारी छलाह अमरमल्ल आ हुनक महेन्द्रमल्ल जे चानीक मुद्राक व्यवहार शुरू केलन्हि। ओ तिरहूतसँ हानी मंगवैत छलाह।
एम्हर आबि मिथिला आ नेपालक बीचक सम्बन्ध खूब बढ़िया नहि रहल। खण्डवला कुलक राजा महिनाथ ठाकुर अपन राज्य विस्तारक क्रममे मोरंगकेँ जीति लेलन्हि। मिथिला, तिरहूति गीतक प्रचार एहि राजाक समयमे भेल छल। नेपाल तराइक लोग सब खटपट करैत छल आ तै मोरंगक जमीन्दार सबकेँ दबेबाक हेतु औरंगजेब गोरखपुरक फौजदार आ मिथिलाक फौजदारकेँ पठौलन्हि। सत्रहम शताब्दीमे मिथिला आ नेपालमे खटपट होएबाक एकटा कारण मकवानी राज्य ते तराइ वो घाटीक उपहिमालय मार्गक सटले दक्षिण आ दक्षिण–पश्चिममे रहैक। एहिठाम एकटा प्रमुख शासक छलाह राजा हरिहर जे बड्ड महत्वाकाँक्षी छलाह। राघवसिंह जखन मिथिलाक राजा भेलाह तखन फेर एहि राज्यकेँ लऽ कए नेपालसँ खटपट शुरू भेल। नेपाल तराइक पंचमहलाक राजा भूपसिंहकेँ युद्धमे हरौलन्हि आ भूपसिंह ओहिमे मारल गेला। दरभंगाक खण्डवला राज्यक सीमा मकवानी राज्य धरि पहुँचल। मोरंग राजाक ओतए सेहो मिथिलाक धाख बनल। बंजर सब सेहो तराइक क्षेत्रमे शरणलेने छलाह आ अलीवर्दी हुनका सबहिक विरूद्ध उचित कारवाइ केने छलाह। बंजर लोकनि भपटिआटी टीसनसँ मकवानी राज्यक सीमा धरि पसरल छल।
१७६५मे नेपालमे गोरखा लोकनि शक्तिशाली भऽ गेलाह। १८०२ई.सँ नेपालक सम्पर्क इस्ट इण्डिया कम्पनीक अधिकारीसँ भेल जखन कि नेपाली लोकनि हुनकासँ भेंट करबाक हेतु पटना अबैत गेल। नेपाल आ इस्ट इण्डिया कम्पनीक सम्बन्ध मधुर नहि भऽ सकल आ दिनानुदिन झंझट बढ़ि गेल। अंग्रेज आ नेपालीक बीच युद्ध भइयैकेँ रहल आ ओ युद्ध भेल मिथिला भूमिपर। युद्धमे नेपाली लोकनि अपन अधिकारक विस्तार तराइमे छपड़ा (सारन) धरिक चुकल छलाह। चारूकात लड़ाइ प्रारंभऽ छल। सारनसँ कोशी धरि आ वीचमे मकवानी होइत अंग्रेजक एकटा टुकड़ी नेपालक राजधानी दिसि बढ़ल। लड़ाइक भीषण रूप देखि गजराज मिश्र शांतिक वार्त्ता चलौलन्हि। १८१५मे एक समझौताक अनुसार इ निश्चित भेलैक जे नेपालकेँ ओहिभूमि पर अधिकार छोड़ि देवाक चाही जाहिपर ब्रिटिशक कब्जा भऽ गेल छलैक। एहि संधिसँ कोनो संतोषजनक परिणाम नहि बहरेलैक। १८१६मे पुनः मकवानीपुर लग फेर भिड़ंत भेलैक आ गोरखा पराजित भेल १८१४ई.२८ नवम्बरक सुगौलीक संधिकेँ जखन गोरखा लोकनि बिना कोनो शर्त्त स्वीकार केलन्हि तखनहि अंग्रेज युद्धवंदी घोषणा १८१६मे केलन्हि। एवँ प्रकारे अंग्रेज आ नेपालक बीच संघर्षक मुख्य स्थल मिथिले रहल आ सुगौलीक सन्धिक पश्चात दुनू राज्यक बीचक सम्बन्ध सुधरल।

मिथिलाक भौगोलिक सीमा:-

शतपथ ब्राह्मणक अनुसार नदीक बहुलताक कारणे मिथिलाक भूमि दलदल जकाँ छल। कहल जाएछ जे अग्निदेवक आज्ञासँ माथव विदेघ आ गोतम राहुगण सदानीरा (गण्डकी)क पूबमे जाकऽ बसलाह आ उएह क्षेत्र इतिहासमे मिथिला, विदेह, तीरभुक्ति एवँ तिरहुतक नामसँ प्रसिद्ध भेल। दलदल भूमिकेँ अग्निदेव सुखाकेँ कठोर बनौलन्हि आ जंगलकेँ जराकेँ एहि पूर्वी भूमिकेँ रहबा योग्य स्थान सेहो। आर्य ऋषि लोकनि ओहिठाम अगणित यज्ञक आयोजन केलन्हि आ असंख्य यज्ञ आ होम होयबाक कारणे ओहिठामक भूमि रहबा योग्य बनि सकल। नदीक बाहुल्यक कारणे संभव जे एहि क्षेत्रकेँ तीरभुक्ति कहल गेल छल। प्राचीन कालमे तीरभुक्ति समस्त उत्तरी बिहारक द्योतक छल आ एकर सीमा पश्चिममे श्रावस्तीभुक्ति आ पूबमे पुण्ड्रवर्धनभुक्तिसँ मिलैत–जुलैत छल आ एकर एहि विशालताक परिचय हमरा आयनी–अक्बरीमे वर्णित तिरहुत सरकारक महालक नाम सभसँ सेहो भेटइत अछि।
परंपरागत साधनमे मिथिलाक जे विवरण उपलब्ध अछि तकर सिंहावलोकन करब अपेक्षित। ओहि वर्णनमे ऐतिहासिकताक पुटकतबा दूर धरि अछि से नहि कहि सकैत छी तथापि पौराणिक आख्यानक महत्व तँ ऐतिहासिक दृष्टिये अछिये एहिमे संदेहक कोनो गुंजाइश नहि।
भविष्य पुराणक अनुसार अयोध्याक महाराज मनुक पुत्र निमि एहि यज्ञ भूमिमे आवि अपनाकेँ कृत्य–कृत्य बुझलन्हि आ ओहिठामक ऋषि लोकनिक तप आ यज्ञसँ लाभान्वित भेलाह। निमिक पुत्र ‘मिथि’ एक शक्तिशाली शासक भेलाह आ ओ अपन पराक्रमक प्रदशनार्थ एहिठाम एकटा नगरक निर्माण केलन्हि जे ‘मिथिला’क नामसँ प्रसिद्ध भेल। एहिमे कहलगेल अछि जे पुरी निर्माता होएबाक कारणे ‘मिथिला’क दोसर नाम ‘जनक’ पड़ल।
भविष्य पुराण:-
निमेः पुब्रस्तु तत्रैव मिथिर्नाम महान स्मृतः।
प्रथमं भुजबलैर्येन तैरहूतस्थ पार्श्वतः॥
निर्म्मितस्वीयनाम्ना च मिथिलापुरमुनमम्।
पुरीजनन सामथ्यज्जिनकः सच कीर्तितः॥
वाल्मीकीय रामायण:- राजाऽभूतिषु लोकेषु विश्रुतः स्वेनकर्मणा निमिः परमधर्मात्मा सर्वतत्व वतांवरः। तस्य पुत्रो मिथिर्नाम जनको मिथिपुत्रक कथन अछि जे जखन वशिष्ठ यज्ञाभिलाषी निमिक निमंत्रण अस्वीकार कए इन्द्रक पुरोहिताइ करबाक हेतु स्वर्ग गेलाह तखन वशिष्ठक अनुपस्थितिमे भृगु आदि अन्यान्य ऋषि मुनि लोकनिक साहाय्यसँ निमि अपन यज्ञक संपादन केलन्हि। वशिष्ठ स्वर्गसँ घुरलापर जखन यज्ञकेँ सम्पादन भेल देखलन्हि तखन क्रुद्ध भए ओ राजा निमिकेँ “विदेह” भजेबाक श्राप देलन्हि। वशिष्ठक एहि श्रापसँ चारूकात हाहाकार मचि गेल। प्रजा लोकनि घबरा उठलाह। अराजकताक स्थिति देखि उपस्थित ऋषिगण निमिक मृत शरीरकेँ मथेऽ लगलाह आ मथला उत्तर जे शरीर उत्पन्न भेल तकरे “मिथिल” अथवा “विदेह”क संज्ञा देल गेल। इ लोकनि “जनक” नामसँ सेहो प्रसिद्ध भेलाह।
श्रीमदभागवत:-
जन्मना जनकः सोऽभूद्धैदेहस्तुः विदेहजः।
मिथिलोमथनाज्जातो मिथिला येन निर्म्मिता॥
देवी भागवतसँ ज्ञात होइछ जे निमिक उन्नैसम पीढ़ीमे राजर्षि सीरध्वज जनक भेल छलाह और श्रीमदभागवतसँ इ बुझल जाइत अछि जे जनक वंशक शासक लोकनि एहेन वातावरण बना देने छलाह जे हुनक पार्श्ववर्ती गृहस्थ सेहो सुख दुःखसँ मुक्त भऽ गेल छलाह। ‘विदेह’ जे कि महत्वपूर्ण कल्पना छल आ जकर प्राप्तिक हेतु लोग ललायत रहैत छल से ओहि देशक नामक संकेत सेहो दैत अछि जाहिठाम जनक वंशक लोग अपन राज्यक स्थापना कएने छलाह। शुकदेव जी (व्यासक पुत्र) जखन अपन पितासँ तपचर्याक हेतु आज्ञा माँगलन्हि तखन हुनका योगिराज जनकक दृष्टांत दैत इ कहल गेलन्हि जे ओ घरोमे रहिकेँ तपस्या कऽ सकैत छथि। शुकदेवजीकेँ असंतुष्ट देखि व्यास हुनका राजर्षि जनकक ओतए पठा देलथिन्ह।
देवी भागवत–
वंशेऽस्मिन्येऽपि राजानस्ते सर्वे जनकास्तथा।
विख्याता ज्ञानिनः सर्वे वेदेहाः परिकीर्तिताः॥
वर्षद्वयेन मेरूंच समुल्लङ्घ्य महामतिः।
हिमालये च वर्षेण जगाम मिथिलां पति॥
प्रविष्टो मिथिलांमध्ये पश्यंसर्वर्द्धिमुतम्।
प्रजाश्चः सुखिता सर्वाः सदाचाराः मुखंस्थिताः॥
श्रीमद् भागवत–
एते वै मैथिला राजन्नात्म विद्याविशारदाः
योगेश्वरं प्रसादेन द्वन्दैमुक्ता गृहष्वेपि॥
मिथिलाक सीमाक सबंधमे देवी भागवतमे निम्नांकित विवरण अछि।
एवं निमिसुतो राजा प्राथतोजनकोऽभवत्।
नगरी निर्मिता तेन गंगातीरे मनोहरा।
मिथिलेति सुविख्याता गोपुराट्टाल संयुता
धनधान्य समायुक्ताः हर्हेशाला विराजिता॥
शक्तिसंगम तंत्र:-
गण्डकी तीरमारभ्य चम्पारण्यांतंग शिवे।
विदेहभूः समाख्याता तीरभुक्त्यमिधः सतु॥
स्कन्द पुराण:-
गण्डकी कौशिकी चैव तयोमध्ये वरस्थलम्।
बृहद् विष्णुपुराण:-
कौशिकीन्तु समारभ्य गण्डकीमधिगम्यवै।
योजनानि चतुर्विशंद् व्यायामः परिकीर्त्तितः॥
गंगाप्रवाहमारभ्य यावद्धैमवतंवनम्।
विस्तारः षोडश प्रोक्तो देशस्य कुलनन्दन।
मिथिलानाम नगरी तत्रास्ते लोक विश्रुता॥
अगस्त्य रामायण:-
वैदेहोपवनस्यांते दिश्यैशान्यां मनोहरम्।
विशालं सरसस्तीरे गौरीमंदिर मुत्तमम्॥
वैदेही वाटिका तत्र नाना पुष्प सुगुम्फिता।
रक्षितमालिकन्याभिः सर्वतु सुखदा शुभा॥
मिथिलाक उत्तरमे हिमालय, दक्षिणमे गंगा, पूबमे कौशिकी आ पश्चिममे गण्डकी अछि।
चन्दा झा:-
गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशि,
पूर्व कौशिकी धारा
पश्चिम बहथि गण्डकी,
उत्तर हिमवत बल विस्तारा।
प्राचीन मिथिलामे आधुनिक दरभंगा, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, (दरद–गण्डकी देश), सहरसा, पुर्णियाँ, बेगूसराय, कटिहार, विहपुर, एवँ नेपालक दक्षिणी भाग सम्मिलित छल। नदीक प्रधानता हेवाक कारणे मिथिलाकेँ तीरभुक्ति सेहो कहल गेल छैक–
वृहद् विष्णु पुराण:-
गंगा हिमवतोर्मध्ये नदी पञ्च दशांतरे।
तैरभुक्तिरिदति ख्यातो देशः परम पावनः॥
तीरभुक्ति नाम होएबाक निम्नलिखित कारण बताओल गेल अछि।
i.) शाम्भकी, सुवर्ण एवँ तपोवनसँ भुक्तमान
होएबाक कारणे इ तीरभुक्ति कहाओल।
ii.) कौशिकी, गंगा आ गण्डकीक तीरधरि
एकर सीमा छलैक तैं एकरा तीरभुक्तिक संज्ञा देल गेलैक।
iii.) ऋक्, यजु आ साम तीनहुक वेद सभसँ
आहुति देवऽबला ब्राह्मण समूहक निवाससँ
त्रि–आहुति अर्थात तिरहुतक नामसँ
इ स्थान प्रख्यात भेल।
१६–१७म शताब्दीक तिब्बती यात्री लामा तारनाथक विवरणमे तिरहुतकेँ “तिराहुति” कहल गेल अछि। आ आयनी अकबरीमे तँ सहजहि एक विस्तृत विवरण भेटिते अछि। ऐतिहासिक दृष्टिकोणसँ भुक्ति शब्द प्रयोग गुप्त युगसँ प्रारंभ भेल आ शिलालेखमे एकर उल्लेख भेटइत अछि। वैशालीसँ प्राप्त कैकटा मोहरपर तीरभुक्ति शब्दक उल्लेख अछि आ संगहि कटरासँ प्राप्त अभिलेख, नारायण पालक भागलपुर अभिलेख, वनगाँव ताम्रपत्र अभिलेख आदिसँ ‘तीरभुक्ति’पर प्रकाश पड़इयै आ इ बुझि पड़इयै जे ताहि दिनमे तीरभुक्ति समस्त उत्तर बिहारक द्योतक छल जकरा पश्चिममे छल आधुनिक उत्तर प्रदेश और पूबमे बंगाल। महानंदाक पश्चिम आ गण्डकीक पूबक समस्त भूमि तीरभुक्ति कहबैत छल, एहिमे कोनो संदेह नहि। जातकमे मिथिलाक क्षेत्र जे वर्णन अछि आ आयनी अम्बरीमे वर्णित तिरहुत सरकारक विवरण हमर उपरोक्त मतक समर्थन करइयै। देशक भूगोल आ सीमा राजनैतिक उथल-पुथलक कारणे बदलैत रहैत छैक आ मिथिलाक राजनैतिक इतिहासमे सेहो एहेन कतेक परिवर्तन भेल छैक तथापि एकर जे एकटा साँस्कृतिक स्वरूप अछि से आविच्छिन्न रूपें चलि आवि रहल अछि आ उएह रूप एकर भौगोलिक सीमाक स्पष्ट आभास दैत अछि। प्राचीन साहित्यमे मिथिला आ जनकपुर नाम भेटैछ परञ्च गुप्तयुगसँ तीरभुक्ति नाम प्रशस्त भऽ गेल।
___ “प्राग्ज्योतिषः कामरूपे तीरभुक्तिस्तु निच्छविः
विदेहा चाश्य कश्मीरे”
लिंग पुराण:-
“तीरभुक्ति प्रदेशेतु हलावर्त्ते हलेश्वरः”
प्राचीन मिथिलाक पुरातात्विक विश्लेषण एवँ अध्ययन अखनोधरि अपेक्षिते अछि। नेपालक सीमा जे सम्प्रति जनकपुर अछि तकरे प्राचीन विदेह मानल गेल अछि। सुरूचि आ गाँधार जातकमे विदेह एवँ मिथिलाक भौगोलिक सीमाक विवरण भेटइत अछि। विदेहक चारू मुख्य फाटकपर चारिटा बाजार छल। महाजनक जातकमे तँ विदेहक राजधानी ‘मिथिला’क भव्य वर्णन अछि–मिथिलाक नगरीक सोभा, बाजार आ राज दरबारक शोभा, सामान्य लोगक पहिरब–ओढ़ब, खान–पान, रहन–सहन, सैनिक–संगठन, रथ, हाथी, घोडा, आदि एहेन कोनो अंश छुट्ल नहि अछि जकर वर्णन ओहिमे नहि भेटइत हो। अयोध्यासँ मिथिला पहुँचबामे विश्वामित्रकेँ चारि दिन लागल छलन्हि परञ्च राजा दशरथक ओतए जनक जाहि दूतकेँ पठौने छलाह तकरा मात्र तीन दिन लगलैक। दशरथ चारि दिनमे अयोध्यासँ मिथिला पहुँचल छलाह। महावीर एवँ बुद्धक समयमे विदेहक सीमा एवँ प्रकारे छल–
___ लम्बाइमे कौशिकीसँ गण्डक धरि २४ योजन।
___ चौड़ाइमे हिमालयसँ गंगा धरि १६ योजन।
___ मिथिलासँ वैशाली ३५ मील उत्तर पश्चिम दिसि छल।
___ जातकक अनुसार विदेह राज्यक सीमा ३००० लीग छल आ राजधानी मिथिलाक ७ लीग।
___ मिथिला जम्बुद्वीपक एकटा प्रधान नगर छल।
___ सदानीरा नदी बुढ़ी गण्डकक द्योतक छल।
___ तीरभुक्ति नामक संदर्भमे भृंगदूतमे कहल गेल अछि–
“गंगा तीरावधिरधिगता यदभुओ
भृङ्गभूर्क्तिनामा सैव त्रिभुवन तले विश्रुताः तीरभुक्ति”
आ शक्तिसंगम तंत्रमे–
गण्डकीतीरमारभ्य चम्पारण्यांतकं
शिवे विदेहभूः समाख्याता तीरभुक्तिमिधोर्मनु।
’भुक्ति’ शब्दसँ प्रान्तक बोध होइछ आ गुप्त युगमे समस्त मिथिला तीरभुक्ति नामसँ प्रसिद्ध छल आ एहिसँ समस्त उत्तर बिहारक बोध होइत छल। भोगौलिक दृष्टिये मिथिलाक निम्नलिखित नाम सेहो महत्वपूर्ण अछि–विदेह, तीरभुक्ति, तपोभूमि, शाम्भवी, सुवर्णकानन, मन्तिली, वैजयंती, जनकपुर इत्यादि परञ्च एहि सभमे विदेह, मिथिला, तीरभुक्ति आ तिरहुत विशेष प्रचलित अछि। चारिम शताब्दीमे तीरभुक्ति नाम प्रसिद्ध भऽ चुकल छल। त्रिकाण्डशेष, गुप्त अभिलेख आ बारहम शताब्दीक एकटा अभिलेख एवँ अन्यान्य अभिलेख सभमे ‘तीरभुक्ति’क नाम भेटइत अछि।
iv.मिथिला भूमि:-सम्प्रति जे मोतिहारी, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सहरसा, पूर्णियाँ, बेगूसराय, आदि क्षेत्र अछि सैह प्राचीनकालमे मिथिला, विदेह, तीरभुक्ति, कहबैत छल आ वैशाली एकर अंतर्गत छल। गण्डकीसँ महानंदा आ हिमालयसँ गंगाधरक क्षेत्रक अंतर्गत मिथिला छल। मिथिलाक सीमा लगभग २५००० वर्ग मील छल। हियुएन संग जे ‘पूरा भारत’क वर्णन कैने छथि ताहिमे मिथिलोक उल्लेख अछि। मिथिलाक नाम उत्पत्तिक सम्बन्धमे निम्नलिखित श्लोक प्रसिद्ध अछि–
“निमिः पुत्रस्तु तत्रैव मिथिनर्मि महान स्मृतः
प्रथमं भुजबलेर्येन त्रैहूतस्य पार्श्वतः।
निर्म्मितंस्वीय नाम्नाच मिथिलापुरमुत्तम्
पुरीजनन सामर्ध्यात् जनकः सच कीर्तितः॥
(शब्दकल्पद्रूम-iii.७२३)
वृहद विष्णुपुराणक मिथिला महात्म्य खण्ड–
मिथिला नाम नगरी नमास्ते लोक विश्रुता
पंचभिः कारणैः पुण्या विख्याताजगतीत्रये॥
पाणिनिः-
मन्थते शत्रवोयस्यां=मथ+“मिथिलादयश्च”
इतिदूलच अकारस्येत्वं निपात्यते स्वनाम
ख्यातनगरी। सातु जनकराज पुरायथा। विदेहा
मिथिलाप्रोक्ता। इति हलायुधः-
मिथिला भूमिक विशेषता इ अछि जे एहिठाम नदीक बाहुल्यक कारणे जमीन उपजाउ अछि आ सभ प्रकारक अन्नक खेती एतए होइत अछि। एहिठामक जनसंख्याक विशेष भाग अहुखन खेतीपर निर्भर करैत अछि। प्रतिवर्ष एहिठाम नदीक बाढ़ि अबैत अछि, गाम घर दहा जाइत अछि, लोग वेलल्ला भऽ जाइत अछि तथापि अपन माँटि-पानिक प्रति एहिठामक लोककेँ ततेक प्रेम आ आसक्ति छैक जे ओ एकरा तैयो छोड़वा लेल तैयार नहि अछि आ ओहि माँटि-पानिसँ सटिकेँ रहब अपन जीवनक सार बुझैत अछि। गण्डक, वाग्मती, बलान, लखनदेइ, कमला, करेह, जीवछ, कोशी, तिलयुगा, गंगाक मारि मिथिलाक लोग जन्म-जन्मांतरसँ सहैत आबि रहल अछि। नदीक बिना मिथिलाक भूमिक कल्पने नहि भऽ सकइयै। नदीक कारणे तँ मिथिलाक नामो तीरभुक्ति पडल छल कहियो। नदीमे सप्तगण्डकी आ सप्तकौशिकीक उल्लेख अछि आ एकर स्त्रोत नेपालमे अछि। आब दुनू नदीकेँ नियंत्रित करबाक हेतु कोशी आ गंडक योजना बनल अछि आ आन-आन नदीकेँ पालतु बनेबाक प्रयास भऽ रहल अछि।
मिथिला भूमिक बनावट एकरा कैक अर्थमे सुरक्षा प्रदान करैत छैक। एक दिसि हिमालय पर्वत छैक तँ तीन दिसि नदी आ तैं एहिठामक लोक किछु विशेष स्वभावक होइत छथि जकर संकेत विद्यापतिक पुरूष परीक्षामे अछि। नदीक पूजा एहिठाम ओहिना होइछ जेना कोनो देवी देवताक आ सभ नदीक पूजाक गीत सेहो उपलब्ध अछि। पावनि तिहारपर नदीमे स्नान करब आवश्यक बुझना जाइत अछि। अक्षय-तृतीया (वैशाख शुक्ल)क दिन नदीमे स्नान करबाक परम धार्मिक मानल गेल अछि। मिथिलाक लोग अपन देश, संस्कृति, भाषा आ संस्कारक प्रति बड्ड कट्टर होइत छथि। भौगोलिक दृष्टिये मिथिलाक क्षेत्र एकटा राजनैतिक इकाइक रूपमे प्राचीन कालहिंसँ बनल रहल अछि आ तैं एकर सांस्कृतिक वैशिष्टय अखनो बाँचल छैक।
v.मिथिलाक निवासीः- जे केओ मिथिला अथवा मैथिल संस्कृतिसँ अपरिचित छथि हुनका ‘मिथिला’सँ मात्र मैथिल ब्राह्मणक बोध होइत छन्हि परञ्च इ बोध हैव भ्रामक थिक, कारण मिथिला एकटा भौगोलिक सीमाक द्योतक थिक आ ओहि सीमाक अंतर्गत रहनिहार प्रत्येक ओहि भौगोलिक इकाइक अंग भेलाह चाहे हुनक जाति, वर्ण, अथवा वर्ग जे हो। मिथिलाक रहनिहार प्रत्येक व्यक्ति मैथिल कहौता एहिमे कोनो संदेह नहि रहबाक चाही। धार्मिक क्षेत्रक प्रधान आ आध्यात्मिक रूपें प्रभुत्व रहलाक कारणें ब्राह्मणक प्रधानता रहलन्हि आ लगातार ७००–८०० वर्ष ब्राह्मण राजवंशक शासन रहबाक कारणें ब्राह्मणक राजनैतिक महत्व सेहो बनल रहल। इ फराक कथा जे सामान्य ब्राह्मण गरीब छथि परञ्च इ बातक सोंच जे ब्राह्मणक राज्य रहलासँ राजनीतिमे ब्राह्मणकेँ विशेष प्राधिकार भेटलन्हि आ ओ लोकनि सामंतवादी युगसँ अद्यावधि सभ क्षेत्रमे नेतृत्व केलन्हि। स्मरणीय जे आनवर्णक तुलनामे मिथिलामे ब्राह्मणक जनसंख्या बहुत कम अछि।
ब्राह्मणक अतिरिक्त मिथिलामे क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र (सभ प्रकार), कायस्थ, मुसलमान, इसाइ आदि सब वर्णक लोग रहैत छथि। मिथिलाक विशाल क्षेत्रमे सूरी, तेली, कलवार, यादव, राजपूत, वर्णसँ कम धनी आ शक्तिशाली नहि छथि। मिथिलामे कतेक वर्णक लोग मध्य युगमे रहैत छलाह तकर विश्लेषण ज्योतिरिश्वर ठाकुरक वर्णरत्नाकरसँ भेटैछ। मुसलमानोमे सैयद, पाठान, मोमिन, शेख, आदि शाखा सम्प्रदायक लोगक वास छन्हि। जमीन्दारमे ब्राह्मणक अतिरिक्त, भूमिहार ब्राह्मण, राजपूत, आ यादव लोकनि एक्को पैसा कम नहि छथि। यत्र-तत्र कायस्थ लोकनिकेँ सेहो जमीन्दारी छलन्हि मुदा ओ लोकनि आब विशेषतः कलमफरोसीमे रहि गेल छथि। मिथिला क्षेत्रमे मुसलमानो जमीन्दार कैकटा छलाह।
वर्गक हिसाबे मिथिलामे मूलरूपेण दूटा वर्ग अछि–गरीबक वर्ग आ धनिकक वर्ग। जे केओ धनमान छथि (चाहे जाति कोनो होहि) ओ धनी वर्गमे छथि–आ गरीबक वर्ग। दुनू वर्गक बीच संघर्ष चलि रहल अछि। जमीन्दारी उठलाक उपरांत इ संघर्ष आ तीव्र भऽ गेल अछि कारण आर्थिक हिसाबें मिथिला तुलनात्मक दृष्टिये विशेष शोषित आ पीड़ित अछि। उत्तर भारतक अन्नागारक पदवीसँ विभूषित रहितहुँ मिथिलाक सामान्य लोगकेँ अहुँखन पावभरिक अन्न आ पाँच हाथक वस्त्र नहि भेटइत छैक आ ओ अपन पेट भरबाक लेल चारू कात बौआइत रहैत अछि। मिथिलाक निम्नवर्गक सामाजिक श्रृखंला करीब-करीब टुटि चुकल अछि आ ओ शोषण यंत्रमे नीक जकाँ पीसा रहल अछि। इ स्थिति आब क्रांतिक आह्वान जहिया करे।
मिथिलाक उत्तरी आ उत्तर-पूर्वी सीमापर इण्डो-मंगोलाइड जातिक लोग सेहो बसैत छथि जे थारू कहबैत छथि। हुनका लोकनिकेँ रहन-सहन अहुँखन पुराने छन्हि यद्यपि ओ लोकनि परिश्रम करबामे ककरोसँ कम नहि छथि। शूद्रमे शुद्ध आ अशुद्ध (अछूत) दुनू तरहक लोग अबैत छथि। डोम, चमार, दुसाध, मुशहर, हलालखोर, धानुक, अमार्त, केओट, कुरमी, कहार, कोइरी आदि सेहो पर्याप्त संख्यामे मिथिलामे बसैत छथि। जनसंख्याक हिसाबे यादव सभसँ आगाँ छथि। दुसाध, कोइरी, चमार, कुरमी आदिक जनसंख्या जोड़ि देलासँ तथाकथित पिछड़ावर्गक जनसंख्या तथाकथित अगुआवर्गक जनसंख्यासँ बेसी अछि। जनगणनाक आधारपर निम्नलिखित जातिक ज्ञान होइछ–
गोप (यादव), ब्राह्मण, राजपूत, दुसाध, कोइरी, चमार, शेख, भूमिहार, कुर्मी, मल्लाह, जोलहा, तेली, कान्दु (कानू), नोनिया, धानुख, मुशहर, तांती, कायस्थ, कमार, हजाम, धुनिया, कुम्हार, धोबी, कलवार, केओट, सोनार, कहार, कुँजरा, सुनरी, पठान, हलवाइ, तमौली, इत्यादि।

मिथिलाक इतिहासक अध्ययनक साधन

भारतीय इतिहासक अध्ययनक हेतु जतवा जे स्त्रोत उपलब्ध अछि तकर शतांशो मिथिलाक इतिहासक हेतु नहि अछि। मिथिलाक दुर्भाग्य इहो जे पुरातत्ववेत्ता लोकनिक ध्यान आर्य सभ्यताक पूर्वी सीमाक प्राचीनतम केन्द्र दिसि अद्यावधि नहि गेल छन्हि। पता नहि जेतैन्ह अथवा नहि। मिथिलाक प्राचीन भौगोलिक सीमा, जाहिमे जनकपुर आ सिमराँवगढ सेहो सम्मिलित अछि, कविशेष भाग सम्प्रति नेपाल तराइमे पड़इत अछि आ ओतए सरकारक दिसिसँ एहि क्षेत्रक प्राचीन ऐतिहासिक तत्वक पता लगेबाक हेतु अखन धरि कोनो सशक्त प्रयास नहि भेल अछि। मोतिहारी, वैशाली, गोरहोघाट, पुर्णियाँ, आदि क्षेत्रक यदा–कदा पुरातत्वक खोज भेला उत्तरो एहि दिसि ध्यान नहि देल गेल अछि। आ तैं मिथिलाक इतिहासक अध्ययनक जे एकटा महत्वपूर्ण स्त्रोत होएबाक चाही से सम्प्रति अपूर्णे अछि।
आन–आन क्षेत्रक हेतु जतबो साधन उपलब्ध भेल छैक ततओ मिथिलाक हेतु नहि भऽ सकल अछि कारण एहि दिसि मैथिल-अमैथिल इतिहासकारक ध्यान नीक जकाँ आकृष्ट नहि कैल गेल अछि। मिथिलाक प्राचीन गौरव आ साँस्कृतिक देनक अध्ययनक हेतु हमरा लोकनि अहुँखन मात्र साहित्यिक साधनेपर निर्भर करए पड़इत अछि जकर नतीजा इ होइयै जे कोनो प्राचीन प्रश्नपर हमरा लोकनि एकटा निर्णयात्मक मत नहि दऽ सकैत छी। प्रत्येक प्रश्न विवादास्पद अछि आ निर्विवाद रूपें हम अखनो इ कहबाक स्थितिमे नहि छी जे अमूक बात किंवा घटना अमूक समयमे घटित भेले हैत। इ अनिश्चितताक स्थिति अखन मिथिलाक इतिहासमे बहुत दिन धरि बनले रहत।
यूनान जकाँ हमरा ओतए नञि कोनो हिरोडोटस आ थुसीडाइड्स भेल छथि आ नञि मुसलमान शासकक इतिहासकार जकाँ कोनो इतिहासकारे। विदेशी यात्रियो लोकनि जे विवरण एहि क्षेत्रक देने छथि से मात्र सामान्ये कहल जा सकइयै आ ओहिसँ स्थितिमे कोनो परिवर्तन नहि अवइयै। एहना स्थितिमे एहि प्राचीन क्षेत्रक इतिहासक निर्माण करब एकटा जटिल समस्या बनल अछि आ ओहि समस्या मध्य हमरा लोकनिकेँ ऐतिहासिक साधन खोजिकेँ संकलित करबाक अछि।
मिथिलामे पैघसँ पैघ दार्शनिक एवँ तात्विक विषयपर ग्रंथक रचना भेल अछि जाहिसँ इ प्रमाणित होइछ जे एहिठामक लोग विज्ञ एवँ विद्वान छलाह परञ्च अपना संबंधमे किछु लिखबाक क्रममे ओ लोकनि राजर्षि जनकक विदेह नीतिये अपनौलन्हि अछि एहिमे कोनो सन्देह नहि। ‘मैथिल’ शब्द “वैदिक” युगसँ व्यवहृत होइत आएल अछि आ एहिसँ इ स्पष्ट होइत अछि जे ताहि दिनसँ मिथिलाक भौगोलिक इकाइ स्वीकृत अछि आ एहि भौगोलिक क्षेत्रमे रहनिहार मैथिल कहबैत छलाह–बिहारमे एतेक प्राचीन गौरव आ कोनो क्षेत्रकेँ प्राप्त नहि छैक तथापि एकर इतिहास अखनो एतेक संदिग्ध आ अनिर्णयात्मक स्थितिमे अछि से एकटा विचारणीय विषय।
प्राचीन मिथिलाक इतिहासक अध्ययनक हेतु मुख्य साधन अछि वेद, उपनिषद्, ब्राह्म साहित्य, अरण्यक, महाभारत, रामायण, पुराण, स्मृति, पाणिनि, पतञ्जलि, आदिक रचना एवँ तत्कालीन बौद्ध आ जैन साहित्य। मिथिलाक सम्बन्धमे सूचना हमरा लोकनिकेँ यजुर्वेद एवँ अथर्ववेदसँ भेटए लगैत अछि यथापि अप्रत्यक्ष रूपें मिथिलाक ऐतिहासिक घटनाक विवरण ऋग्वेदमे सेहो देखल जा सकइयै। शतपथ ब्राह्मण, ऐतरेय ब्राह्मण, पंचविंश ब्राह्मण, बृहदारण्यकोपनिषद्, एवँ छन्दोग्योपनिषद्मे मिथिलाक तत्कालीन राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, एवँ धार्मिक अवस्थाक विस्तृत विवरण भेटइत अछि। एहिमे सभसँ महत्वपूर्ण विवरण शतपथ ब्राह्मणक अछि जाहिमे जनककेँ सम्राट कहल गेल अछि आ संगहि याज्ञवल्क्यक संरक्षक सेहो। साँस्कृतिक स्थितिक अध्ययनक हेतु तँ उपरोक्त साधन अद्वितीय अछि आ एहि बातकेँ विदेशी विद्वान सेहो मानैत छथि। एहिमे संदेह नहि जे एहि युगमे ब्राह्मण वर्गक प्रधानता छल तथापि परीक्षितक बादसँ जनक वंशक इतिहासक हेतु उपरोक्त साधनक अध्ययन अत्यावश्यक मानल जाइत अछि। एतरेय ब्राह्मणसँ तत्कालीन अवस्थाक विवरण भेटइत अछि आ उपनिषद् तँ सहजहि दार्शनिक विचार-विमर्शक खान अछिये। ओहिमे जाहि ढंगे वाद–विवाद अछि से सर्वथा अद्वितीय कहल जा सकइयै। पाणिनि, पतञ्जलि एवँ अर्थशास्त्र (कौटिल्यक)सँ सेहो प्राचीन मिथिलाक इतिहासक विभिन्न अंशपर प्रकाश पड़इत अछि।
बौद्ध आ जैन साहित्यक संबंधमे इ साँचि कहल गेल अछि जे जखन कोनो आन साधन मिथिलाक इतिहासक हेतु नहि प्राप्त होइत अछि तखन बौद्ध आ जैन साधन हमरा लोकनिक साहाय्यक हेतु प्रस्तुत होइत अछि। दीपवंश, महावंश, अशोकविद्वान, अश्वघोषक, बुद्धचरित, बुद्धघोषक रचना सभऽ, धम्मपद्दद्ठ कथा, असंग, वसुवन्धु, दिगनाग, धर्मकीर्ति, आदिक रचनासँ मिथिलाक सांस्कृतिक एवँ दार्शनिक इतिहासक निर्माणमे बहु साहाय्य भेटइत अछि। बौद्ध दार्शनिक लोकनिकेँ कहबाक क्रममे मिथिलामे नव–न्यायक जन्म भेल छल आ तैं ७–८ शताब्दीसँ १५–१६म शताब्दी धरि जे बौद्ध एवँ मैथिल दार्शनिकक मध्य वाद–विवाद भेल अछि से मिथिलाक साँस्कृतिक इतिहासक अध्ययनक हेतु परमाश्वयक मानल जाइत अछि। वाचस्पति मिश्र (वृद्ध)सँ लऽ कऽ शंकर मिश्र धरिक समस्त ग्रंथ आ नालंदा विक्रमशिलाक महान पंडित लोकनिक रचित ग्रंथक अध्ययन एहि हेतु सर्वथा अपेक्षित।
ओना बौद्धकालीन मिथिलाक सर्वांगीन इतिहासक हेतु समस्त जातकक अध्ययन आवश्यक बुझना जाइछ। महापदानक जातक, गाँधार जातक, सुरूचि जातक, महाजनक जातक, निमि जातक, महानारदकस्प जातक इत्यादि तत्कालीन मिथिलाक राजनैतिक समाजिक एवँ साँस्कृतिक इतिहासपर वृहत् प्रकाश पड़इयै– जाहिसँ सामान्य लोकक दैनन्दिनीक ज्ञान सेहो होइत अछि। जातकमे जे राजनैतिक श्रृंखला बताओल गेल अछि ताहिसँ पुराण वर्णित अवस्थामे काफी मतभेद अछि तैं राजनैतिक इतिहासक निर्माणमे जातकक अध्ययनमे सतर्कताक आवश्यकता अछि। सामाजिक–साँस्कृतिक–आर्थिक अवस्थाक अध्ययनक हेतु जातक प्रमुख साधन मानल गेल अछि। जैन स्त्रोतमे सेहो मिथिलाक विभिन्न स्थितिक विशद् विश्लेषण भेटइत अछि आ ओहि दृष्टिकोणसँ उतराध्यायनसूत्र, उवासगदसाओ, कल्पसूत्र, स्थविरावलीचरित्र (परिशिष्ट पर्वन) एवँ त्रिशस्तिशलाकापुरूष आदि ग्रंथक अध्ययन अपेक्षित अछि। कखनो कखनो जैन एवँ बौद्ध उपाख्यानमे समता सेहो देखबामे अवइयै। जैन–बौद्ध साहित्य आ अन्यान्य साधन मिथिलाक सामाजिक–आर्थिक इतिहासक अध्ययनक हेतु बहु लाभदायक मानल गेल अछि कारण ओहि सभ विवरणमे सामान्य लोकक जीवनपर सेहो प्रकाश पड़इत अछि। जातक आदिसँ इहो ज्ञात होइछ जे कोना ताहि दिनक मैथिल अपन घर दुआ छोड़िकेँ व्यापार–व्यवसायक हेतु देश–विदेश जाइत छलाह आ ओहिमे बहुत गोटए ओहिठाम बैसिओ जाइत छलाह। ओ लोकनि वेस उद्यमी आ परिश्रमी होइत छलाह आ समुद्र यात्राक हेतु कोनो संकीर्णता हुनका लोकनिमे नहि छलन्हि।
महाभारत, रामायण, आ पुराणमे मिथिलाक सबंधमे प्रचुर सामग्री अछि परञ्च एहि तीनूमे वैज्ञानिकताक हिसाबें कतहु कोनो साम्य नहि छैक। पुराणक विभिन्न खण्डमे जतवा जे नामावली अथवा राजाक सूची भेटइत अछि ताहिमे एकरूपता नहि देखबामे अवइयै आ एहि विरोधाभाससँ इतिहासक सामान्य विद्यार्थी अगुताकेँ घबरा जाइत अछि। ब्रिटिश विद्वान पारजीटर महोदय आ बंगाली विद्वान प्रधान महोदय बड्ड परिश्रम कए पुराण रूपी जंगलसँ मिथिलाक राजवंशक इतिहासक एकटा रूपरेखा प्रस्तुत करबामे समर्थ भेल छथि तथापि ओकरा सर्वसम्मत अखनो नहि मानल जाइत छैक। प्राचीन–कालमे इतिहास–पुराण एकटा अध्ययनक महत्वपूर्ण विषय छल आ अध्ययनक दृष्टिकोणसँ एकरा पंचमवेद सेहो कहल गेल छैक तथापि एकरा अध्ययनमे जे एकटा वस्तुनिष्ठताक अपेक्षा छल से प्राचीन विद्वान लोकनि नहि राखि सकलाह आ पुराणमे ततेक रास एम्हर–ओम्हरक बात घुसिया गेल जे एकर ऐतिहासिकतामे लोगकेँ संदेह होमए लगलैक। एहिठाम एतवा स्मरणीय जे एतवा भेला उत्तरो पुराण, रामायण आ महाभारतक एतिहासिक महत्वकेँ काटल नहि जा सकइयै। परंपरागत इतिहासक जे अपन महत्व छैक ताहि हिसाबे उपरोक्त साधनक अध्ययन कऽ कए हमरा लोकनि मिथिलाक इतिहासक निर्माणमे एहिसँ साहाय्य लऽ सकैत छी।
मिथिलाक इतिहासक अध्ययनक हेतु लिगिटमे मैनुस्कृप्ट सेहो आवश्यक बुझना जाइत अछि। एहिसँ मिथिला आ वैशाली दुनूक इतिहासपर प्रकाश पड़इत अछि। एहिमे कहल गेल अछि जे जखन वैशालीमे गणराज्य छल तखन मिथिलामे राजतंत्र आ मिथिलामे ताहि दिनमे एकटा प्रधानमंत्री छलाह जिनक नाम खण्ड छलन्हि आ हुनका अधीनमे ५०० अमात्य रहथिन्ह।
संस्कृत साहित्यक विभिन्न अंशसँ मिथिलाक इतिहासक अध्ययनमे सहायता भेटइत अछि। कालिदास, भवभूति, दण्डिन, राजशेखर, आदिक रचनासँ मिथिलाक इतिहासक विभिन्न पक्षपर प्रकाश पड़इयै। लक्ष्मीधरक कृत्यकल्पतरू, श्रीनिवासक भद्दीकाव्यटीका, जयसिंहक लिंगवार्त्तिक, श्रीधर ठक्कुरक काव्यप्रकाशविवेक, नारायणक छांदोग्यपरिशिष्ट एवँ मिथिला आ भारतक अन्य भागसँ प्राप्त मिथिलाक्षरक पाण्डुलिपि आदिसँ मिथिलाक इतिहासक निर्माणमे सहायता भेटइत अछि। विल्हणक विक्रमाँकदेवचरित, विद्यापतिक समस्त रचना, वर्धमानक दण्डविवेक, अभिनव वाचस्पति मिश्रक समस्त रचना, गणेश्वरक सुगति सोपान, चण्डेश्वरक आठो रत्नाकर, ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्णनरत्नाकर आदि ग्रंथ मिथिलाक इतिहासक निर्माणमे उपादेय सिद्ध भेल अछि। बिहार रिसर्च सोसायटी द्वारा प्रकाशित “कैटलोग आफ मिथिला मैनुस्कृप्ट” (४ भाग), हरिप्रसाद शास्त्री द्वारा संपादित “कैटलोग आफ नेपाल दरबार मैनुस्कृप्ट” इत्यादिसँ सेहो मिथिलाक इतिहासक सभ पक्षपर विशेष प्रकाश पड़इयै। मिथिलामे सुरक्षित तालपत्रपर ब्राह्मण आ कायस्थक पाञ्जि सेहो मिथिलाक सामाजिक इतिहासक एकटा मूलि स्त्रोत मानल गेल अछि।
ओना पुरातात्विक साधनक अभाव तँ मिथिलामे अछि तथापि मोतिहारीसँ बंगालक सीमा धरि जे विभिन्न पुरातात्विक महत्वक स्थान अछि तकर सर्वेक्षणसँ मिथिलाक इतिहासक निर्माणमे सहायता भेटत। मिथिलाक प्रमुख क्षेत्रक उत्खनन अखनो नहि भेल अछि तैं ओहिठामसँ पर्याप्त मात्रामे शिलालेख, सिक्का, आदि नहि भेटल अछि। एम्हर मोतिहारीसँ कैकटा ताम्रलेख प्रकाशित भेल अछि, मुजफ्फरपुरक कटरा थानासँ जीवगुप्तक एकटा अभिलेख भेटल अछि जाहिसँ पता लगैत अछि जे तीरभुक्तिमे चामुण्डा नामक एकटा विषय छल। इमादपुरसँ पाल कालीन अभिलेख भेटल अछि जाहिसँ इ सिद्ध होइछ जे पाल लोकनिक शासन मिथिलापर छल। नौलागढ (बेगुसराय)सँ दूटा पालकालीन अभिलेख भेटल अछि– जाहिमे एकटा क्रिमिला विषयक आ दोसरमे एकटा बिहारक उल्लेख अछि। एहिठाम इहो स्मरणीय जे एहि क्षेत्रसँ गुप्तकालीन मोहर एवँ ‘रक्षमुक्त विषय’क एकटा गुप्तकालीन मोहर सेहो भेटल अछि जाहिसँ इ स्पष्ट होइछ जे मिथिलाक इ क्षेत्र शासनक प्रधान केन्द्र छल। बनगाँव (सहरसा)क गोरहोघाट, पटुआहा, आदि स्थानसँ पंचमार्क्ड सिक्का तँ बहुत पूर्वहिं भेटल छल आ एम्हर विग्रहपाल तृतीयक एकटा प्रमुख ताम्रलेख बहरायल अछि जाहिमे इ कहल गेल अछि जे तीरभुक्तिक अंतर्गत हौद्रेय नामक एकटा विषय छल। इएह हौद्रेय आधुनिक हरदीथिक। एहिसँ पूर्व हमरा लोकनिकेँ तीरभुक्तिमे मात्र एक्केटा विषयक ज्ञान छल आ ओ छल ‘कक्ष’ विषय जकर उल्लेख नारायण पालक भागलपुर ताम्रलेखमे भेल अछि। इ कक्षविषयक सम्बन्धमे अखनो धरि इतिहासकार एकमत नहि भेल छथि मुदा हमर अपन विचार इ अछि जे इ ‘कक्ष’ विषय प्राचीन अंगुतरापमे छल आ महाभारतमे वर्णित ‘कौशिकी कक्ष’क प्रतीक छल। नारायण पालक ताम्रलेखमे एहि कक्ष विषयक विवरण भेटइत अछि। चामुण्डा विषय पश्चिममे, हौद्रेय केन्द्रमे आ कक्ष विषय तीरभुक्तिक पूर्वी सीमाक संकेत छल। एकर अतिरिक्त पंचोभसँ प्राप्त ताम्रपत्र सेहो मिथिलाक इतिहासक अध्य़यनक हेतु अत्यावश्यक। अन्धराठाढी़सँ प्राप्त श्रीधरक अभिलेख, कन्दाहासँ नरसिंह देव ओइनवारक अभिलेख, भगीरथपुरसँ प्राप्त ओइनवार कालीन अभिलेख, मुहम्मद तुगलकक अभिलेख, वेदीवनक तुगलक कालीन अभिलेख, इब्राहिम शाह शर्कीक अभिलेख, शिवसिंहक सिक्का, ओइनवार शासक भैरव सिंह देवक चाँदीक सिक्का आदिसँ मिथिलाक इतिहासक विभिन्न पक्षपर प्रकाश पड़इत अछि। नेपाल वंशावली आ नेपालसँ प्राप्त अभिलेख जाहिमे सिमराँवगढ स्थित नान्यदेवक तथाकथित अभिलेख एवँ प्रताप मल्लक शिलालेख महत्वपूर्ण अछि। एम्हर आबिकेँ वैशाली, बलिराजगढ, करिऔन आदि स्थानक उत्खननसँ जे सामग्री प्राप्त भेल अछि सेहो मिथिलाक इतिहासक निर्माणमे सहायक सिद्ध भेल अछि। महेशवारा (बेगूसराय)सँ प्राप्त रूकनुद्दिन कैकशक अभिलेख तँ अन्यान्य दृष्टिकोणसँ महत्वपूर्ण अछि। मिथिलाक विभिन्न भागसँ मुसलमानी सिक्का पर्याप्त मात्रामे भेटल अछि जाहिसँ राजनैतिक इतिहासक निर्माणमे सहायता भेटइत अछि। मटिहानी (बेगूसराय)सँ बंगालक सुल्तान नसरत शाहक अभिलेख सेहो भेटल छल आ कहल जाइत अछि जे बेगूसरायक समीप नूरपुरगाँवमे मीरजाफरक पुत्रक एकटा अभिलेख अछि।
विदेशी यात्री लोकनि सेहो मिथिलामे आएल छलाह आ एहिमे चीनसँ आयल यात्री लोकनिक विशेष महत्व अछि कारण ओ लोकनि एतए बौद्धधर्मक अध्ययनार्थ अबैत छलाह। फाहियान, हियुएनसंग, सूंगयुन, इंसिंगआदि यात्रीक नाम उल्लेखनीय अछि। इ लोकनि मिथिलाक विभिन्न क्षेत्रक भ्रमण कएने छलाह आ ओ लोकनि जे अपन विवरण लिखने छथि ताहिसँ एहि क्षेत्रपर विशेष प्रकाश पड़इयै। वृज्जी, लिच्छवी एवँ तीरभुक्तिक प्रसंग हिनका लोकनिक लेख उपादेय अछि। विदेशी यात्रीमे सर्वप्रमुख व्यक्ति, जे मिथिलाक हेतु सर्वतोभावेन महत्वपूर्ण कहल जा सकैत छथि, भेलाह तिब्बती यात्री धर्मस्वामी जे १३म शताब्दीक पूर्वार्द्धमे मिथिला होइत नालंदा गेल छलाह। तखन मिथिला राजगद्दीपर कर्णाटवंशीय रामसिंह देव विराजमान छलाह। धर्मस्वामी मिथिलाक संबंधमे बहुत रास बात लिखने छथि। बहुत दिनधरि ओ रामसिंहक दरबारमे सेहो रहल छलाह आ रामसिंह हुनका अपन पुरोहित बनबाक हेतु आग्रहो केने छलथिन्ह परञ्च ओकरा ओ स्वीकार नहि केलन्हि। ताहि दिनमे मिथिलापर मुसलमानी आक्रमण प्रारंभ भऽ चुकल छल तकर विवरण ओ दैत छथि कारण जखन वैशाली बाटे जाइत छलाह तखन ओ अपना आँखिये इ सभ घटना देखलन्हि। धर्मस्वामी मिथिलाक इतिहासक हेतु एकटा आवश्यक स्त्रोत भेला। एकटा दोसर महत्वपूर्ण साधन भेल वसातिलुनउंस जकर लेखक छलाह मुहम्मद सद्र उला अहमद हसन दाबिर इदुसी (उर्फ ताज) आ ओ इखतिसान उद देहलवीक नामे सेहो विख्यात छलाह। ओ गयासुद्दीन तुगलकक संगे बंगाल आक्रमणमे गेल छलाह आ घुरती कालमे मिथिला पर गयासुद्दीन तुगलकक आक्रमणक समयमे हुनके संग छलाह। तैं इहो एकटा आँखि देखल साधन भेल आ ओहि हिसाबे महत्वपूर्ण सेहो। फोलियो १२ (एकर सम्पूर्ण पटनाक काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थानमे सुरक्षित अछि आ ४टा फोलियो जकर संबंध मिथिलाक इतिहाससँ छैक, हमर हिस्ट्री आफ मुस्लिम रूल इन तिरहुतमे छपल अछि)पर लिखल अछि जे हरिसिंह देव ककरो कोना सलाह नहि सुनलन्हि आ पराकेँ पहाड़ दिसि चलि गेलाह। गयासुद्दीन तुगलकक तिरहूत आक्रमणक संबंधमे एहिसँ प्रामाणिक दोसर कोनो साधन उपलब्ध नहि अछि। तिरहुत ताहि दिन विस्तृत आ सुखी संपन्न राज्य छल आ अखन धरि ककरो अधीन नहि छल तैं गयासुद्दीन बंगालसँ घुरबा काल अपना अधीनमे करबाक प्रयास केलक। इसामी अपन फुतुह–सालातीनमे लिखने छथि जे गयासुद्दीन तिरहुतक कर्णाटवंशक अंतिम राजापर आक्रमण केँलन्हि आ ओ बिना कोनो प्रकारक विरोध केने पहाड़–जंगल दिसि भागि गेलाह। सुल्तान तीन दिन धरि ओतए ठहरलाह आ जंगलकेँ काटिकेँ सम्पूर्ण क्षेत्रकेँ साफ करौलन्हि। तेसर दिन ओ मिथिला राज्यक विशाल किला जकर दिवाल गगनचुम्बी छल आ जे सात टा गहिर खाधिसँ चारू कातसँ घेरल छल, पर आक्रमण केँलन्हि आ ओहिपर विजय प्राप्त केला उत्तर ओहि किलामे दू या तीन सप्ताह रूकला आ चारू दिसक विरोधकेँ दबैलन्हि आ एवँ प्रकारें मिथिलापर अपन प्रभुत्व स्थापित केलन्हि। जेबासँ पूर्व ओ तवलिघाक पुत्र धर्मात्मा अहमदकेँ तिरहुतक प्रधान बनौलन्हि। एवँ प्रकारे एक–दू मासक बाद गयासुद्दीन अपन राजधानी दिसि चलि गेलाह। फरिस्ता आ मुल्लातकिया जे राजाक गिरफ्तारीक गप्प लिखैत छथि से गलती बुझि पड़इयै। वसातिनुलउंसक अनुसार तिरहुतक राजा समृद्धशाली छलाह, आ हुनका सैनिकक कोनो अभाव नहि छलन्हि। विराट राजभवन छलन्हि आ सभ तरहें ओ सुखी आ सम्पन्न छलाह। अपन अजेय दूर्ग–किलाबंदी आ सेनापर अटूट विश्वास छलन्हि आ आइ धरि कतहु हुनक माथ झुकल नहि छलन्हि। गयासुद्दीनक पहुँचबाक समाचार सुनितहिं ओ एतेक भयभीत भऽ गेलाह जे हुनक सब घमण्ड धूल–धूसरित भऽ गेल। अपन प्रतिष्ठा बचेबाक हेतु ओ अपन तेज घोड़ापर चढ़िकेँ भागि गेलाह। वसातिनुलउंसक लेखकक विचार अछि जे जँ राजा मेलसँ चाहतैथ तँ गयासुद्दीन हुनका संग बढ़िया व्यवहार करितथिन मुदा ओ बिनु कोनो प्रकारक वार्ता कएने भागि गेला। अपन स्वतंत्रताक रक्षाक हेतु ओ पहाड़क कोरामे नुका रहलाह। गयासुद्दीन ओहिठाम थोड़ेक दिन ठहरि समस्त राज्यक शासनक व्यवस्था अपने निर्देशनमे केलन्हि। ग्राम मुखिया (मकोद्दम) लोकनिक संग नीक व्यवहार दर्शौलन्हि आ तकर बाद सब प्रबंध केला उत्तर ओहिठामसँ अपन राजधानी दिसि बढ़लाह।
एकर अतिरिक्त एकटा आ महत्वपूर्ण साधन अछि मुल्ला तकियाक वयाज। मुल्ला तकियाक वयाज पटनाक मासिक (पटना–१९४६)मे छपल अछि आ ‘मिथिला’ साप्ताहिकमे सेहो एकर मुख्य साराँश मैथिलीमे छपल छल बहुत दिन पूर्वहिं जे आब उपलब्ध नहि अछि। मुल्ला तकिया मुगल कालीन रइस छलाह। आसाम जेबाक क्रममे मिथिला होइत गेल छलाह आ ताहि दिनमे एहिठाम जत्तेक जे किछु छल तकर विस्तृत विवरण संकलित कए ओ मिथिलाक एकटा व्योरेवार इतिहास बनौने छलाह। एकर अतिरिक्त फरिता, अलवदाओनी, अबुल फजल, अब्दुल सलिम आ गुलाम होसेन हुसेनक पोथी सभसँ सेहो मिथिलाक इतिहासपर पर्याप्त प्रकाश पड़इत अछि।
मुसलमानी साधनक अतिरिक्त इस्ट इण्डिया कम्पनीक रेकार्डस, कलक्टरेटक कागज पत्र, अंग्रेज कर्मचारी लोकनिक मध्य भेल पत्राचार, जमीन्दारीक कागज आ दरभंगा राजक सचिवालय एवँ रेकार्डस रूममे सुरक्षित पुरान कागज सभ सेहो मिथिलाक इतिहासक निर्माणक हेतु सहायक सिद्ध होएत। मिथिलामे जे बहुत रास जमीन्दारी छल ओहि सभ जमीन्दारक ओतए विभिन्न प्रकारक सरकारी गैर सरकारी कागज उपलब्ध अछि आ ओहि सभसँ मिथिलाक आधुनिक इतिहासक निर्माणमे काफी सहायता भेट सकइयै। एहि सभ कऽ संकलन एवँ प्रकाशन आवश्यक अछि– दरभंगा राज्यक इतिहासक निर्माणमे एहिसँ बड्ड सहायता भेटल अछि। दरभंगा, बनैली, नरहन, बेतिया, सुरसंड, गंधवरिया, चक्रवार आदि राजवंशक वृहद एवँ वैज्ञानिक इतिहास नहि लिखल जा सकल अछि। दरभंगा राज्यक अतिरिक्त बाँकी राज्य सभहक संबंध हमरा लोकनिकेँ पूर्ण जानकारियो नहि अछि कारण साधनक अभाव अछि।
एहि सभ साधनक वैज्ञानिक अध्ययन केलासँ मिथिलाक प्रामाणिक इतिहासक निर्माण भऽ सकइयै। सब साधनक समीचीन व्याख्या केला उत्तरे हमरा लोकनि मिथिलाक समीक्षात्मक सर्वेक्षण कऽ सकैत छी। ओना आन प्रांतक तुलना एहिठाम साधनक सर्वथा अभावे कहल जाएत तथापि जतवा जे उपलब्ध अछि ताहिपर वैज्ञानिक रूपें अध्ययन करब आवश्यक। मिथिलाक हेतु मैथिली साधनपर विशेष निर्भर करए पड़त। एहि प्रसंगमे एकटा उदाहरण देव अप्रासंगिक नहि होइत। विद्यापति कवि होइतहुँ इतिहासक नीक ज्ञाता छलाह जकर प्रमाण हमरा हुनक ग्रंथ सभसँ भेटइत अछि। पुरूष परीक्षा जाहि सिल–सिलेवार ढंगसँ ओ ऐतिहासिक व्यक्तित्वक विवेचन कएने छथि ताहिसँ हुनक ऐतिहासिक बोध एवँ वस्तुनिष्ठताक पता लगइयै। (एहि सबंधमे द्रष्टव्य–हमर लेख–विद्यापतिज पुरूष परीक्षा–जे हमर ‘हिस्ट्री आफ मुस्लिम रूल इन तिरहुत’क परिशिष्टमे छपल अछि।) ज्ञातव्य जे पुरूष परीक्षाक अध्ययन केला उपरांत स्वर्गीय चन्दा झा मिथिलाक इतिहासक अध्ययन दिसि आकृष्ट भेल छलाह आ ओहि संबंधमे बहुत रास सामग्री सेहो जमा केने छलाह। कीर्तिलता, कीर्तिपताका, लिखनावली आदि ग्रंथ सेहो ओतवे महत्वपूर्ण अछि। मिथिलाक इतिहासक लेल मैथिली साधनक हेतु खोज करए पड़त कारण एकर एकटा अविच्छिन्न प्रवाह वैदिक कालसँ अद्यावधि बनल अछि। यशस्तिलकचम्पूमे तिरहुत रेजिमेंटक विवरण मिथिलाक स्वतंत्र व्यक्तित्वकेँ स्पष्ट करइत अछि जकर स्पष्टोक्ति विद्यापतिमे भेल अछि। मिथिलाक इतिहासक निर्माणक हेतु उपरोक्त सभ साधनक वैज्ञानिक अध्ययन एवं ओकर समीक्षात्मक विश्लेषण अपेक्षित अछि।

मिथिलाक सामाजिक इतिहास
मिथिलाक अस्तित्व वैदिक कालहिसँ अद्यावधि सुरक्षित अछि। मिथिलामे आर्यक आगमनक पूर्व मिथिलाक सामाजिक व्यवस्थाक रूपरेखा केहेन छल से कहब असंभव। ओकर ठीक–ठीक अनुमान लगायबो संभव नहि अछि। मिथिलाक संस्कृतिक अविछिन्न प्रभाव रहल अछि। आजुक मिथिलामे हमरा लोकनि जे देखैत छी ताहिसँ बहुत भिन्न ओहि दिनक अवस्था सामान्य जनक हेतु नहि छल। प्रत्येक देशक अपन अपन देशगत विशेषता होइत छैक आ ओहिपर ओहि देशक भूगोलक प्रभाव रहिते छैक। मिथिला एहि नियमक अपवाद नहि रहल अछि आ रहबे किएक करैत? सामाजिक नियमक निर्माण कोनो एक दिनमे नहि होइत छैक आ सामाजिक व्यवस्थापर मात्र भूगोलक नहि अपितु आर्थिक व्यवस्थाक प्रभाव सेहो पड़इत छैक। पूर्व वैदिक कालमे समाजक व्यवस्था कठोर नहि बनल छल आ बहुत दूर धरि ओ व्यवस्था स्वच्छन्द एवँ मुक्त छल। समाजमे प्रत्येक व्यक्तिकेँ मुक्त वातावरणक अनुभव होइत छलैक आ ओ लोकनि कोनो स्थायी नियमक निर्माण कए नहि बैसि गेल छलाह। गतिशील समाज छल आ तैं विकासोन्मुख सेहो। एवँ प्रकारे ई समाज बहुतो दिन धरि चलल आ शनैः शनैः आर्यक विस्तार जहिना भारतवर्षक विभिन्न भागमे होमए लगलैक तहिना समाजोमे तदनुकुल परिवर्त्तन अवश्यम्भावी बुझना गेलैक आ समाजक महारथी लोकनि ओहि दिसि अपन ध्यान देलन्हि। साम्राज्यक विस्तारक संगहि अर्थनीतिक पेंच कसे जाए लागल आ समाज ओहिसँ भिन्न नहि रहि सकल। वर्णाश्रमक व्यवस्था, भने कोनो ऊँच्च आदर्शसँ भेलहो, पछाति ओ अपन दुर्गुणक संग हमरा लोकनिक समक्ष उपस्थित भेल आ जेना जेना वर्ग विभेद बढल गेल तेना-तेना एकर स्वरूप दिन प्रतिदिन विकृत होइत गेलैक। जँ से नहि होइत तँ मिथिलामे पुनः जनक सन शासक, याज्ञवल्क्य सन विधिनिर्माता एवं गौतम सन सूक्ष्म विचारक किएक नहि अवतीर्ण भेलाह? आ ने फेर उत्पन्न भेलीह कोनो गार्गी आ मैत्रेयी? एहि मूलतथ्यकेँ जाधरि हमरा लोकनि अवगाहन करबाक चेष्टा नहि करब ताधरि हमरा लोकनिक कल्याण नहि आ ने तत्वक उचित दिगदर्शने।
सर्वप्रथम चारि वर्णक उल्लेख ऋगवेदक पुरूष सूक्तमे भेटइत अछि। प्रारंभमे एहेन बुझि पड़ैत अछि जे जखन आर्य लोकनिक विस्तार भेलैन्ह आ हुनका लोकनिकेँ अहिठामक मूलनिवासीसँ सम्पर्क भेलैन्ह तखन दुहुक संस्कृतिमे पर्याप्त भिन्नता छल आ ओ लोकनिकेँ वर्णक विभाजन उचित बुझलन्हि आ तदनुकुल वर्णक विभाजन भेल। मिथिलामे आर्यक प्रसारक समय वर्णव्यवस्थाक प्रचलन भऽ चुकल छल। मुदा ताहि दिनमे अझुका कट्टरता देखबामे नहि अवइयै। विवाहादिक प्रसंगमे ऋगवेद आ शतपथ ब्राह्मणमे भिन्नता देखबामे अवैछ। ब्राह्मण आ क्षत्रियकेँ अपनासँ छोट वर्गमे विवाह करबाक अधिकार प्राप्त छलन्हि। ब्राह्मण कालमे शूद्र लोकनिक अवस्था शोचनीय भऽ गेल छल। एतरेय ब्राह्मणमे शूद्रक दुर्दशाक वर्णन भेटइत अछि। शूद्र लोकनि सब अधिकारसँ वंचित छलाह आ समाजमे हुनक स्थान निकृष्टतम् छलन्हि। कालांतरमे किछु एहेन व्यवस्था बनल जाहिमे ब्राह्मण-क्षत्रिय लोकनि सम्मिलित रूपें निम्नवर्गक शोषणमे रत भऽ गेलाह। एकर मूल कारण ई छल जे जँ-जँ सामाजिक व्यवस्था गूढ़ होइत गेल तँ तँ ई दुनू वर्ग उत्पादनक साधन एवं तत्संबधी ज्ञानक कुंजी अपना हाथमे दबौने गेलाह आ निम्न दुनू वर्गक लोग हिनका सबहिक अधीन होइत गेल। जखन आ कोनो चारा नहि रहलैक आ परिस्थिति दिनानुदिन बदतर होइत गेलैक तखन शूद्रकेँ वेदोसँ वंचित कैल गेलैक। एहि सब घटना क्रमक उल्लेख तत्कालीन साहित्य एवं कथा सबमे सुरक्षित अछि। दरिद्र लोकनिक की दशा रहल होइत तकर पूर्वाभास तँ महाभारतक अध्ययनसँ भेटइत अछि जतए इन्द्रोकेँ ई कहए पड़ल छन्हि जे दुःखक अनुभव करबाक हो तँ मर्त्यलोक जा कए हुनका लोकनिक संग रहिकेँ देखि आउ। महाभारतक अनुशासन पर्वमे एहि दृष्टिकोणक बहुत रास घटना वर्णित अछि।
समाजक वर्गीकरण दिनानुदिन विषम होइत गेल। शूद्र एवं अन्यान्य छोट छीन वर्ग़क लोग सब जमीनक अभावमे मजूर अथवा बेगारीक अवस्थाकेँ प्राप्त केलक आ ओम्हर दोसर दिसि गगन चुम्बी अट्टालिका ओकरा लोकनिक दयनीय एवं उपेक्षित आ असहाय अवस्थापर अट्टहास करए लागल। सूत्र एवं स्मृति साहित्यमे एहि बातक पुष्ट प्रमाण अछि। करहुक मामिलामे वैश्य-शूद्रेकेँ तंग होमए पड़इत छलन्हि। वैदिक युगमे जाति वा वर्गक निर्णय कर्मसँ होइत छल आ आन वर्णक लोगो अपन कर्मसँ ब्राह्मण भऽ सकैत छल। शतपथ ब्राह्मणक अनुसार राजा जनक याज्ञवल्क्यक उपदेश एवं अपन कर्तव्यसँ ब्राह्मण भेल छलाह। तैत्तिरीय ब्राह्मणमे विद्वानेकेँ ब्राह्मण कहल गेल अछि।
स्त्री, शूद्र, श्वान आ गायकेँ “अनृत”क संज्ञा देल गेल छैक। विवाहमे खरीद-बिक्रीक प्रथा छल। बहु विवाहक प्रथा सेहो छल। धनसम्पत्तिसँ सेहो स्त्रीगणकेँ वंचित राखल जाइत छल। पूर्व वैदिक कालक जे मुक्त वातावरण छल से आब समाप्त भऽ चुकल छल आ ओकर स्थान लऽ लेने छल संकीर्णता। सामाजिक दृष्टिकोणसँ संकीर्णताक समावेश घातक सिद्ध भेल। संकीर्णताक भावनाकेँ प्रश्रय देबाक हेतु अत्यधिक साहित्य एवं कर्मकाण्डी नियमक निर्माण भेल। ओना उपरसँ देखबामे तँ इएह बुझि पड़ैछ जे स्त्रीगणक स्थान समाजमे बड्ड उँच्च छलन्हि मुदा ई स्थिति वास्तविकतासँ बड्ड दूर छल। गार्गी आ मैत्रेयीक नामसँ कोनो देश अपनाकेँ गौरवान्वित बुझओ परञ्च हमरा लोकनिकेँ एतए ई स्मरण राखब आवश्यक जे ओ लोकनि नियमक अपवाद मात्र छलीह। ओहिठाम याज्ञवल्क्यक दोसर पत्नी कात्यायनीकेँ देखिऔक तँ बुझबामे असौकर्य नहि होएत जे समाजमे स्त्रीक वास्तविक स्थिति की छल? सुलभा आ गार्गीक देनसँ भारतक दर्शन भरपुर अछि। जतए एक दिसि मनुक्खकेँ अधिकाधिक विवाह करबाक अधिकार प्राप्त छलन्हि ओहिठाम एक स्त्रीकेँ दोसर विवाह करबाक आ दोसराक संग मेल जोलक कोनो अधिकार नहीं छलैक। सुरूचि जातकमे एकटा कथा सुरक्षित अछि जकर सारांश भेल-“मिथिलाक राज्य बड्ड विस्तृत अछि आ एहिठामक शासककेँ १६०००(सोलह हजार) पत्नी छन्हि”। एहिसँ प्रत्यक्ष भऽ जाइछ जे सामाजिक व्यवस्थामे स्त्रीगणक की स्थिति छल? एतरेय ब्राह्मणमे कहल गेल अछि जे पुतोहु अपन श्वसूरक सोझाँ नहीं जाइत छलीहे, जँ अनचोकसँ श्वसूरक नजरि पुतोहुपर पड़ि जाइत छलन्हि तँ पुतोहु बेचारी नुका रहैत छलीह। मिथिलामे पर्दा प्रथा आ पुतोहु-श्वसूरक सम्बन्धक ई प्राचीनतम उदाहरण भेल आ मैथिल समाजमे ताहि दिनसँ अद्यावधि कोनो विशेष परिवर्त्तन नहीं देखबामे अबैछ। विधवाक स्थितिओ प्रायः अझुके जकाँ छल। समाजमे विधवाकेँ हेय दृष्टिये देखल जाइत छल स्थिति बदतर छल। रखेल रखबाक प्रथा, दासी पुत्रक साथ दुर्व्यवहार, व्यभिचार एवं वेश्यावृत्तिक उल्लेख सेहो भेटैछ। राजदरबारमे असंख्य दासी पुत्री आ रखेलक व्यवस्था रहैत छल। मिथिलाक विभाण्डक मुनिक पुत्र ऋषि श्रृंग्यकेँ अंगक एकटा सुन्दरी फुसला लेने छलन्हि। किंवदंती अछि जे अंगक राजा लोमपाद अपन बेटी शांताकेँ एहि कार्यक हेतु अगुऔने छलाह। एहि घटनाक उल्लेख अश्वघोष सेहो कएने छथि।
“ऋष्य श्रृंग मुनि सुतं स्त्रीष्व पंडितम्।
उपायै विविधैः शांता जग्राहच जहारच”॥
पुराण आ जातकमे वर्णित समाजमे बहुत किछु समानता अछि। दिन प्रति दिन समाजमे कट्टरता एव अनुदार भावना जड़ि पकड़ने जाइत छल। धनक महत्व बढ़ए लागल छल आ विद्या आ विद्वानक महत्व क्रमशः घटए लागल छल। ओना तँ लक्ष्मी-सरस्वतीक आपसी द्वेष बौद्धयुगमे आबिकेँ विशेष रूपें चरितार्थ भेल छल मुदा ओहुँसँ पूर्वहुँ हमरा एहि सब वस्तुक स्पष्ट उदाहरण भेटइत अछि। ब्राह्मणक अपेक्षा धनाढ्यक प्रतिष्ठा बढ़ि रहल छल। आवश्यकतानुसार आब लोक अपन रोजगार चुनए लागल आ प्राचीन कालमे ब्राह्मण लोकनिक लेल जे खेती निषिद्ध मानल जाइत छल से आब नहि रहि गेल। ब्राह्मण खेती आ व्यवसाय दुनूमे लागि गेलाह। पुराणादिक अध्ययनसँ ई सब बात स्पष्ट भऽ जाइछ। बौद्ध साहित्यक अनुसार ब्राह्मण लोकनि अपन जीविकाक हेतु सब काज करैत छलाह। जातक तँ एहि प्रकारक कथा सबसँ भरले अछि। सामाजिक नैतिकतामे सेहो परिवर्त्तन भेल आ प्राचीन मूल्याँकनक मापदण्डमे सेहो समयानुसार उचित संशोधन आ परिवर्त्तन कैल गेल।
मनुक्खक जीवनक कमसँ कम तीनटा विभाजन सर्वप्रथम छान्दोग्य उपनिषदमे देखबामे अवइयै। उपनिषद कालमे मिथिलामे क्षत्रिय ब्राह्मणक स्तर धरि पहुँचि चुकल छलाह। ज्ञान एवं ब्रह्मविद्याक क्षेत्रमे ओ कोनो रूपें ब्राह्मणसँ कम नहि छलाह। उपनिषदमे कर्मकाण्डक विरोधमे उठैत भावनाक प्रदर्शन सेहो देखबामे अवइयै। उपनिषदमे हम जे देखैत छी ताहिसँ स्पष्ट अछि जे ओ युग मिथिलाक सामाजिक-साँस्कृतिक इतिहासक उत्कर्षक युग छल आ सब तरहे सुखी सम्पन्न सेहो। एक बात जे स्मरणीय अछि उ भेल ई जे मिथिलाक क्षत्रिय शासक कोनो रूपेँ ब्राह्मणसँ अपनाकेँ कम नहीं बुझैत छलाह आ ब्राह्मणोकेँ ई स्वीकार करबामे कोनो आपत्ति नहि छलन्हि। स्वयं याज्ञवल्क्य जनकक एहि गुणकेँ स्पष्ट रूपे मनने छथि आ गीतामे सेहो एकर संकेत अछि। वर्ण व्यवस्था ताहि दिनमे एतेक दृढ़ नहि भेल छल।
बौद्ध एवं जैन धर्म कार्य क्षेत्र सेहो मिथिलामे छल आ एकर प्रभाव तत्कालीन समाजपर पड़ब स्वाभाविके छल। अवैदिक धर्मक विकासक मुख्य स्थान छल मगध आ वैशाली सेहो ओहि प्रभावसँ अक्षुण्ण नहि छल। बौद्ध युग धरि अबैत अबैत ब्राह्मण सत्ताक भीत ढ़हि रहल छल आ क्षत्रिय लोकनिक प्रभाव चारूकात दिनानुदिन बढ़ि रहल छल। भोजन भावक नियमादिमे सेहो परिवर्त्तन अवश्यम्भावी भऽ गेल छल। जातकक अनुसार एहि युगमे ब्राह्मण लोकनि सबहिक संग भोजन भाव करैत छलाह आ एहेन ब्राह्मण सबकेँ कट्टर वैदिक लोकनि अपना पाँतीसँ फराके रखैत छलाह। सभहिक संग खेनिहार ब्राह्मण लोकनिकेँ पतित कहल जाइत छल। सामाजिक मान्यताक हेतु एहि युगमे संघर्ष चलैत रहल आ तरह तरहक उथल-पुथलक कारणे समाजमे सतत अस्थायित्व बनल रहल।
आजीविक, जैन, आ बौद्ध संप्रदायक प्रसारसँ वेदक अपौरूषेयतामे लोगक संदेह उत्पन्न होमए लगलैक आ एवं प्रकारे समाजक वर्गीकरणमे सेहो। कारण उपरोक्त तीनू सम्प्रदायक नेता वर्णव्यवस्थाक कट्टर विरोधी छलाह। एकरे प्रभाव स्वरूप जाति पातिक खाधि भोथा रहल छल आ एहि अग्निधार बहुत रास सड़ल विचारक होम सेहो भए रहल छल। प्रारंभमे वैशालीसँ आगाँ एहि विचार सबहिक दालि नहीं गलल छलैक परञ्च काल क्रमेण एकर प्रभावसँ मिथिला मुक्त नहि रहि सकल। वैशालियो पूर्णतः वर्ण-व्यवस्थासँ मुक्त नहि भऽ सकल यद्यपि बौद्ध लिच्छवी लोकनिकेँ तावतिंशदेव कहने छथि। धनक प्रभाव एहि सब क्षेत्रमे सेहो बनले छल आ गरीब मानवता कहिओ अपनापर होइत अन्यायक विरोधमे सशक्त भऽ कए ठाढ़ नहि भऽ सकल। लिच्छवी लोकनिक रहन सहन सेहो वर्गगत छलन्हि जँ एहि व्यवस्थामे कतहु कोनो प्रकारक छूट देखबामे अबैत हो तँ ओकरा नियमक अपवाद कहब। समाजक भद्र लोकनि चाण्डालकेँ हेय दृष्टिसँ देखैत छलाह आ समाजमे चाण्डालक स्थिति बदतर छल। ओ लोकनि नगरसँ बाहर रहैत छलाह। घृणित कार्य हुनके सबसँ कराओल जाइत छल। हुनका लोकनिक अवस्थामे सुधारक कोनो आसार देखबामे नहि अबैत छल।
भृत्य, गुलाम, बहिया आदिक स्थिति तँ आ चिंतनीय छल कारण ई लोकनि तँ शूद्रक कोटिमे छलाहे। स्वयं बुद्ध जे अपना मुँहसँ गुलामक अवस्थाक वर्णन कएने छथि ताहिसँ रोमाँच भऽ जाइछ। जातकमे चारि प्रकारक गुलामक वर्णन अछि। वहियाक प्रथा मिथिलामे अति प्राचीन कालसँ चलि आबि रहल अछि। कौटिल्यक अर्थशास्त्र आ अन्यान्य ग्रंथ सबमे एकर उल्लेख भेटइयै। वेश्याक प्रचलन ऐहु युगमे छल आ वैशालीक अम्बपालीक नाम तँ सर्वविदित अछिये। यद्यपि बुद्ध स्वयं एहि व्यवस्थाक विरोधी छलाह आ एतए धरि जे ओ स्त्रीकेँ संघमे एबासँ वर्जित करैत छलाह मुदा तइयो जखन अम्बपाली हुनका प्रति अपन भक्ति दरसौलक तखन बुद्ध ओकर निमंत्रण स्वीकार कए ओतए भोजन केलन्हि। अभिजात वर्गक लोक सबहिक ओतए गणिकाक ढ़ेर लागल रहैत छल। एहिमे बहुतो नृत्य एवं संगीत कलामे निपुण होइत छलीहे। कोनो कोनो राजदरबार १६०००गणिकाक उल्लेख भेटइयै। पर्दा प्रथाक संकेत बौद्धयुगमे भेटइत अछि।
बौद्धकालमे धनसम्पति आ राज्याधिकार सामाजिक मापदण्ड भेल आ क्षत्रिय लोकनिक महत्व समाजमे एतेक बढ़लन्हि जे ओ लोकनि आब विशेष रूपेँ आहूत होमए लगलाह। विदेह-वैशालीमे ओ लोकनि आ शक्तिशाली छलाह। वर्ण-व्यवस्थामे एवं प्रकारे सेहो थोड़ेक परिवर्त्तन हैव स्वाभाविक भऽ गेल। अशिक्षित ब्राह्मण लोकनि निम्नस्तरकेँ प्राप्त भेलाह। क्षत्रिय लोकनिक प्रभाव वृद्धिक सबसँ पैघ उदाहरण इएह भेल जे वैशालीक अभिषेक पुष्पकरिणीमे लिच्छवी राजा लोकनि अनका स्नान नहि करए दैत रहथिन्ह। समस्त लिच्छवी क्षेत्र तीन हिस्सामे वर्ग अथवा वर्णक आधारपर बटल छल आ प्रत्येक क्षेत्रक रहनिहार अपनहि क्षेत्रमे विवाहादि कऽ सकैत छल। पैघ वर्णक बालक जँ छोट वर्णक कन्यासँ विवाह करए तँ ताहि दिनमे एकर मान्यता छल मुदा एहिबात एकबात स्मरण राखबाक ई अछि जे राजकुमार नाभाग जखन एक वैश्य कन्यासँ विवाह केलन्हि तखन हुनका गद्दीसँ वंचित कए देल गेलन्हि। एहिसँ अनुमान लगाओल जाइत अछि जे राजदरबारमे अंर्तजातीय विवाहकेँ प्रोत्साहन नहीं देल जाइत छल। कुलीन परिवार एवँ अभिजात वर्गक सदस्यगण ताहु दिनमे एकर कट्टर विरोधी छलाह।
ब्रह्मचारी एवं धर्मप्रचारक लोकनि कतहु भोजन कऽ सकैत छलाह। ओ लोकनि जातीयताक बन्धनसँ अपनाकेँ मुक्त मनैत छलाह। शूद्र लोकनि भनसिया नियुक्त होइत छलाह। माँछ-माँउसक व्यवहार ब्राह्मण लोकनिक ओतए सेहो होइत छल। भोजन-भावमे मध्ययुगीन कट्टरता ताहि दिनमे नहि छल। गैर ब्राह्मण लोकनि सेहो सब किछु खाइत-पीबैत छलाह। छुआछूतक कट्टरता नहि रहितहुँ ई देखबामे अबैछ जे चाण्डालसँ सब केओ फराके रहैत छलाह आ चाण्डाल नगरक बाहर रहैत छल। चाण्डालकेँ अछूत बुझल जाइत छल आ जँ ओकर नजरि ककरो भोजनपर पड़ि जाइत छल तँ ओहि भोजनक परित्याग कैल जाइत छल। बुद्धक संघक स्थापनाक पछाति बहुतो शूद्र आ छोट वर्णक लोग सब ओहिमे सम्मिलित भेल छल।
वर्णाश्रमक प्रधानता तथापि बौद्धयुगमे बनले रहल। एहि युगमे ब्रह्म चर्याश्रमक प्रधानता विशेष छल। विभिन्न आश्रमक महत्वपर एहि युगमे बेस विवाद चलि रहल छल। विवादक मुख्य प्रश्न इएह छल जे वाणप्रस्थ आ सन्यासमे कोन उत्तम? ओना तँ एहि युगमे हम ई देखैत छी जे सन्यासक प्रवृत्ति दिनानुदिन बढ़ि रहल छल। मार्कण्डे पुराणक कथाक अनुसार वैशालीक राजा लोकनि-खनित्र, मरूत्त, वरिष्यंत, मंखदेव आदि-सन्यास ग्रहण कएने छलाह। ब्रह्मचर्य, ग्रार्हस्थ, वाणप्रस्थ आ सन्यासी सम्बन्धी नियम एखनो पूर्णरूपेण स्थायी नहि भेल छल। बौधायन धर्मसूत्रमे तँ वाणप्रस्थ आ सन्यासक प्रतिकूल वातावरण देखबामे अवइयै। किछु धर्मसूत्र सबमे गृहस्थाश्रमक अपेक्षा वाणप्रस्थक सराहना कैल गेल अछि मुदा इहो विचार ततेक संदिग्ध रूपे प्रगट भेल अछि जे ओहि सब आधारपर किछु निश्चित बात कहब अथवा कोनो मत निर्धारित करव असंभव। एहियुगमे परिवारक चर्च सेहो भेटइत अछि। ताहि दिन भिन्न-भिनाओज नीक नहि बुझल जाइत छल। कन्याक हेतु विवाहक निश्चित आयु १६वर्ष छलैक आ जाहि कन्याकेँ भाई इत्यादि नहि रहैत छलैक से अपन पैत्रिक धनक उत्तराधिकारिणी सेहो होइत छल। ‘स्त्रीधन’ सिद्धांतक विकास एहि युगमे भेल छल। सती प्रथाक उल्लेख सेहो ठाम-ठाम भेटइत अछि। वैशालीक राजा खनित्र आ वरिष्यंतक पत्नी सती भेल छलथिन्ह। मादरी जे अपनाकेँ एहि सतीत्वमे अनने छलीह ताहुसँ सती प्रथाक संकेत भेटइत अछि।
बौद्ध युगक ओना इतिहासमे अपन विशेष महत्व छैक परञ्च वैशालीक हेतु तँ ई स्वर्णयुग छल। जाहि पुष्करिणीक उल्लेख हम पूर्वहि कऽ चुकल छी ताहिमे स्नान करबाक हेतु श्रावस्तीक सेनापति बन्धुल मल्लक स्त्री मल्लिका व्यग्र छलीह आ एकर वर्णन हमरा जातकमे भेटइत अछि। जातकमे कहल गेल अछि…..
“वैसाली नगरे गणराज कुलानाम्।
अभिषेक मंगल पोक्खरी नम्॥
ओतरित्वा नहातापानीयम्।
पातुकम् अहि समीति”॥
बन्धुल अपन पत्नीकेँ लऽ ओहिठाम गेलाह मुदा पहरू लोकनि हुनका दुनूकेँ नहि जाए देलथिन्ह आ अंतमे एहि लेल युद्ध भेल आ ओ दुनू गोटए ओहिमे स्नान कऽ घुरइत गेलाह। एकर अतिरिक्त वैशालीमे आ कतेको दर्शनीय वस्तु छल– उदेन चैत्य, गोतमक चैत्य, सतम्बक चैत्य, बहुपुत्तक चैत्य, सारदन्द चैत्य, चापाल चैत्य, कपिनय्य चैत्य. मर्कट हृदतीर चैत्य, मुकुट बन्धन चैत्य, इत्यादि। वैशालीमे एहि युगमे महालि, महानाम, सिंह, गोश्रृंङ्गी, भद्द आदि नामक प्रधान व्यक्ति भेल छलाह। चुल्लुवग्गमे लिच्छवी भद्रक उल्लेख एहि प्रसंगमे अछि जे एकबेर हुनका बौद्ध संघसँ निष्काषित कऽ देल गेल छल मुदा पुनः सुधार भेलापर हुनका लऽ लेल गेल छल। ओहि समयमे समाजसँ निष्कासित करबाक प्रथा एवं प्रकारे छल–जाहि सभकेँ निष्कासित करबाक होन्हि तिनका भोजनार्थ निमंत्रण देल जाइत छलन्हि आ आसनपर बैठला उत्तर हुनक जल पात्रकेँ उलटि देल जाइत छलन्हि। पुनः जखन हुनका समाजमे लेल जाइत छलन्हि तखन ओहि पात्रकेँ सोझ कऽ केँ राखल जाइत छलैक। जाहि समयमे तोमर देव वैशालीक प्रधान छलाह तखन लिच्छवी लोकनि साज गोज कए हुनक स्वागत कएने छलाह। केओ नील, केओ स्वेत आ केओ लालरंगक शास्त्रास्त्र एवं आभूषण आ वेशभूषासँ सुसज्जित भए बु्द्धक स्वागतार्थ उपस्थित भेल छलाह। महविस्तुमे एकर विवरण एवं प्रकारे अछि-
“संत्यत्र लिच्छवयः पीतास्या पीतरथा
पीत रश्मि प्रत्योदयष्टि। पीतवस्त्रा,
पीतालंकारा, पीतोष्णीशा, पीतछत्राः
पीतखङ्ग मुनिपादुका।
पीतास्या पीतरथा पीतरश्मि प्रत्योदमुष्णीशा।
पीता च पंचक कुपा पीलावस्त्रा अलंकारा:॥
नीलास्या, नीलरथा, नीलरश्मि प्रत्यादमुष्णीशा।
नीला च पंचक कुपा नीलावस्त्रा अलंकाराः॥
वैशालीक आम्रकानन जाहिमे अम्बपाली रहैत छलीह सेहो बड्ड प्रसिद्ध छल। बौद्ध धर्मक इतिहासक दृष्टिकोणसँ सेहो वैशालीक अत्यधिक महत्व अछि। अहिठाम ई निर्णय लेल गेल छल जे स्त्री लोकनिकेँ संघमे प्रवेशक अनुमति देल जाइछ। एतहि भिक्षुणी संघक स्थापना सेहो भेल छल। आनंदक कहलापर बुद्ध एहिबातकेँ मनने छलाह आ एहिपर अपन स्वीकृति दैत बौद्धधर्मक सम्बन्धमे भविष्यवाणी सेहो कएने छलाह- “स्त्री जातिक प्रवेशसँ बौद्धधर्म आब ५००वर्ष धरि जीवित रहत”। वैशालीसँ जेबा काल बुद्ध इ कहि गेल छलाह जे आब ओ पुनः एतए घुरिकेँ नहि आबि सकताह। वैशालीक लोग सब इ सुनि बड्ड दुखी भेल छल–
“इदं अपश्चिमं नाथ वैशाल्यास्तव दर्शनम्।
न भूयो सुगतो बुद्धो वैशाली आगमिष्यति”॥
हुनका महापरिनिर्वाणक सए वर्ष बाद वैशालीमे बौद्धसंघक दोसर संगीति भेल छल। मिथिलाक माँटिमे एहेन प्रभाव जे अहिठामक लोग सब बेस तार्किक होइत छलाह। नागार्जुनक शिष्य भिक्षुदेव जखन वैशाली जेबाक हेतु प्रस्तुत भेलाह तखन नागार्जुन कहलथिन्ह-“ओना अहाँ जाए चाहैत छी तँ जाउ मुदा ई स्मरण राखब जे ओहिठामक नवीनो भिक्षुक लोकनि बड्ड जबर्दस्त तार्किक होइत छथि”।
जैन ग्रंथ सबसँ सेहो ताहि दिनक सामाजिक अवस्थाक विवरण भेटइयै। वैशालीमे क्षत्रिय, ब्राह्मण आ वणिक भिन्न-भिन्न उपनगरमे रहैत छलाह। सामाजिक क्षेत्रमे हुनका लोकनिक मध्य सहयोग एवं सहकारिताक भावना व्यापक छलन्हि। ओ लोकनि विदेशी अतिथिकेँ सम्मिलित रूपें स्वागत करबाक हेतु जाइत छलाह। ओ लोकनि बड्ड कर्मठ होइत छलाह आ रंगीन वस्त्रसँ विशेष प्रेम छलन्हि। दालि, भात, तरकारीक अतिरिक्त ताहि दिनमे माँछ-माँउसक प्रचलन सेहो छल। अपना नगरसँ हुनका लोकनिकेँ बड्ड प्रेम छलन्हि। हीरा, जवाहिरात, सोना, चानीसँ हुनका लोकनिक हाथी, घोड़ा, आ सवारी सजल रहैत छलन्हि। शिकार हुनका लोकनिकेँ बड्ड प्रिय छलन्हि। अंगुत्तर निकायक अनुसार लिच्छवी बालक लोकनि बड्ड चंचल आ नटखटिया होइत छलाह। लिच्छवी लोकनि स्वतंत्रता आ स्वाभिमानक प्रेमी छलाह। शिक्षा प्राप्त करबाक हेतु ओ लोकनि दूर-दूर देश धरि जाइत छलाह। विवाहक नियमावली लिच्छवी लोकनिक हेतु कठोर छलन्हि। जाहि कन्याकेँ विवाह करबाक विचार होन्हि से लिच्छवी गणकेँ सूचना दैत रहथिन्ह आ गणक दिसि हुनका लेल सुन्दर वर चुनल जाइत छल। स्त्रीक सतीत्वक रक्षार्थ लिच्छवी लोकनिक किछु उठा नहि रखैत छलाह। एहिमे राजा आ रंकमे कोनो कानूनी भेद नहि छल। मृतकक दाह संस्कारक सम्बन्धमे सेहो हुनका लोकनिक अपन नियम छलन्हि- मुर्दा जरेबाक, गारबाक, अथवा ओहिना छोड़ि देबाक प्रथा हुनका ओतए छलन्हि। मुर्दाकेँ गाँछमे लटकेबाक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। हुनका लोकनि ओहिठाम एकटा उत्सव होइत छल जकरा “सब्बरतिवार” कहल जाइत छल जाहिमे ओ लोकनि भरि राति जागिकेँ नाच गान करैत छलाह आ एकर उदाहरण अंगुत्तर-निकायमे भेटइत अछि।
मौर्य युगमे सर्वप्रथम समस्त भारतक राजनैतिक एकीकरण भेल आ मिथिलाक क्षेत्र अखिल भारतीय साम्राज्यक अंग बनल। सामाजिक दृष्टिकोणसँ सेहो इ युग महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। राज्यक स्वरूप मंगलकारी छल यद्यपि राजाक शक्तिमे अपार बृद्धि भेल छलैक। साँसारिकताकेँ प्रति आस्था लोगमे बढ़ि गेल छलैक आ प्रत्येक व्यक्ति जीवनकेँ सुखी रूपे व्यतित करबा लेल इच्छुक छल। ताहि दिनमे मनुष्य सुगठित, स्वस्थ आ बलवान होइत छल। वस्त्राभूषणक प्रति हुनका लोकनिक स्नेह विशेष रहैत छलन्हि आ खेलकूद, नाचगान आ संगीतक प्रचलन बढ़िया छल। मगधक राजधानी पाटलिपुत्र ताहि दिनमे संसारक सर्वश्रेष्ठ नगर छल आ प्रधान क्रीड़ा केन्द्र सेहो। एहि क्रीड़ाक अंतर्गत शाल-भंजिका एवं अशोक पुष्प प्रचायिका विशेष रूपे प्रचलित छल। कौटिल्यक अर्थशास्त्र आ अशोकक अभिलेखमे उत्सव, समाज, आ यात्राक उल्लेख भेटइत अछि जाहिमे आमोद-प्रमोदक व्यवस्था छल आ सब केओ बड्ड उत्साहसँ ओहिमे भाग लैत छलाह। कौटिल्य वर्णाश्रम धर्मक बड्ड पैघ समर्थक छलाह। एहि धर्मक समुचित पालन कराएब राजाक कर्तव्य छल। अशोकक शासन कालमे वर्णाश्रम धर्मपर विशेष ध्यान नहि देल गेल कारण अशोक स्वयं बौद्ध छलाह आ हुनका एहि व्यवस्थापर पूर्ण आस्था नहि छलन्हि। चन्द्रगुप्त मौर्य स्वयं शूद्र छलाह तैं हम देखैत छी जे एहि युगमे शूद्रक प्रति कौटिल्यक विचार मनुक अपेक्षा विशेष उदारवादी छल। वर्ण व्यवस्थाक अंतर्गत कतेको जाति–उपजाति बढ़ि गेल। मनु तँ बहुतों विदेशी जाति सबकेँ क्षत्रियक श्रेणीमे रखने छथि। मिथिलाक लिच्छवी लोकनिकेँ सेहो मनु व्रात्य कहने छथि। व्रात्यकेँ सेहो ओ चारि वर्णमे बटने छथि–व्रात्य ब्राह्मण, व्रात्य क्षत्रिय, व्रात्य वैश्य एवँ व्रात्य शूद्र। यवन दूत मेगास्थनीज लिखने छथि जे एहिठाम युनान जकाँ गुलामक व्यवस्था नहि छल। एहि युगमे स्त्रीकेँ अवस्थामे सेहो परिवर्त्तन भेलैक। कौटिल्य स्त्रीकेँ सम्पत्ति अर्जित करबाक आ रखबाक अधिकार देने छथिन्ह। अपन जेवरपर खर्च करबाक अधिकार सेहो हुनका लोकनिकेँ छलन्हि। जँ कोनो व्यक्तिकेँ बेटा नहि रहैक तँ ओकरा बेटीकेँ ओहि सम्पत्तिक स्वामित्वाधिकार भेटइत छलैक। स्त्रीक कल्याणक हेतु अशोकक समयमे “स्त्री–अध्यक्ष–महामात्र”क नियुक्ति भेल छलैक। गुलाम लोकनिक प्रति सेहो राज्यक विचार उदार छल। प्रत्येक गुलामकेँ अपन स्वतंत्रता प्राप्त करबाक अधिकार छलैक।
मौर्योत्तर कालमे चारि वर्णक व्यवस्था बनल रहल। जाति आ उपजातिक संख्यामे विशेष बृद्धि भेल। चारूवर्णक लोग अपना–अपना वर्णक अभ्यंतरहिमे वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करैत छलाह। वराहमिहिरक वृहत्संहिताक अनुसार नगरमे चारूवर्णक भिन्न–भिन्न क्षेत्र होइत छल। चीनी यात्रीक विवरणसँ स्पष्ट अछि जे ब्राह्मण लोकनि पूज्य बुझल जाइत छलाह। ब्राह्मण लोकनिक शुद्ध जीवन व्यतीत करबाक प्रसंग सेहो ओहिमे भेटइत अछि। समाजमे ब्राह्मणक प्रतिष्ठा विशेष छल आ मनु ओकरा आ प्रतिष्ठित बनौलन्हि। नारदक अनुसार श्रोत्रिय लोकनिकेँ कर नहि लगबाक चाही। ब्राह्मण वर्गकेँ सब प्रकारक सुविधा प्राप्त छलन्हि। गुप्त युगमे ब्राह्मण लोकनिक वर्गीकरण वैदिक शाखाक अनुरूप भेल। पाछाँ आबिकेँ एकर आ वर्गीकरण भेल।
मौर्योत्तरकालीन भारतमे क्षत्रिय लोकनिक प्रधानता बढ़ल। शूंग वंश आ कण्ववंशक स्थापनासँ मिथिलामे पुनः ब्राह्मण धर्मक पुनर्स्थापन सम्भव भेल आ ब्राह्मण लोकनिक सत्तामे बृद्धि सेहो। एहियुगमे मिथिलाक ब्राह्मण मिथिलासँ बाहर जाए अपन शाखा–प्रशाखाक स्थापना कएने छलाह। शासन भार जे केओ लैथ हुनक धर्म क्षत्रियक धर्म भऽ जाइत छल। ओना सामान्यतः शासनक भार क्षत्रिय लोकनिक हाथमे रहैत छलन्हि। क्षत्रिय युद्धविद्या, कला, संगीतमे तँ पारंगत होइते छलाह संगहि ओ लोकनि विद्वान सेहो होइत छलाह। समुद्रगुप्तक प्रयाग प्रशस्तिसँ एहिपक्षपर विशेष प्रकाश पड़इयै। जे केओ शासक अथवा राजा होइत छलाह हुनके क्षत्रियक संज्ञा भेटइत छलन्हि। गुप्तशासक लोकनि ओना तँ क्षत्रिय नहि छलाह मुदा जखन राजा भऽ गेलाह तखन ओ क्षत्रिय कहबे लगलाह। राजाक गुणक विवरण बाणक हर्षचरितमे सेहो भेटइत अछि। कृषि आ व्यापारक भार वैश्यपर छलन्हि। इ लोकनि दान आ धर्मक प्रपक्षी होइत छलाह। स्थान–स्थानपर धर्मशाला, अस्पताल आ सत्रक स्थापना इ लोकनि बड्ड प्रेमसँ करबैत छलाह। व्यापार आ उद्योगक संचालनार्थ इ लोकनि अपना मध्य जे संगठन बनौने छलाह तकरा श्रेणी अथवा गिल्ड कहल जाइत छल। मिथिलामे श्रेष्ठी आ सार्थवाहक जे उल्लेख भेटइत अछि सेहो हिनके लोकनिक तत्वावधानमे बनैत छल। शूद्र लोकनिक स्थिति चिंतनीय छलन्हि। ओ लोकनि छोट छीन रोजगारक संग खेती गृहस्थी सेहो करैत जाइत छलाह। हुनका लोकनिकेँ वेद पढ़बाक अधिकारसँ वंचित राखल गेल छल। बिना मंत्रक ओ लोकनि अपन यज्ञादि करैत छलाह। मूल रूपें ओ लोकनि दू भागमे बटल छलाह–सत्–शूद्र आ असत्–शूद्र। असत्–शूद्रकेँ अछूत कहल जाइत छलन्हि। अनुलोम–प्रतिलोम प्रथाक कारणे कतेको मिश्रित जातिक अर्विभाव समाजमे भऽ चुकल छल। चाण्डालक स्थिति यथावत् छल। मिथिलाक उत्तरी छोरपर थारू आ किरात नामक जाति सेहो बसैत छल।
विवाहादिक नियममे कोनो विशेष परिवर्त्तन एहियुगमे नहि भेल। अपन–अपन जातिक अंतर्गतहिमे विवाहादि होइत छल। अनुलोम–प्रतिलोम विवाहक उल्लेख सेहो यदा–कदा भेटिते अछि। मान्य व्यवस्थाक वावजूदो अंतर्जातीय विवाह सेहो होइते छल। गुप्तकालीन साहित्यमे ठाम ठाम गंधर्व विवाहक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। एहियुगमे स्त्रीगणक स्थितिमे आ अवनति भेल। हुनका लोकनि शूद्रे जकाँ वेदक अध्ययनसँ वंचित राखल गेल। वेद मंत्रोच्चारण ओ लोकनि नहि कऽ सकैत छलीह। किछु गोटए पढ़ल–लिखल सेहो होइत छलीहे मुदा ओहन स्त्रीगणक संख्या महान समुद्रमे एकठोप तेल जकाँ छल। पर्दा प्रथाक सम्बन्धमे कालिदास घूंघट–घोघक उल्लेख केने छथि। एहि युगमे स्मृतिकार लोकनि विधवाक सम्बन्धमे आ कठिन नियम बनौलन्हि। शंख, अंगीरस आ हारीत स्मृतिमे तँ एतेक धरि कहल गेल आछि जे विधवाकेँ अपना पतिक चितापर जरिकेँ प्राणांत कए लेबाक चाही। तत्कालीन अभिलेखमे सेहो सतीक उल्लेख भेटइयै।
वस्त्राभूषणमे ताहिदिनक लोग शौकीन होइत छलाह। रेशमी सूती आ ऊनी कपड़ाक विशेष प्रचलन छल। धोती, साड़ी, साया, दुपट्टा, आंगी, जनेउ, बाला इत्यादिक व्यवहार होइत छल। मिथिलाक क्षेत्रसँ प्राप्त मूर्त्तिसँ तत्कालीन वेशभूषाक ज्ञान होइछ। लोग सब नाभीक नीचासँ धोती पहिरैत छलाह आ स्त्रीगण सब साड़ी सेहो ओहिना। स्त्रीगण सब साड़ीक संगे दूपट्टो ओढ़ैत छलीह। टोपीक व्यवहार सेहो होइत छल। नौलागढ़सँ जे एकटा माँटिक मुरूत भेटल अछि ताहिमे देखैत छी जे एक गोटए बेस सुन्दर मुरेठा बन्हने अछि। ई मुरूत गुप्तकालीन थिक। ओहुसँ पहिलुका आ एकटा सुन्दर स्त्रीक माटिक मुरूत ओतहिसँ भेटल आछि जाहिमे केश विन्यास शैली आ विशेषता देखबामे अवइयै। सौन्दर्य प्रसाधन एवँ श्रृंगार प्रक्रियाक रूप एहि दुनू माँटिक मुरूत बढ़िया जकाँ ज्ञात होइत अछि आ संगहि दु युगक सौन्दर्य साधनक ज्ञान सेहो। स्त्रीक मुरूत शुंगकालीन थिक। मिथिला आ वैशालीसँ प्राप्त माँटिक मुरूतसँ तत्कालीन सौन्दर्य प्रसाधनक चित्र भेटइयै। औंठी, कर्णफूल, कण्ठहार, बाला, इत्यादिक व्यवहार होइत छल। ताहि दिनमे जे मिथिलाक स्त्रीगण पाइत पहिरैत रहैथ तकरो अन्यतम नमूना मिथिलाक मुरूत सबमे भेटइत अछि। सुगन्धित तेल आ अन्यान्य सौन्दर्य साधनक व्यवहार सेहो ताहि दिनमे होइत छल। दाँतमे मिस्सी लगेबाक प्रथा सेहो छल आ हियुएन संग एकर उल्लेख कएने छथि।
गुप्तयुगक पछाति एवँ कर्णाटवंशक उत्थान धरि वर्णाश्रम धर्मक प्रधानता बनले रहल आ ठाम–ठाम कठोर सेहो भेल। स्मृतिकार लोकनिक रचनासँ एकर भान होइछ। अनुलोम–प्रतिलोमक फले अनेको वर्णशंकर उपजाति आदिक विकास भेल। असत् शूद्र अंत्यजक नामसँ पाँचम वर्णमे परिगणित भेल। एहियुगमे पंचगौड़क कल्पना सेहो साकार भेल आ पंचगौड़ ब्राह्मणक सूत्रपात सेहो ब्राह्मण लोकनि दोसरो वर्णक जीविकाकेँ अपनौलन्हि। यज्ञक संगहि संग ओ लोकनि मूर्त्तिपूजा आ पुरोहिताइक पेशा सेहो अपनौलन्हि। ब्राह्मण लोकनि सेनापतिक काजमे सेहो निपुण होमए लगलाह। पालवंशक अधीन बहुतो ब्राह्मण सेनापति रहैथ जकर उल्लेख पाल अभिलेखमे अछि। एहियुगमे ब्राह्मण लोकनिकेँ प्रचुर मात्रामे खेत दानमे भेटल छलन्हि आ ओ लोकनि पैघ–पैघ सामंत भेल छलाह आ जमीनकेँ दोसराक हाथे खेती करबाय ओ लोकनि अपन सामंत प्रदत्त राजनैतिक अधिकारक सुरक्षामे व्यस्त रहैत छलाह। ब्राह्मण–क्षत्रिय आब खेतियो दिसि भीर गेल छलाह।
शूद्र लोकनिक अवस्था आ दयनीय भऽ गेल छलैक। एहियुगसँ डोम, चमार, नट आदिक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। भाटक उल्लेख तँ सहजहि भेटितहि अछि। एहियुगमे जातिकर्म, नामकरण, उपनयन, विवाह, श्राद्ध इत्यादि संस्कारक उल्लेख भेटइत अछि। विवाह संस्कार प्रधान सामाजिक संस्कार मानल जाइत छल। बहुपत्नित्वक उदाहरण सेहो भेटइत अछि। ब्राह्मण अन्य जातिक भोजन अथवा जल नहि ग्रहण करैत छलाह। एहियुगमे प्रायश्चितक विधान सेहो बनल। माँछ, माउँस आ मदिराक व्यवहार होइत छल। सिद्ध कवि लोकनिक लेखतँ एहि सब विवरणसँ भरल अछि। चर्यापद(मैथिलीक आदि रूप)मे एकठाम लिखल अछि जे स्त्री लोकनि मदिरा बेचइत छलीह। क्षत्रिय लोकनि विशेष मदिरा पान करैत छलाह। पहिरब–ओढ़बमे कोनो विशेष फर्क देखबामे नहि अवइयै। मूर्त्ति सबसँ श्रृंङ्गारिकताक भान होइछ। कर्णफूल, हार, भुजदण्ड, करघनी, कंगन, बाला आदि आभूषणक व्यवहार होइत छल। कुमकुम लगेबाक प्रथा सेहो छल। सतीप्रथाक प्रचलन तँ चलिये आबि रहल छल। एक लेखमे दीपावलीक उल्लेख सेहो भेटइत अछि–
“दीपोत्सव दिने अभिनव निष्पन्न प्रेक्षा मध्य मण्डपे”।
संगीत आ नृत्यक आयोजन तँ बरोबरि होइते छल। चर्यापदमे सतरंजक उल्लेख सेहो अछि। जूआक प्रथा प्रचलित छल। एहियुगमे अन्धविश्वास आ तंत्रमंत्रक प्रधानता बढ़ि चुकल छल। ज्योतिषपर लोकक आस्था जमि चुकल छल। विजयसेनक देवपारा अभिलेखमे ग्राम ललनाक नगर जीवनक अनभिज्ञता आ अबोधपनक उल्लेख भेल अछि। मुसलमान लोकनि भारतमे पसरि चुकल छलाह तैं एहि युगमे शुद्धिक सिद्धांतक प्रतिपादन सेहो भेल। मिथिलामे पान आ चौपाड़िक प्रचलन खूब छल।
शबरस्वामीक लेखसँ तत्कालीन मैथिल समाजक झाँकी भेटइत अछि। ओ ‘हूराहिरी’क उल्लेख कएने छथि। शतपथ ब्राह्मणमे कहल अछि–
“तस्माद वराहं गावोऽनु धावंती”।
गम्हरी, दही, दूध, चूड़ा, आदिक उल्लेख सेहो शबरस्वामीमे भेटइयै। इहो दास आ गुलामक उल्लेख कएने छथि। हुनका लेखनीसँ चिड़इ खेबाक प्रथाक अप्रत्यक्ष रूपे उदाहरण भेटइयै। दही भातक उल्लेख सेहो ओहिमे भेटइयै। माछ खेबाक निपुणताक वर्णनमे तँ एहने बुझि पड़ैत अछि–जेना शबरस्वामी नाचि उठल होथि। ओ खीर बनेबाक उल्लेख सेहो केने छथि।
“ये एकस्मिन कार्यिन विकल्पे न साधकाः
श्रूयंते ते परस्परेण विरोधिनोभवंति।
लोकवन्–यथा मत्स्यांन् न पयसा
समश्नीयादिति। यद्यपि
सगुणमत्स्या भवंति तथापि
पयसा सहन समश्यंते”।
एहियुगमे जातिक रूप कायस्थ जातिक विकास आ उत्थान भेलैक। उशनस आ वेदव्यासक स्मृतिमे कायस्थक उल्लेख जातिक रूपमे भेल अछि। याज्ञवल्क्य स्मृतिमे सेहो कायस्थक उल्लेख भेल अछि। गुप्तकालीन अभिलेखमे सेहो प्रथम कायस्थक उल्लेख भेटइत अछि। गुणैगार ताम्रपत्रमे सैनिक मंत्री लोकनाथकेँ कायस्थ कहल गेल छन्हि। बंगाल–पूर्णियाँ क्षेत्रक पुण्ड्रवर्द्धन भुक्तिमे तीन चारि पुस्त धरि चिरातदत्त (करण कायस्थ) राज्यपाल छलाह। ५५०ई.क पश्चात् कायस्थ लोकनि एक जातिक रूपमे समाजमे स्थापित भऽ चुकल छलाह। ‘प्रथम कायस्थ’ मुख्य सचिव होइत छलाह। कायस्थमे अखन विशेष उपजातिक वृद्धि नहि भेल छल। ‘करण’ सेहो कायस्थक द्योतक छलाह ओना ई एकटा ‘पद’ छल जाहिपर काज केनिहार सब केओ करणिक कहबैत छलाह आ जतए एकर मुख्यालय होइत छल तकरा अधिकरण कहल जाइत छल। मिथिलामे करण कायस्थक प्रभुता कर्णाटवंशक स्थापनाक संग बढ़लैक। वैशाली क्षेत्रमे ११–१२म शताब्दीक एकटा लेख प्राप्त भेल अछि जाहिमे करण कायस्थक उल्लेख अछि। ई लेख बुद्धक प्रतिमाक पादपीठपर खोदल अछि। एहि मूर्त्तिक दान केनिहार करणिक महायान पंथी भक्त छलाह।
“देय धर्मोऽयम् अवरमहायानयायिनः
करणिकोच्छाहः माणिकसुतस्य”–
एवँ प्रकारे हम देखैत छी जे कर्णाट वंशक स्थापना धरि मिथिलाक समाज सब स्टेजसँ गुजरि चुकल छल। नान्यदेवक पछाति मिथिलाक अपन निखार प्रत्यक्ष भेलैक आ सामाजिक क्षेत्रमे जे क्रांतिकारी परिवर्त्तन भेलैक तकरे हमरा लोकनि हरिसिंह देवी प्रथाक नामे जनैत छी जकर प्रभाव अखन धरि मिथिलामे बनल अछि।
पंजी प्रथाक विकास:- महाराज हरिसिंह देव कर्णाटवंशक अंतिम शासक छलाह जे मुसलमान द्वारा पराजित भऽ पड़ा गेला। पड़ेबासँ पूर्व मिथिलाक सामाजिक नियमनक हेतु ओ जे एकटा विस्तृत व्यवस्था केलन्हि ओकरे अघुना हमरा लोकनि–‘हरिसिंह देवी’ प्रथाक नामे जनैत छी अथवा सुसंस्कृत भाषामे एकरा पंजी प्रथा कहल जाइत अछि। एहि सम्बन्धमे अखनो धरि कैक प्रश्नपर विद्वानक बीच मतभेद बनले अछि। ओना एहि प्रथाक जन्म देनिहार तँ हरिसिंह देवकेँ मानल जाइत छन्हि मुदा किछु विद्वानक अनुसारे एकर इतिहास प्राचीन अछि। कुलीन प्रथाक स्थापना जँ जन्मक विशुद्धतापर भेल छल तखन तँ एहि प्रसंगपर मीमाँसक कुमारिल भट्टक मंतव्य जे तंत्रवार्तिकमे प्रसारित अछि से देखब आवश्यक–
“विशिष्टेनैव हि प्रयत्नेन महाकुलीनाः
परिरक्षंति आत्मानम्।
अनेनैव हि हेतुना राजभिर्ब्राह्मणैश्च
स्वपितृपितामहादि पारम्पर्या–
विस्मरणार्थ समूहलेख्यानि प्रवर्तितानि
तथा च प्रतिकूलं गुणदोष स्मरणात्तदनुरूपः
प्रवृत्ति निवृत्तयो दृश्यंते”॥
अर्थ भेल जे कुलीनकेँ अपन जातिक रक्षाक हेतु बड्ड प्रयत्न करए पड़इत छन्हि। तहि सँ क्षत्रिय एवँ ब्राह्मण लोकनि अपन पिता पितामह प्रभृति पूर्वजक नाम बिसरि नहि जाइ तँ “समूह संख्य” रखैत छथि आ प्रत्येक कुलमे गुण–दोषक विवेचन कए तदनुसार सम्बन्ध करबामे प्रवृत होइत छथि।
जँ एहि प्रमाणकेँ कुलीन प्रथा अथवा पाँजि रखबाक प्रथाक प्रारंभ मानल जाइक तँ इ कहए पड़त जे सर्वप्रथम एकर उदगम मिथिलामे भेल आ बादमे जखन लोग एकरा बिसरि गेलाह छल तखन हरिसिंह देव ओकरा वैज्ञानिक पद्धतिपर पंजीबद्ध करौलन्हि। सातम–आठम शताब्दीसँ हरिसिंह देव धरिक कालमे जँ लोग एहि ‘समूह लेख’ पद्धतिकेँ विसैरि गेलाह तँ कोनो आश्चर्यक गप्प नहि कारण एहि बीचमे मिथिलापर चारूकातसँ आक्रमण होइत रहल छल आ एक अस्थिरताक स्थिति व्यापक छल। कर्णाटवंशक स्थापनाक बाद पुनः एक प्रकार स्थायित्व आ नवजागरण आएल आ तैं सामाजिक उच्छृखंलतापर पूर्णविराम लगेबाक हेतु सामाजिक नियमनक आवश्यकता लोककेँ बुझि पड़लैक आ हरिसिंह देवकेँ ई श्रेय छन्हि जे ब्राह्मण–क्षत्रिय मध्य प्रचलित प्राचीन पद्धति अपना शासन कालमे पूर्णरूपेण वैज्ञानिक बनौलन्हि।
स्वर्गीय रमानाथ झाक अनुसारे समूह लेख्य पाँजि जकाँ राखल जाइत छल आ प्रत्येक वैवाहिक सम्बन्ध भेल उत्तर ओहिपर टीपि लेल जाइत छल। कुमारिलक ‘समूह लेख्य’ समस्त ब्राह्मणक एकत्र संग्रहित भऽ पंजी कहाओल। एहि परिचय सबहिक आधारपर एक एक कुल एक एकटा नाम दऽ देल गेल जे नाम ओहिकुलक पूर्वजक आदिम ज्ञात निवास स्थान गामक नामपर भेल ओ सैह ओहि कुलक मूल कहाओल। कुमारिलक समएमे गुणदोषक विवेचन लोग स्वयं करैत छल मुदा हरिसिंह देवीक बाद आब परिचयक आधारपर गुण–दोषक विवेचण होएब प्रारंभ भेल। बंगालक कुलीन प्रथा जाति मूलक छल आ अकुलीनक संपर्क होइतहुँ कुलीन अपन कुलीनत्वसँ पतित भऽ जाइत छल। मिथिलामे उच्चता–नीचताक अवधारण स्मृतिक अनुसारहि भेल। मनुक उक्ति देखबा योग्य अछि–
“कुविवाहैः क्रियालोपैर्वेदाध्ययनेन च
कुलान्यकुलताँ यांति ब्राह्मणातिक्रमेण च”–
उत्तमैरूत्तमैर्नित्यं सम्बन्धानाचरेत्सह
निनिषुः कुलमुत्कर्षमधमानधमाँस्त्यजेत्”॥
उपरोक्तसँ स्पष्ट अछि जे जातिक अपकर्ष किंवा उत्कर्ष वैवाहिक सम्बन्धसँ नियमित होइत छल। मुदा मात्र जन्मक शुद्धिमात्र एकर नियामक नहि छल। भवभूतिक मालती माधवक टीकामे धर्माधिकरणिक जगद्धर लिखने छथि–
“जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्काराद् द्विज उच्यते
विधया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय उच्यते”॥
एतवा सब किछु रहितहुँ विद्या ओ आचारकेँ गौण मानि मात्र जन्मक उत्कर्षकेँ प्रधानता दए सामाजिक नियमन जहियासँ आरम्भ भेल तहियेसँ एहि व्यवस्थामे दोष आबए लागल। विवाहक सम्बन्धमे प्राचीन कालहिसँ किछु नियम बनल छल–विवाहक अधिकार ओहि कन्यासँ भऽ सकैत अछि जे–
i) एक गोत्रक नञि हो।
ii) एक प्रवरक नञि हो।
iii) माएक सपिण्ड नञि हो।
iv) बापोक दिसि कोनो पूर्वजक ६पुश्त धरि निम्न नञि हो।
v) माएक दिसिसँ कोनो पूर्वजक ५पुश्त धरि निम्न नञि हो।
vi) पितामह–मातामहक संतान नञि हो।
vii) कठमाम (सतमाएक भाई)क संतान नञि हो।
स्वजनक संग विवाह नहि भऽ सकैत चल कारण ओहन विवाहसँ उत्पन्न संतानकेँ चण्डाल कहल जाइत छलैक। मिथिलामे स्मृतिसारक रचयिता हरिनाथसँ एहने गलती भऽ गेल छलन्हि आ तैं हरिसिंह देव पंजी प्रथाक निर्माण केने छलाह सएह कहल जाइत अछि। सब केओ ई कथा जानने छथि तैं अहिठाम एकरा दोहराएब हम आवश्यक नहि बुझैत छी। हरिनाथ अन्धकारमे विवाह कऽ लेने छलाह कारण हुनक पत्नी हुनक साक्षात पितिऔत भाइक दौहित्री छ्लथिन्ह। जाहि समूह लेखक उल्लेख हम पूर्वहिं कैल अछि हरिसिंह देव ओकरे वैज्ञानिक पद्धतिपर आनि पंजी प्रथाक जन्मदाता कहबैत छथि। हरिसिंह देवक आदेशानुसार सब ब्राह्मणक परिचय संग्रहित भेल आ ओहि संग्रहकेँ विशिष्ट पंडितक जिम्मा लगा देल गेल जे सब किछु देखि अधिकार निर्णय करैथ आ विवाहक हेतु प्रमाण पत्र दैथ–ओहि प्रमाण पत्रकेँ ‘अस्वजन’ पत्र कहल जाइत छैक। संग्रहित परिचयमे प्रत्येक विवाह आ विवाहक संतानक नाम जोड़ल जाइत छल आ उएह परिचय पञ्जी कहाओल आ जिनका जिम्मा एकर भार देल गेलन्हि सैह पञ्जीकार कहौलथि। ‘अस्वजन पत्र’ लिखके देबाक प्रथा सिद्धांत कहाओल जे अद्यावधि ब्राह्मण आ करण कायस्थमे प्रचलित अछि।
जे लोकनि परिचय एकत्र करैत छलाह से ‘परिचेता’ कहबैत छलाह–एहि प्रसंगमे गोत्र, प्रवर आ शाखा सेहो लिखल जाइत छल। सब परिचयकेँ गोत्रक अनुसार अलग–अलग रखलासँ प्रत्येक गोत्रक भिन्न–भिन्न कुलक चित्र समक्ष आबि जाइत छल। कुलक नाम कुलक प्राचीनतम ज्ञात निवास स्थानपर राखल गेल जे ओहि कुलक “मूल” कहाओल। बादमे गोत्र आ मूलसँ प्रत्येक वंशक संकेत भेटए लागल। गुप्त युगहिंसँ एहिबातक प्रमाण भेटइत अछि जे ब्राह्मण अपन ग्राम अथवा निवास स्थानहिसँ चिन्हल जाइत छलाह आ गुप्तयुगसँ पाल युग धरिक अभिलेख सबमे ब्राह्मण लोकनिक चारि–पाँच पुस्तक विवरण भेटइत अछि। ब्राह्मण लोकनि जाहि–जाहि गाममे निवास करैत छलाह ताहि–ताहि गामक प्रशंसा सेहो अभिलेख सबमे भेटइत अछि। मध्ययुगमे राढ़क ब्राह्मण लोक ५६उपजातिमे बटि गेल छलाह आ हिनका लोकनिक वर्गीकरण गाम–गाँइ–गामीकक आधारपर भेल छलन्हि। ११–१३म शताब्दीक अभिलेखमे एकर उल्लेख भेटइत अछि। ठीक अहिना हरिसिंह देव मूल–निवासक आधारपर ब्राह्मण लोकनिकेँ करीब १८०मूलमे बँटने छलाह आ मिथिलाक करण कायस्थकेँ करीब ३५०मूलमे। अहिना अम्बष्ट कायस्थ सेहो करीब १००घरमे बटल छथि। ब्रह्मवैवर्त्त पुराणक ब्रह्मखण्डमे कहाबत अछि जे देश भेदसँ जाति भेद उत्पन्न होइछ आ मध्ययुगीन पंजी परम्परा जे जोड़ देल गेल अछि से एहिबातक सबूत मानल जा सकइयै। गाम–गामक महत्व बढ़ए लागल। संग्रहित पाँजिमे जे सबसँ प्राचीनतम ज्ञात पुरूषक नाम उपलब्ध भेल उएह ‘बीजी–पुरूष’ कहौला। जँ एक्के गामक वासी दु कुलमे भेटला तँ हुनक भेदकेँ स्पष्ट करबाक हेतु कुलक मूलक संगहि–संग नव निवास स्थानक नाम जोड़ि देल गेल।
मिथिलाक ब्राह्मण लोकनि सामवेद आ शुक्ल यजुर्वेदक अनुयायी छथि–सामवेदी कौधुम शाखीय छथि आ यजुर्वेदी माध्यन्दिन शाखीय। क्रमशः इ दुनू छन्दोग आ वाजसेनयि कहबैत छथि। सामवेदी–छन्दोगमे मात्र शाँडिल्य गोत्र प्रचलित अछि आ माध्यन्दिन वाजसेनयिमे वत्स, काश्यप, पराशर, कात्यायन, सावर्ण आ भारद्वाज। एहि सात गोत्रक कुल व्यवस्थित कहबैत छथि। ब्राह्मणक आ ग्यारहटा गोत्र जे मिथिलामे अछि से भेल–गार्ग्य, कौशिक, अलाम्बुकाक्ष, कृष्णात्रेय, गौतम, मौदगल्य, वशिष्ठ, कौण्डिन्य, कपिल आ तण्डि। प्रत्येक गोत्रमे कैकटा मूल अछि। ओना तँ लगभग २००मूलक आभास भेटइत अछि परञ्च ब्राह्मण विद्वान लोकनि मात्र सात गोट गोत्र आ ३४या ३६टा मूलकेँ व्यवस्थित मानैत छथि। मिथिलामे कुलीनताक परिचायक छल जन्मक विशुद्धता, आचारक चारूता आ विद्या व्यवसाय–एहि तीनुसँ युक्त व्यक्तिकेँ श्रोत्रिय कहल जाइत छलन्हि। एहिठाम स्मरणीय जे पाँजिमे मात्र परिचय संग्रहित अछि जाहि आधारपर विवाहक अधिकारक निर्णय होइत अछि। हरिसिंह देव ब्राह्मणकेँ तीन श्रेणी (श्रोत्रिय, योग्य, जयबार)मे बँटने छलाह–ई कथन निराधार अछि। आदर्शकेँ बिसरिकेँ जखन हमरा लोकनि केवल भेदपर जोड़ देब प्रारंभ कैल तखनहिसँ एहि व्यवस्थामे कुरीतिक प्रवेश भेल। जे जे नीच काज करैत गेलाह से क्रमशः नीच होइत गेला। ब्राह्मण पाञ्जिक अनुसार अधिकार निर्णयक नियम एवँ प्रकारे अछि–
i) कन्याक पिताक पितामहक पितामह।
ii) कन्याक पिताक पितामहक मातामह।
iii) कन्याक पिताक पितामहीक पितामह।
iv) कन्याक पिताक पितामहीक मातामह।
v) कन्याक पिताक मातामहक पितामह।
vi) कन्याक पिताक मातामहक मातामह।
vii) कन्याक पिताक मातामहीक पितामह।
viii) कन्याक पिताक मातामहीक मातामह।
ix) कन्याक माताक पितामहक पितामह।
x) कन्याक माताक पितामहक मातामह।
xi) कन्याक माताक पितामहिक पितामह।
xii) कन्याक माताक पितामहीक मातामह।
xiii) कन्याक माताक मातामहक पितामह।
xiv) कन्याक माताक मातामहक मातामह।
xv) कन्याक माताक मातामहीक पितामह।
xvi) कन्याक माताक मातामहीक मातामह।
आठम पीढ़ीसँ सपिण्डत्व हटि जाइत छैक।
मिथिलामे पाञ्जिक अध्ययन अखनो वैज्ञानिक पद्धतिसँ नहि भेल अछि कारण ओकर साहित्य एतेक जटिल अछि जे सब केओ ओकर अध्ययन कइयो नहि सकैत छथि। रमानाथ बाबूक अतिरिक्त आ एकाध गोटए पाञ्जिक अध्ययन कएने छथि मुदा पूर्णरूपेण वैज्ञानिक ढ़ँग आ तालपत्रपर लिखित पाञ्जिक अध्ययन मेजर विनोद बिहारी वर्मा अपन “मैथिल करण कायस्थक पाञ्जिक सर्वेक्षण”मे कएने छथि। ई अध्ययन अपना ढ़ँगक अद्वितीय अछि आ पाञ्जिक अध्ययनक क्षेत्रमे ई अपन एकटा नव कीर्तिमान स्थापित केलक आछि। तालपत्र हिनक काफी प्राचीन अछि आ पाँजि प्रथाक स्थापनाक लगभग ५०वर्षक अभ्यंतरहिमे लिखल अछि। एहि आधारपर अखन आरो कतेक अध्ययन प्रस्तुत कैल जा सकइयै। पाँजि प्रथाक नींव जाहि आधारपर पड़ल तकरा सम्बन्धमे मेजर वर्मा लिखैत छथि–
चण्डेश्वर ठाकुरक गृहस्थ रत्नाकरसँ उद्धृत किछु स्मृतिकारक कथन उद्धृत कैल जाइछ जाहिपर पाँजी प्रथाक नींव पड़ल।–
मनुशातातपौ:-
असपिण्डा तुया मातुर सगोत्रा चयापितुः।
सा प्रशस्ता द्विजातीनाँ दार कर्म्मणि मैथुने॥
एवँ प्रकारे ओ गौतम, याज्ञवल्क्य, हारीत, विष्णुपुराण आदिसँ विभिन्न मत उपस्थित कएने छथि। पाँजि जखन उपस्थित कएल गेल तखन देशक स्थिति चिंतनीय छल। करण कायस्थ पाञ्जिक अध्ययनसँ स्पष्ट होइछ जे कठोर बन्धनक पश्चातो पाँजिमे “स्वयं गृहीता” कन्या, “चेचिक विजाती”सँ व्याहक उल्लेख, “कुलाल” जातिक उल्लेख, “चेटिका धृताः” आदिक यत्र–तत्र विवरण भेटइत अछि। जातिक रक्षा करब पाञ्जिक एकमात्र प्रयोजन छल परञ्च कायस्थ पाञ्जिक अध्ययनसँ स्पष्ट अछि जे किछु अंतर्जातीय विवाह सेहो होइत छल। करण कायस्थक पाञ्जिमे गोत्रक उल्लेख नहि अछि। बलायिन मूलक आदि पुरूष मंधदासक गोत्र राढ़मे अत्रि, कुचबिहारमे वशिष्ट आ मिथिलामे काश्यप लिखल गेल अछि। पाञ्जिमे कतहु नहि कहल गेल अछि जे अमूक मूल श्रेष्ठ आ छोट अछि आ ने भलमानुसे–गृहस्थक चर्च ओहिमे कतहु अछि।
पाञ्जिक पूर्ण शिक्षा प्राचीन कालमे पञ्जीकार लोकनिकेँ देल जाइत छलन्हि आ प्राचीन पाठशालामे मिथिलामे पाञ्जि शास्त्रक पढ़ाइ होइत आ जे एहिमे उत्तीर्ण होइत छलाह सएह ‘पञ्जीकार’ होएबाक योग्यता प्राप्त करैत छलाह। पञ्जीकारकेँ निम्नलिखित वस्तुसँ अवगत हैव आवश्यक छल–
i) मूल निर्णय,
ii) डेरावली,
iii) वंशावली,
iv) सादा उतेढ़।
पाञ्जि लिखबाक हेतु किछु नियमक पालन आवश्यक छल। पञ्जीक एक पातक एक पृष्ठक सोलह कालम आ गाम एवं प्रकारे विभक्त कैल गेल अछि–
मायक वंशक हेतु आठ कालम आ गाम।
पितामहीक वंशक हेतु चारि कालम आ गाम।
प्रपितामहीक वंशक हेतु दू कालम आ गाम।
वृद्धा प्रपितामहीक वंशक हेतु एक कालम आ गाम।
अपन स्वयंक ५पीढ़ी पूर्वजक हेतु एक कालम आ गाम।
पाञ्जिक १६कालम विभक्त देखबामे अवइयै। एक पातक एक पृष्टमे १६मूल गामक उल्लेख रहैत अछि–३१व्यक्तिक नाम आ १६कन्याक नामक उल्लेख रहैत अछि। अधुना पाञ्जि देखबाक अथवा अध्ययन करबाक अवगति आब पञ्जीकारोकेँ नहि छन्हि। कायस्थक पञ्जीकार मूलतः दुई वंशक छथि–महुनी आ सीसब। पाञ्जिमे जातीय इतिहास सुरक्षित अछि।
पंञ्जीक तिथि:-पञ्जीक तिथिक सम्बन्ध सेहो विद्वानक बीच मतभेद अछि। सब तथ्यक अनुशीलन केला उपरांत हमरा अपन विचार इ अछि जे पञ्जीक प्रारंभ १३१०–११ ई.मे भेल होएत। १३२३ सँ १३२७ धरिक तिथि जे मनैत छथि से हमरा बुझने मान्य नहि भऽ सकइयै कारण १३२३सँ १३२७क बीच हरिसिंह देव मुसलमानी आक्रमणसँ ततेक तबाह आ व्यस्त छलाह जे ओहि समयमे कोनो एहेन काज करब असंभव छल। नेपाली श्रोतसँ इहो ज्ञात होइछ जे हरिसिंह देव १३२६ई. धरि मिथिलासँ पड़ा चुकल छलाह आ तकर बादक हुनक इतिहासक कोनो निस्तुकी पता हमरा लोकनिकेँ नहि अछि। काठमाण्डुक वीर पुस्तकालयक गोपाल वंशावलीक मूल एतए विज्ञ पाठकक हेतु देल जा रहल अछि –
“स माघ शुदि ३ तिरहूतिः हरशिंहु राजासन
मिह्लोसन तासत्र गही टो ढ़ीलीस तुरूक याके
वंङ रायत मानालपं थमु अगु गन याङ वस्यं
शिमरावन गड्ढ़ भङ्ग याङ तिरहूतिया राजा महाथ
आदिन समस्त वडङ व्यसन वंग्व टों ग्वलछिनो
लिन्दुंबिल ववः ग्वलछिनो राजगाम द्वलखा धारे वंग्व।
हिंपोतस राजा हरसिंह तो शिकथ्वस
काय नो मआथ नो उभय बंधि यंङा कूलन
ज्वोङाव हंग्व राज गामया मझीधारो
धायान समस्त धन कासन”।
उपरोक्त वंशावलीसँ स्पष्ट अछि जे हरिसिंह देव ७जनवरी १३२६केँ शिमराँव गढ़क नष्ट भ्रष्ट भेला पड़ेला आ तकर बाद ओ मरि गेला। राजगाँवक माँझी भारो हुनक पुत्रकेँ गिरफ्तार कए कैदी बना लेलकन्हि आ हुनक सब वस्तुजात लूटि–पाटि लेलकन्हि। ओ शरणार्थीक श्रेणीमे छलाहे शासक हिसाबमे नहि। एहि प्रसंगकेँ जखन हमरा लोकनि ध्यानमे राखब तखन बुझना जाएत जे पञ्जी प्रबन्ध सन काजक प्रारंभ १३२३–१३२७क बीच नहि भेल होएत। मैथिल परम्परामे इ कहल गेल अछि जे शक् १२४८मे नेहरामे विश्वचक्र महादान कएने छलाह। ओ पञ्जी निर्णयार्थ विद्वान लोकनिक आह्वान कएने छलाह।

मिथिलाक आर्थिक इतिहास

मिथिलाक आर्थिक अवस्था अति प्राचीन कालसँ अद्यपर्यंत कृषिपर आधारित रहल अछि। प्राचीन कालमे अखन जकाँ जलक अभाव नहि छल। मिथिलाक प्राकृतिक बनाबट किछु एहेन अछि जाहिसँ एहिठाम कृषिक प्रगति नीक जकाँ होइत अछि। वैदिक कालमे खेत जोतबाक, बीआ पारबाक, काटबाआ फसिल तैयार करबाक विस्तृत रूपें उल्लेख भेटइत अछि। पकला उत्तर अन्नकेँ काटल जाइत छल आ तखन ओकरा बोझ बान्हिकेँ खरिहानमे आनल जाइत छल। दाउन होइत छल तकर पश्चात् ओसौनी होइत छल आ तखन ओकरा सरियाकेँ व्यवहारक हेतु राखल जाइत छल। एहि लेल कृषक लोकनिकेँ बड्ड परिश्रम करए पड़इत छलन्हि। नापतौलक आधार छल ‘खाड़ी’। बखारीक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। मिथिलामे चाउर, जौ, मूँग, मकई, गहूम, तिल, मसुरी, आदि वस्तु उपजैत छल। जौ के रोपनी शीतकालमे होइत छल आ गर्मी मासमे ओकरा काटल जाइत छल। धानक रोपनी बरसातमे होइत छल आ अगहनमे ओकर कटनी होइत छलैक। अनावृष्टिसँ कृषिकेँ क्षति पहुँचैत छलैक। कीड़ा–मकोड़ासँ सेहो फसिल बर्बाद होइत छल। अन्हर, बिहाड़ि, बसात, अतिवृष्टि आ अनावृष्टिक संगहि टिड्डीक प्रकोपसँ कृषिकेँ धक्का पहुँचैत छलैक। अनावृष्टिसँ अकालक संभावना सेहो रहैत छलैक। सामान्य किसानक स्थिति बढ़िया नहि छल आ हुनका मालिक लोकनिक अत्याचारसँ तबाह होमए पड़इत छलन्हि। कृषकक समूह विशाल होइतहुँ हुनका लोकनिकेँ कोनो विशेषाधिकार नहि छलन्हि आ हुनका लोकनिपर कर्जक बोझ बरोबरि बनले रहैत छलन्हि।
उपनिषदमे जे जनकक बहुदक्षिणा यज्ञक उल्लेख अछि ताहिसँ ई अनुमान लगाओल जा सकइयैजे मिथिला ताहि दिनमे एक समृद्धशाली राज्य छल। राजकोश धन–धान्यसँ अवश्ये भरल होइत अन्यथा एतेक पैघ यज्ञ ओ कइयै कोना सकितैथ। ओहि यज्ञमे हजारोक संख्यामे गाय आ सोनाक दान भेल छल। गाय बड़दपर विशेष ध्यान देल जाइत छल ताहि दिनमे। बृहदारण्यक उपनिषदक अध्ययनसँ बुझि पड़इयै जे मिथिला ताहि दिनमे सुखी सम्पन्न राष्ट्र छल आ ओतए कोनो वस्तुक अभाव नहि छलैक। ओहिमे सामानसँ लदल बैलगाड़ीक उल्लेख सेहो अछि। आवागमनक हेतु रथ एवँ नावक व्यवहार होइत छल। ‘स्वर्णपाद’क व्यवहार एहि बातक संकेत दैत अछि जे ताहि दिनमे सोनाक सिक्काक प्रचलन छल। आर्थिक निश्चिंतताक कारणे देशमे आध्यात्मिक एवँ बौद्धिक विकास संभव भेल छल। मैथिल लोकनि ताहि दिनमे स्वभावसँ शांत एवँ क्रियाशील छलाह। पढ़ब–लिखबपर विशेष ध्यान दैत छलाह तथापि सैनिकक रूपें सेहो ओ लोकनि ककरोसँ कम नहि छलाह आ तीर चलेबामे तँ अग्रगण्ये।
कृषि मनुष्यक मुख्य कार्य छल। लोक सब विशेष कए गामेमे रहैत छल। गाममे ३०–४०सँ लऽ कए १०००परिवार धरि रहैत छल। गामक समीपहि गाछी–बिरछी सेहो रहैत छल। गामक अध्यक्ष अथवा गण्यमान्य व्यक्ति गामभोजक होइत छलाह। गामक हेतु इ सर्वश्रेष्ठ एवम महत्वपूर्ण पद छल। राजाक हेतु कर वसूल करब, कृषि व्यवस्थाक निरीक्षण करब, ग्रामीण झगड़ा–झंझटकेँ फरिछैब हिनका लोकनिक मुख्य कर्तव्य छल। जँ उपजा नहि होइत छल तँ ग्रामीण लोकनिक भोजनक व्यवस्था हिनके करए पड़इत छलन्हि। उपजनिहार खेतमे पहरूदार सेहो राखल जाइत छल। उत्पादनक साधन मूल रूपें धनीमानी लोकक हाथमे छल तैं साधारण कृषकक स्थिति दयनीय रहब स्वाभाविके छल। जँ कोनो कारणे अन्न नहि उपजल तँ हिनका लोकनिकेँ अपार कष्टक सामना करए पड़इत छलन्हि। अकाल पड़बाक उल्लेख प्राचीन साहित्यमे भेटइत अछि। महावस्तुमे एहि बातक स्पष्ट उल्लेख अछि जे वैशालीमे एक बेर भीषण अकाल पड़ल छल। भूखसँ पीड़ित भऽ असंख्यलोक मुइल छल आ मुर्दाक दुर्गन्धसँ समस्त नगरक वातावरण दुर्गन्ध पूर्ण भऽ गेल छल। एहि युगमे बाढ़िक प्रकोपक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। गण्डकसँ पूर्वक क्षेत्रमे जलक बाहुल्य रहैत छल। मौर्यकालीन अभिलेखमे अकाल आ अभावक उल्लेख भेटइयै। मिथिलाक अंतर्गत विदेह, वैशाली, चम्पारण, अंगुतराप, पुण्ड्र, कौशिकी कक्ष, आदि स्थान सब कृषिक हेतु प्रसिद्ध छल आ एहि समस्त प्रदेशकेँ अन्नक भण्डार कहल जाइत छल। अंगुतरापक आपण गाम सुखी सम्पन्न छल। खेती करबाक हेतु खेतकेँ छोट–छोट टुकड़ीमे बाटल जाइत छल आ खेतक बीच सबमे आड़ि सेहो होइत छल। मिथिलामे इ प्रथा अद्यपर्यंत अछिये।
ताहि दिन मिथिलामे जमीनपर स्वत्वाधिकारक प्रश्न लऽ कए विद्वानमे मतभेद बनल अछि। अखन जतवा जे साधन उपलब्ध अछि ताहि आधारपर कोनो निर्णयात्मक मतक प्रतिपादन करब कठिन अछि कारण जमीनपर दुनू पक्षक विचारक हेतु सामग्रीक अभाव नहि अछि। व्यक्तिगत रूपें हमर अपन मंतव्य तँ इ अछि जे प्राचीन कालमे औपचारिक रूपें समस्त जमीनक अधिकारी राजा होइत छलाह किएक तँ परम्परागत विचारे ‘सवै भूमि गोपाल की” मानल जाइत छल आ राजा ईश्वरक प्रतिनिधि हिसाबे जमीनक मालिक सेहो होइत छलाह। विद्वान लोकनि तीनटा मत प्रतिपादन केने छथि–व्यक्तिगत, सामूहिकआ राजकीय स्वत्वाधिकार आ तीनू मतक पक्ष–विपक्षमे एक्के रंग तर्क देल जा सकइयै। फाहियान लिखने छथि जे केओ राजकीय जमीन जोतैत छथि हुनका ओहिमे सँ किछु अंश राजाकेँ देमए पड़इत छन्हि। अर्थशास्त्रमे राज्य नियंत्रित कृषि व्यवस्थाक विवरण अछि। जातकमे सामूहिक स्वत्वाधिकारक विवरण भेटइत अछि।
जमीन प्राचीनकालक आर्थिक जीवनक नींव छल जाहिपर समस्त आर्थिक रूपरेखा ठाढ़ छल। जातकमे भोगगाम आ अर्थशास्त्रमे ‘आयुधीय’ गामक उल्लेख भेटइयै। एहि सभक व्याख्या प्रत्येक विद्वान अपना–अपना ढ़ँगे करैत छथि। अर्थशास्त्रमे कौटिल्य कर्मचारीकेँ नगद वेतन देबाक व्यवस्था केने छथि मुदा ‘आयुधीय’ गामक उल्लेख किछु विद्वानकेँ दोसर अर्थ लगैत छन्हि। जखनसँ प्रचुर मात्रामे जमीनक दान शुरू भेल तखनसँ सामंतवादक वीजारोपण सेहो भेल आ भारतक अन्य प्रांत जकाँ मिथिलामे सेहो सामंतवादी प्रथाक विकासक सूत्रपात भेल। सामंतवाद मिथिलामे मध्ययुगमे अपन चरमोत्कर्षपर छल। सामंतवादक प्रभावे जमीनक टुकड़ी–टुकड़ीमे बटब बढ़ए लागल आ बेगार प्रथाक श्रीगणेश सेहो भेल। गुप्त युगसँ जे प्रथा प्रारंभ भेल से मिथिलामे बनल रहल आ सामंतवादी व्यवस्थाक प्रभाव हमरा लोकनिक दैनन्दिन जीवनपर सेहो पड़ल।
सिक्का एवँ कर व्यवस्था:- एहि प्रसंगमे कर व्यवस्था एवँ सिक्काक प्रसंगपर विचार करब अप्रांसगिक नहि होएत। टाका–पैसाक व्यवहार होइत छल अथवा नहि से निश्चित रूपसँ कहब असंभव मुदा वैदिक साहित्यमे हिरण्य, अयस, श्याम, लौह, शीशा, कार्षापण आदिक उल्लेख भेटइत अछि। चानीक टाकाकेँ ‘निष्क’ कहल जाइत छल। सिक्काकेँ कृष्णल, सतमान, हिरण्य, पिण्ड, आ कार्षापण सेहो कहल जाइत छल। ‘स्वर्ण’ सेहो सिक्काक हेतु व्यवहार होइत छल। कतहु–कतहु सिक्काकेँ ‘पाद’ सेहो कहल गेल छैक।
राजाजनक अपन यज्ञमे प्रत्येक गामपर दश–दश ‘स्वर्ण पाद’ लगौने छलाह। ओहिमे प्रत्येक ब्राह्मणकेँ तीन–तीन सतमान सेहो देल गेल छलन्हि। बौद्ध साहित्यमे सेहो एहि हेतु बहुत शब्दक व्यवहार भेल अछि। चानी आ तामाक प्राचीन सिक्का प्रचुर मात्रामे मिथिलाक विभिन्न क्षेत्रसँ प्राप्त भेल अछि–हाजीपुर, चम्पारण, वैशाली, असुरगढ़, गोरहोघाट, पटुआहा, बहेड़ा, जयमंगलागढ़, पुर्णियाँ, बलिराजगढ़, मंगलगढ़ इत्यादि। एहि सभ स्थानसँ तँ घैलक–घैल सिक्का बहराएल अछि। जातक कथामे वस्तुकदाम ‘पण’क माध्यमसँ देल गेल जाइत छल। सिक्काकेँ पण सेहो कहल जाइत छल। साधारणतः सिक्काक तीन नाप छल–२४, ३२ आ ४०रत्ती। ‘पाद’ १००रत्तीक चौथाई भाग होइत छल।
लोककेँ राजाकेँ किछु कर सेहो देमए पड़ैत छलैक। डी. आर. भण्डारकरक अनुसार जनक कालीन आ बौद्धकालीन मिथिलामे “पाद” करक व्यवहार विशेष प्रचलित छल। राजस्व प्रशासनक जे मान्य सिद्धांत छल तदनुसार मिथिलाक शासक लोकनि कर संचय आ ओसूली करैत छलाह। ‘षडभाग’ सिद्धांत तँ सर्वमान्य छल। राजा प्रजाक रक्षा करैत छलाह आ तकरा बदलामे प्रजा राजाकेँ कर दैत छल। ‘कर’क रूपमे जमीनसँ प्राप्त कर सभसँ प्रमुख छल। समाहर्त्ता राजस्व प्रशासक होइत छल। हुनका सहायतार्थ गोप तथा स्थानिक सेहो होइत छलाह। पतञ्जलिक अनुसार क्षेत्रकर नामक एकटा पदाधिकारी महत्वपूर्ण व्यक्ति होइत छलाह जे कृषियोग्य भूमिक सर्वेक्षण कए ओहिपर कर लगेबाक अनुशंसा करैत छलाह। बलि, भाग, भोग, कर, हिरण्य, उदक भाग, उद्रंग, सीतआदि कैक प्रकारक कर होइत छल। एहिमे किछु कर तँ बड्ड कष्टकर छल। उपरोक्त शब्दक विश्लेषण करबामे विद्वान लोकनिक बीच मतभेद छन्हि तथापि उपरोक्त सबटा कर प्रचलित छल सेहो मान्य अछि। एकर अतिरिक्त शुल्क, क्लिप्त, उपक्लिप्त, प्रणय, विष्टी, उत्संग आदि सेहो करेक विभिन्न नाम छल आ इ राजकीय आयक मुख्य श्रोत मानल जाइत छल। इ सब प्रकारक कर मिथिलामे व्याप्त छल आ ओहि ठामसँ प्राप्त शिलालेख आ तत्सम्बन्धी प्राचीन साहित्यमे सेहो एकर उल्लेख अछि।
सामूहिक आर्थिक जीवन:- बौद्ध साहित्यसँ इहो स्पष्ट होइछ जे मिथिलामे मिलि जुलिकेँ रहबाक व्यवस्था आ श्रेणीबद्ध भऽ काज करबाक आदत बहुत पुराण अछि। जातक कथासँ इ ज्ञात होइत अछि जे विदेहक निवासी बंगाल होइत समुद्रक मार्गसँ विदेश जाए व्यापार करैत छलाह। ओ लोकनि एहि हेतु सामूहिक व्यवस्था करैत छलाह–आ नावआ जहाज सेहो बनबैत छलाह। विदेहमे बाहरोसँ व्यापारी लोकनि अबैत छलाह। एहि मानेमे पूर्व–पश्चिम दुनूसँ मिथिलाक घनिष्ट सम्बन्ध छल। आर्थिक जीवनक क्षेत्रमे एहि प्रकारक सामूहिक संगठन लाभदायक सिद्ध होइत छल आ मैथिल लोकनि एहिसँ विशेष लाभान्वित होइत छलाह। बृहदारण्यक उपनिषदसँ एकर प्रमाण भेटइत अछि। सामूहिकताक हेतु गण, व्रात, पूग, संघ, जाति, श्रेणीआदि शब्दक व्यवहार होइत छल। ‘श्रेणी’ मूलतः व्यापारी लोकनिक संगठन छल। व्यापारी लोकनि वणिक कहबैत छलाह। व्यापारक संचालनक हेतु व्यापारी लोकनि अपन ‘श्रेणी’आ संघ बनबैत छलाह। किछु गोटए एकरा गणक संज्ञा सेहो दैत छथि। रामायण–महाभारतमे सेहो व्यापारी संघक उल्लेख भेटइत अछि। रामायणमे ‘नैगम’ शब्दक व्यवहार भेल अछि। वैदिक साहित्यक ‘श्रेष्ठी’आ उपनिषदक ‘श्रेष्ठिन’ शब्दो सेहो सामूहिकताक परिचायक थिक। मनु आ पाणिनिमे सेहो श्रेणी शब्दक उल्लेख अछि।
बौद्ध साहित्य तँ श्रेणी शब्दसँ भरले अछि। लोहार, सोनार, कुम्हार, तेली, व्यापारी, मछुआ, कमार इत्यादि लोकनिक अपन अलग–अलग श्रेणी होइत छलैक। हुनका लोकनिक अपन नियम कानून सेहो भिन्ने छलन्हि। ओ लोकनि अपन नियम अपने मिलिकेँ बनबैत छलाह। हिनका लोकनिक मध्य जे कोनो मतभेद होइत छलन्हि तँ ओकरो निपटारा ओ लोकनि अपन संघेक द्वारा करैत छलैथ। संघ श्रेणीक प्रधान लोकनिकेँ राजदरबारमे समादर होइत छलन्हि आ कानून इत्यादि बनेबा काल हुनका लोकनिक राय–विचार लेल जाइत छलन्हि। मिथिलाक महत्वक वर्णन एहि दृष्टिकोणे महाउमग्ग जातकमे अछि जाहिसँ ई ज्ञात होइत अछि जे नगरक चारू कोनमे निगमक संगठन छल।
श्रेणीक प्रधानकेँ प्रमुख, प्रधान, जेट्ठक अथवा सेठी कहल जाइत छलैक। कमार, सोनार, लोहार, मालाकार, ताँती, कुम्हार आदि सभ वर्गक अपन–अपन प्रधान होइत छलैक। श्रेणीक अंतर्गत काज केनिहार पदाधिकारीक वेतन इत्यादि श्रेणीसँ देल जाइत छलैक। समय–समयपर राजा श्रेणीक प्रधानकेँ विचार–विमर्श करबाक हेतु बजबैत छलथिन्ह। व्यापारी वर्गक प्रतिनिधिकेँ बरोबरि राजदरबारसँ सम्पर्क राखे पड़इत छलैक। श्रेणीकेँ बहुत रास वैधानिक अधिकार सेहो प्राप्त छलैक। सामूहिक जीवनक सभसँ पैघ प्रमाण हमरा वैशालीक उत्खननसँ प्राप्त अवशेष सबसँ भेटइत अछि। सार्थवाह, कुलिक, निगम आदि शब्दक व्यवहार ओहिठाम प्रचुर मात्रामे भेल अछि। नगर शासनमे हिनका लोकनिक बड्डपैघ हाथ छलन्हि। ओहिठामक बहुत मुद्रापर “श्रेष्ठी निगमस्य” उल्लिखित अछि आ ओहिपर बहुत गोटएक नाम सेहो भेटइत अछि–जेना हरि, उमा भट्ट, नाग सिंह, सालिभद्र, धनहरि, उमापालित, वर्ग्ग, उग्रसेन, कृष्ण दत्त, सुखित, नागदत्त, गोण्ड, नन्द, वर्म्म, गौरिदास इत्यादि–इ सभ गोटए कुलिक छलाह। सार्थवाहमे डोड्डकक नाम आ श्रेष्ठिमे षष्ठिदत्त आ श्रीदासक नामक उल्लेख अछि। बेगूसरायसँ प्राप्त एकटा माँटिक मुद्रापर ‘श्री समुद्र’आ दोसरपर ‘सुहमाकस्य’ लिखल भेटइत अछि। वैशालीमे बैकिंग प्रथाकेँ चालू रखबाक श्रेय हिनके लोकनिकेँ छन्हि आ वैशाली व्यापारी एवँ सम्पत्तिधारी लोकनिक केन्द्र छल। एहि युगमे मैथिल लोकनि अपन आश्चर्यकारी साहसिक भावनाक परिचय देने छलाह।
उद्योग– व्यापारक स्थानीयकरणक कारण श्रेणीकेँ बल भेटल छलैक आ व्यापारक उत्कर्षक कारणे सेट्ठी लोकनिक उत्थान भेल छल। अपन संगठनकेँ मजबूत कऽ कए रखबाक आवश्यकता अहू लेल छलैक जे हुनका लोकनिपर कोनो–कोनसँ कोन प्रकार घातक आक्रमण नहि आ हुनका लोकनिक स्वार्थपर आँच नहि आबे। सामूहिकताक भावनासँ जे बल भेटइत छैक तकर अनुभव ओ लोकनिक लेने छलाह आ ओकर लाभकेँ देखि चुकल छलाह। हुनक संगठित शक्तिकेँ नजरअन्दाज आब शासको नहि कऽ सकैत छलाह। प्रत्येक व्यवसायक पृथक–पृथक संघ छल। मुग्ग–पक्क–जातकमे १८टा श्रेणी (गिल्ड)क उल्लेख अछि। रमेश मजुमदार २७टा श्रेणी (गिल्ड)क उल्लेख केने छथि। एकटा जातकमे मिथिलाक चारिटा श्रेणीक उल्लेख अछि। श्रेणी कैक प्रकारक अर्थ व्यवस्थाक सहायक छलः–
i)बैंकिंग प्रणालीकेँ जीवित राखब।
ii) सब तरह वस्तुकेँ न्यास रूपमे सुरक्षित राखब।
iii) कर्ज देबाक व्यवस्था करब।
iv) अपना क्षेत्रक अंतर्गतक भूमिक व्यवस्था करब।
v) राजस्व ओसुलीक काजमे सहायता देब।
vi)आपसमे सद्भावना बनाके राखब।
vii) अपना सदस्यक दिसि ठीका, पट्टा इत्यादि लेबाक व्यवस्था करब।
viii) बिक्री व्यवस्थाकेँ नियमित करब।
ix) अपना सदस्यकेँ अनुशासित राखब आ समय–समयपर सामयिक कर लगाएब।
x) सामूहिक कार्यक व्यवस्था करब।
xi)आवश्यक वस्तुजात पैदा करब।
xii) विज्ञापन प्रसारित करब।
xiii)आवश्यकता भेलापर स्थानीय तौरपर व्यवहारक हेतु सिक्का बाहर करब।
श्रेणीकेँ समाज आ राज्यमे प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त छलैक। जातकक अनुसार भाण्डागारिकक कार्यक्षेत्र श्रेणीक निरीक्षण धरि सीमित छल। श्रेणीक नियमक मान्यता राजाकेँ देमए पड़इत छलन्हि। प्राचीन कालक सामूहिक जीवनमे एकर विशेष महत्व छलैक आ जातकक अनुसार मिथिलामे सेहो श्रेणीबद्ध सामूहिक जीवनक प्रमाण भेटइत अछि।
व्यापार एवँ उद्योग:- अति प्राचीन कालसँ मिथिलामे उद्योग आ व्यापारक काफी प्रगतिभेल छल। मिथिला चारू कात नदीसँ घेरल अछिये आ तैं आवागमनक कोनो असुविधा कहियो रहबे नहि केलैक। विदेहसँ तक्षशिला धरि राजमार्ग बनले छल। जातक सभ तँ मिथिलामे उद्योग–व्यापार सम्बन्धी कथा सभसँ भरल अछि। विदेहमे बाहरोसँ व्यापारी अवइत छलाह आ चीज बिक्रय करबाक हेतु श्रावस्तीक व्यापारी वैशाली आ विदेह मुख्य व्यापारक मार्गपर छल। राजगृह, कौशाम्बी, पाटलिपुत्र, वैशाली, कुशीनगर, कपिलवस्तु, श्रावस्ती आ मिथिलाक बीच आवागमनक मार्ग प्रशस्त छल। कश्मीरसँ होइत गाँधार धरि मिथिलासँ सोझे एक सड़क अबइत छल जकरा मिथिलासँ उज्जैन, बनारस, चम्पा, ताम्रलिप्ति, कपिलवस्तु, इन्द्रप्रस्थ, शाकल, कुशावती, पाटलिपुत्र आदि स्थानक सड़कसँ सम्बन्ध छल। सामुद्रिक व्यापारकेँ इ लोकनि बड्ड महत्व दैत छलाह आ समुद्रमे चलए बला जहाजकेँ ‘वाहनम्’ कहैत छलाह। मैथिल लोकनि दक्षिणी चीनमे अपन एक साँस्कृतिक उपनिवेश सेहो बसौने छलाह आ ओतए किछु स्थानक नाम विदेह आ मिथिला सेहो रखने छलाह। रामायणमे वैशालीकेँ उद्योग व्यापारक केन्द्रक संगहि एकटा बन्दरगाह से कहल गेल अछि। चीन, तिब्बत आ नेपालक संग मिथिलाक व्यापारिक सम्बन्ध छल।
सूती कपड़ाक कारबार ताहि दिनमे मिथिलामे बेसी होइत छल। बौद्ध साहित्यक अध्ययनसँ एहि पक्षपर विशेष प्रकाश पड़इयै–तंतु, ताँती, तंतभण्ड, तंत–वित्थनम्आदि शब्द ताँतीसँ सम्बन्धित काजक संकेत दैत अछि। मिथिलाक ‘कोकटी’ अखनहुँ प्रसिद्ध अछि आ तखनहुँ प्रसिद्ध छल। एकर अतिरिक्त मिथिलाक मुख्य उद्योगमे अवइत अछि चीनी, तेल, हड्डीपर कैल काज, धातु उद्योग, चमड़ा उद्योग, माँटिक बर्तनक उद्योग, वेंत, तारक पातक बनल वस्तु, सिलाई–फराई, इत्यादि। जहिना आई इ सब वस्तुक हेतु मिथिला प्रसिद्ध अछि तहिना प्राचीन कालहुमे छल। कुसियारक चर्च तँ तेरहम शताब्दीक तिब्बती यात्री सेहो कएने छथि। ढ़ोल, बाजा, आ अन्यान्य छोट–मोट उद्योगक निर्माण सेहो मिथिलामे होइत छल। युद्ध कालीन अस्त्र–शस्त्र सेहो बनैत छल आ कहल जाइत अछि जे लिच्छवीक विरूद्ध युद्ध शुरू करबाक कालमे अजातशत्रु रथ मूसल आ ‘महाशील कांतार’ सन यंत्रक व्यवहार केने छलाह। लिच्छवी लोकनि कुंकुम आ सुगन्धित द्रव्यक व्यापार करैत छलाह। कमार लोकनि काठपर तरह–तरहक कलाकारी करइत छलाह आ पाथर धातुक माला सेहो बनबैत छलाह। माँटिक सौन्दर्यपूर्ण वासन आदि बनैत छल आ ओहिपर तरह–तरहक पालिश आ कलाकारी होइत छल। माँटिक बासन एकटा कारी चमकैत पालिश होइत छल जकरा “नादर्न ब्लैक पालिश्ड वेयर” कहल जाइत छलैक आ जे समस्त भारतमे एकर माँग छल। मिथिलाक विभिन्न क्षेत्रसँ इ प्रचुर मात्रामे प्राप्त भेल अछि।
मिथिलामे कपूर, चानन, नोन, रेशमी, ऊन, अफीम, कागज, सोना, तामा, पाथर, चूना, आदि वस्तु बाहरसँ मंगाओल जाइत छल। व्यापारिक दृष्टिकोणसँ मिथिलाक सम्पर्क पूबमे ताम्रलिप्ति आ पश्चिममे भरूकच्छसँ छलैक। मिथिलासँ सभ प्रकार अन्न, दलहन आदि वस्तु बाहर जाइत छल। फल फलिहारी से बाहर पठाओल जाइत छल। व्यापारक दृष्टिकोणे निम्नलिखित पथ महत्वपूर्ण छल–
i) मिथिला–राजगीर
ii) मिथिला–श्रावस्ती
iii) मिथिला–कपिलवस्तु
iv) विदेह–पुष्कलावती
v) मिथिला–चम्पा
vi) मिथिला–सिन्धु
vii) मिथिला–प्रतिष्ठान
viii) मिथिला–ताम्रलिप्ति
ix) मिथिला–नेपाल–तिब्बत
स्थल मार्गक अतिरिक्त इ लोकनि समुद्र मार्गक व्यवहार सेहो करैत छलाह। गण्डकसँ गंगा आ चम्पाक मार्ग बाटे इ लोकनि ताम्रलिप्ति धरि पहुँचैत छलाह आ ओहिठामसँ सुवर्ण भूमि आ अन्यान्य स्थानपर जाइत छलाह। जातकक कथासँ इ ज्ञात होइछ जे सिन्धुक घोड़ाक व्यवहार मिथिलामे होइत छल आ सिन्धुक सम्पर्क भेलासँ मिथिलाक व्यापारिक सम्बन्ध पश्चिमोसँ घनिष्ट हैव बुझि पड़इयै। भारतक व्यापारी लोकनि वेविलोन धरि जाइत छलाह तैं संभव जे मैथिल व्यापारी सिन्धु बाटे आन व्यापारी सब संग ओम्हर जाइत होथि। प्रशस्त स्थल आ समुद्र मार्गक कारणे मिथिलाक व्यापारिक प्रगति अपन उत्कर्षपर छल आ जातक एकर सबूत अछि। (एहि विषयपर विस्तृत अध्ययनक हेतु देखु–मुहम्मद अकीकक लिखल–“इकोनौमिक हिस्ट्री आफ मिथिला”)।
मौर्य युगकेँ मंगलकारी राज्यक युग कहल गेल छैक। एहि युगमे जनताक सर्वांगीण आर्थिक जीवनक नियंत्रण राज्यक माध्यमसँ होइत छल। खान इत्यादिपर राज्यक प्रभुत्व छल। राज्यक जमीन आ कृषि कार्यक निरीक्षणक हेतु अधीक्षक नियुक्त होइत छलाह। राज्यक प्रत्येक विभागक हेतु अलग–अलग निरीक्षक रहैत छलाह। राज्यक दिसिसँ कृषिकेँ विशेष महत्व देल जाइत छलैक आ जनकल्याणकेँ ध्यानमे राखि इ स्वाभाविको छल। बंजर जमीन सभमे खेती करबाक हेतु शूद्र लोकनिकेँ बसाओल जाइत छलैक। पुरोहित आ विद्वान ब्राह्मण लोकनिकेँ दानमे जमीन भेटइत छलैक। सिंचाई–पटौनी आ मालक व्यवस्था राज्यक दिसिसँ होइत छलैक। प्राकृतिक उपद्रवसँ बचबाक हेतु राज्यक दिसिसँ सब प्रबन्ध होइत छल। गाम सभमे सहयोग समितिक व्यवस्था सेहो छल आ केओ एहिमे सम्मिलित नहि होइत छलाह हुनका दण्डित कैल जाइत छल। उद्योग, व्यापार आ वाणिज्य सेहो प्रगतिक पथपर छल। प्रशस्त राजमार्गक व्यवस्थासँ व्यापारक प्रगतिमे सहायता भेटइत छलैक। बाजारमे निर्धारित मूल्यपर सब वस्तुक बिक्री होइत छल आ मूल्य नियंत्रण आ वेतन निर्धारणक सिद्धांतक प्रतिपादन आइसँ २३००वर्ष पूर्व कौटिल्य केने छलाह। जे केओ राज्यकर देबामे असमर्थ छलाह हुनका ओहि बदलामे बेगारी करए पड़ैत छलन्हि। व्यापारीकेँ पूर्ण मात्रामे कर देमए पड़इत छलन्हि।
गुप्त युगमे कोनो विशेष परिवर्त्तन देखबामे नहि अवइयै। कृषि, उद्योग, व्यापारक प्रगति अहुयुगमे भेल। वैशालीसँ प्राप्त मुद्रा एहि युगक आर्थिक जीवनपर प्रकाश दैत अछि। फाहियान आ हियुएन संगक यात्रा विवरणसँ इ ज्ञात होइछ जे मिथिलाक आर्थिक अवस्था ओहि युगमे बेजाय नहि छल। एहि युगमे सामंतवादी प्रथाक विकास भेल। लोककेँ आब जमीन्दारी प्रथाक अनुभव होमए लागल छलन्हि। जनताक विशिष्ट समूह अहुखन गामेमे बसैत छल आ कृषि आजीविकाक प्रधान आधार छल। ‘कर’क मात्रामे हेर–फेर आब जमीनक अनुसारे हैव प्रारंभ भेल। जाहिठाम पटौनीक व्यवस्था छल ताहिठाम कर बेसी लगैत छलैक आ वंजर जमीनक कम। हियुएन संगक अनुसार एहिठामक किसान परिश्रमी होइत छलाह आ अधिक अन्न उपजबैत छलाह। जमीन मूलरूपसँ तीन भागमे बाँटल जाइत छल–
i) गोचर–जाहिमे भिन्न प्रकारक घास उपजैत छल।
ii) बंजर–कोनो प्रकारक उपजा नहि होइत छल।
iii) उपजाऊ।
हाटक व्यवस्था सेहो प्रारंभ भऽ गेल छल। हाटक निरीक्षणक हेतु ‘हट्टपति’ नामक एकटा अधिकारी सेहो नियुक्त होइत छलाह। ब्राह्मणआ क्षत्रियकेँ कर रहित जमीन दानमे भेटइत छलन्हि। एहि युगमे जमीन छोट–छोट टुकड़ामे बँटि चुकल छल। भूमि नापबाक प्रणाली प्रचलित भऽ चुकल छल आ गुप्तयुगमे एकरा कुलवाप्य कहल जाइत छल। अन्न नापबाक प्रणाली सेहो प्रचलित भऽ चुकल छल आ ओकरा ‘द्रोण’ कहल जाइत छलैक। खेतीबारी हरसँ होइत छल।
एहि युगमे व्यापारक प्रगति सेहो खूब भेल छल। एहियुगमे बहुतो गोटए मिथिलासँ काशी जाइत छलाह। सिक्काक रूपमे कौड़ीक प्रचलन सेहो भऽ चुकल छल। लहना–तगादाक वेश बढ़ल–चढ़ल छल आ सूदक दर ९% सँ १२% धरि छल। भोजन वस्त्रक सामग्री एकठामसँ दोसर ठाम पठाओल जाइत छल। कैक प्रकारक आभूषण बनाओल जाइत छल। एक स्थानसँ दोसर स्थान सामान बैलगाड़ी आ नावपर पठाओल जाइत छल। आ सभपर चूंगीकर सेहो लगैत छलैक। एक बैलगाड़ीपर बीस बोझसँ बेसी सामान लदलासँ दू टाका शुल्क लगैत छल। किराना वाला बैलगाड़ीपर एक टाका शुल्क लगैत छल। कथा सरित्सागरसँ ज्ञात होइत अछि जे काशीक चारूकात रस्ताक जाल बिछाओल छल। पुण्ड्रवर्द्धनसँ पाटलिपुत्र धरि मिथिले बाटे रस्ता छल। एहि सबसँ स्पष्ट होइछ जे प्राचीन मिथिला सब तरहे सम्पन्न छल। आ देश–विदेशसँ ओकर सम्पर्क बनल छलैक। सामान्य मनुक्खक जीवनमे कोनो विशेष परिवर्त्तन नहि भेल छलैक। धनी लोकनि अपना धनकेँ गारिकेँ रखैत छलाह।
मध्ययुगीन मिथिलाक आर्थिक इतिहासक जनबाक हेतु साधनक अभाव अछि तथापि तत्कालीन साहित्यक अध्ययनसँ हमरा लोकनिकेँ पर्याप्त ज्ञान प्राप्त होइछ। ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकरमे एहि युगक आर्थिक स्थितिक विवरण भेटइत अछि। ओहि ग्रंथसँ इ प्रतीत होइछ जे ताहि दिनमे मिथिलाक ग्रामीण स्वर प्राञ्जल भऽ उठल छल। चाउर, जौ, विभिन्न प्रकारक दालि, बाजरा, मटर, तेलहन, कुसियार, रूई, पिआज, लहसून, दाना इत्यादि मिथिलामे प्रचुर मात्रामे उपजैत छल। चूड़ा आ चाउरक भूजाक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। सोआ, मेथी, मंगरैल आ सोंफक खेती सेहो होइत छल। आम, खजूर, नेमो, नारंगी, अनार, अंजीर, जामून, कटहर, सपाटु, लताम, पपीता आदि फलक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। चूड़ा दहीक प्रथा विशेष प्रचलित छल। अन्न रखबाक हेतु बखारी बनैत छल। चीनी आ गूड़क प्राचुर्य छल। एहिठामसँ मधु नेपाल जाइत छल। ताड़ी–दारू सेहो बनैत छल। महुआक दारू बड्ड प्रचलित छल। पानक बड़का व्यवसाय मिथिलामे होएत छल। पान लगेबाक विधिपर ज्योतिरीश्वरतँ विभिन्न प्रकारक विधानो बतौने छथि। ओहिमे तरह–तरहक मशाला पड़इत छलैक आ ओ सभ मशाला देशक विभिन्न भागसँ मँगाओल जाइत छलैक।
तीस प्रकारक वस्त्रक वर्णन ज्योतिरीश्वर स्वयं कएने छथि। दामी वस्त्रक अंगपोछा बनैत छल। ओ रंगरेज आ मुशहरीक उल्लेख सेहो कएने छथि। विभिन्न प्रकारक धातुसँ अनेकानेक प्रकार बासन–बर्त्तन बनैत छल। वर्णरत्नाकरमे अष्ट धातुक उल्लेख सेहो भेल अछि लोहा आ अन्यान्य धातु गलेबाक कलामे मैथिल निपुण होइत छलाह। एहिठामक लोहार लोहा गलाकेँ हर, खुरपी, कैंची, चक्कू, कुरहड़ि आदि बनबैत छलाह। खपरैल घरक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। कमार लोकनि काठक अनेको वस्तु बनबैत छलाह। ज्योतिरीश्वर ३६प्रकार शस्त्रास्त्रक उल्लेख केने छथि।
वर्णरत्नाकरसँ ज्ञात होइछ जे मैथिल लोकनि तंजोर, सिलहट, अजमेर, काँची, चोलप्रदेश, कामरूप, बंगाल, गुजरात, काठियावाढ़, तेलंगना, आदि स्थान सभसँ अपन वस्त्र मंगबैत छलाह। ओहिमे श्रीखण्ड, मलय आ सूरतक उल्लेख सेहो अछि। नाव बनेबामे मैथिल लोकनि सिद्धहस्त छलाह। एकर विवरण धर्मस्वामी सेहो उपस्थित केने छथि। नाव सबमे सिंह, बाघ, घोड़ा, बत्तक, साँप, माँछ आदिक चेन्ह रहैत छल। नाव बनेबामे मैथिल लोकनि अपन सौन्दर्यबोधक परिचय दैत छलाह।
स्वास्थ्यपर सेहो विशेष ध्यान देल जाइत छल। मिथिला ताहिदिनमे दूध दहीक हेतु प्रसिद्ध छल आ ओहिठाम लोग स्वस्थ होइत छल। देहक श्रृंगारक संग देहक सेवाक विन्यास सेहो छल। देह मालिश कएनिहारकेँ मरदनिया कहल जाइत छलैक। भोजनमे गरम मशालाक प्रयोग होइत छल। आ शरीरक सौन्दर्यक हेतु अगुरू, कर्पूर आदिक व्यवहार प्रचुर मात्रामे होइत छल। जीवनक एहन कोनो अंश अथवा सौन्दर्य सामग्रीक एहेन कोनो अवयव नहि जकर उल्लेख वर्णरत्नाकरमे नहि हो। पंचशायकमे एक दिसि स्त्रीक प्रसाधनक सभ विषयक वर्णन अछि तँ दोसर दिसि परिवार नियोजन आ गर्भ निरोधक तकक विधि लिखल अछि। कामसूत्रसँ कोनो अंशमे एहि ग्रंथक महत्व कम नहि अछि। ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकर, पंचशायक आ विद्यापतिक कीर्तिलता एवँ लिखनावली पढ़लासँ बहुत बातक ज्ञान होइछ।
विद्यापतिक लिखनावलीसँ इ ज्ञात होइत अछि जे राजस्वकर सेहो वसूल होइत छल। भूमि नपबाक उल्लेख सेहो ओहिमे अछि। दानपत्रक सूची सेहो राखल जाइत छल। एहि ग्रंथमे ऋण–पत्र, खेती–व्यवस्थापत्र, बन्धकी–व्यवस्थापत्र आदिक विवरण भेटइत अछि। दानवाक्यावलीमे राहरि, साठी आ लतामक चर्च अछि आ ओहिमे कैक प्रकारक वस्त्रक उल्लेख सेहो भेल अछि–कार्पासिक वस्त्र, समेम वस्त्र, क्षौम वस्त्र, कौशेय वस्त्र, कुश वस्त्र, कृमिज वस्त्र, मृगलोमजवस्त्र, वृक्षावक् संभव वस्त्र आ आविक वस्त्र। कीर्तिलतामे बाजार, हाट, नगर, आदिक विशिष्ट वर्णन अछि। बजारमे पनहट्टा, धनहट्टा, सोनहट्टा, पकवानहट्टा, मछहट्टा इत्यादिक उल्लेख अछि। ओहि ग्रंथमे दरिद्रताक उल्लेख सेहो अछि। तत्कालीन दरिद्रताक विवरण ओहिमे अछि। कीर्तिपताकामे विद्यापति कहने छथि जे राजाक मुख्य कर्त्तव्य होना चाही दरिद्रताकेँ खतम करब। ऋणक उल्लेखो कीर्तिलतामे अछि आ दरिद्रताक विवरण तँ पदावलीक कतेको गीतमे। आर्थिक इतिहासक दृष्टिकोणसँ इ युग अखनो एकटा विशिष्ट अध्ययनक अपेक्षा रखइयै कारण ने तँ उपेन्द्र ठाकुर आ ने मोहम्मद अकीक एहि कालपर कोनो प्रकाश देने छथि। थोड़ बहुत विवरण हम मिथिला इन द एज आफ विद्यापतिमे कैल अछि। मुसलमानी प्रसारसँ आर्थिक जीवनक रूपरेखामे सेहो थोड़ेक परिवर्त्तन भेलैक मुदा तइयो मैथिल अपन कट्टरताक कारणे आन प्रांतक अपेक्षा एहिठाम अपनाकेँ फराके रखलन्हि आ अपन विधि–विधानकेँ यथाशक्ति सुरक्षित सेहो।
मुसलमानी शासन कालमे मिथिलाक आर्थिक जीवनमे कोनो विशेष उल्लेखनीय प्रगति नहि भेलैक अपितु स्थिति यथावते रहलैक। शाहजहाँक समयमे जखन समस्त भारतमे अकालक स्थिति उत्पन्न भेलैक तँ मिथिलो ओहिसँ वाँचल नहि रहल। कास्तकार आ सामान्य किसानक स्थिति बड्ड दयनीय भऽ गेलैक। तिरहूतमे ताहि दिनमे बंजारा लोकनिक उपद्रव जोरपर छल। बरनिअरक यात्रा विवरणसँ ज्ञात होइछ जे बंजारा समस्या उभरिकेँ ऊपर आएल छल आ ओकरा दबेबाक हेतु संगठित प्रयास भऽ रहल छल। कृषक लोकनिक स्थिति बदत्तर भऽ गेल छल आ औरंगजेबक परोक्ष भेलापर तँ स्थिति आर चिन्तनीय आ दयनीय भऽ गेल छल। भारतमे अंग्रेज आ अन्यान्य विदेशी लोकनिक कारबार आ व्यापार शुरू भऽ गेल छल आ शोषण प्रक्रियामे एकटा नव गति आबि गेल छलैक। १७५७मे पलासीक लड़ाईक बादक स्थितिकेँ भारतीय अर्थनीतिक इतिहासमे अंधकारपूर्ण कहल गेल अछि। अंग्रेज, मुसलमानी अमला–फैला, हिन्दू–जमीन्दार, बंजारा, सन्यासी सभ मिलिकेँ जनताकेँ लूटबामे लागल छल आ संगहि अपन–अपन जेबी गरम करबामे। देशक चिन्ता ककरोनहि छलैक। चारूकात हाहाकार आ अकालक स्थिति छल। १७५७क पछातिमे मिथिलामे बरोबरि अकाल पड़इत रहल। बेकारीक समस्या उत्पन्न भऽ गेल। कृषि आ उद्योगक स्थिति दिन–प्रतिदिन खसए लागल। तिरहूतक गामक गाम उजार होमए लागल।
१७७०मे बड़का अकाल पड़ल आ ओहिठामक लोग खेती बारी छोड़िकेँ पड़ाए लागल। ओहि वर्षमे दरभंगाक विशेष भागमे चासक कोनो काज नहि भऽ सकल आ स्थिति एहेन भऽ गेल जे १७८३मे दरभंगाक कलक्टर एहि आशयक प्रस्ताव रखलन्हि जे अवध प्रांतसँ खेतिहर मंगाकए दरभंगामे खेतीक व्यवस्था कैल जाइक। एहि अकालक कारण मुजफ्फरपुरक कलक्टरीसँ प्राप्त कागज सभसँ ज्ञात होइछ। हाजीपूरसँ पुर्णियाँ धरि अभूतपूर्व अकाल पड़ल छल। एकर मुख्य कारण इ छल जे सरकार अकारण सभ बातमे हस्तक्षेप करैत छल, आवागमन एवँ यातायातक असुविधा छल आ ताहि दिनमे केओ एहेन योग्य नेता नहि छलाह जे एहि सभहिक निराकरणक कोनो प्रयास करितैथि। एहेन अराजक स्थितिमे जकरा जतए जे हाथ लगैक से सैह करे आ जमीन्दारी अत्याचार आ शोषणक तँ कोनो कथे नहि छल। १७८२मे बाध्य भऽ कए इ नियम बनबे पड़लैक जे बिना अंग्रेजी सरकारक अनुमतिकेँ केओ जमीन्दार अपन जमीनकेँ एम्हर–ओम्हर नहि कऽ सकइयै। वार्थहस्ट्र साहेब १७८७मे तिरहूतक शासक भेला। दरभंगाक महाराज आ इस्ट इण्डिया कम्पनीक बीच एहि प्रश्नकेँ लऽ कए बरोबरि झंझट होइते रहलन्हि (देखु–हमर ‘द खण्डवलाज आफ मिथिला’)। स्थिति एहेन विभत्स भऽ गेल छल जे परगन्ना पचही, आलापुर आ भौरमे किछु उपजावारी नहि होइत छल आ इ सभ जंगलमे परिवर्त्तित भऽ गेल छल। एहि सभ क्षेत्रमे जंगली जानवरक वास भऽ गेल छल। अंग्रेजकेँ अपन राज्यक सुरक्षाक चिंता छलन्हि आ जमीन्दार लोकनिकेँ अपन सम्पत्तिक आ बीचमे पिसाइत छल दरिद्र जनता जकरा हेतु चारूकात अन्हारे अन्हार छलैक। सरकार आ जमीन्दारक अतिरिक्त महाजन लोकनि सेहो निर्दय भऽ कए जनताक पसीनाक कमाई छीन लैत छलैक।
मानव–कृत शोषण यंत्रकेँ साहाय्य देनिहार प्रकृति सेहो छलैक। अतिवृष्टि आ अनावृष्टि तँ अपन रूप देखिबते छल आ ताहिपर नदीक बाढ़ि तँ अपन नङटे नाच देखिबते छल। मिथिलामे नदीक तँ अभाव अछि नहि आ प्रति वर्ष एकर बाढ़ि अखने जकाँ ताहि दिनमे अबैत छल। गंगा, गण्डक, वाग्मती, कमला, कोशी, बलान, करेह, लखनदै आदि नदीक बाढ़ि बरसातमे तीन मास धरि मिथिलाकेँ समुद्रमे बदैल दैत छलैक जाहिसँ एकर आर्थिक जीवन अस्त–व्यस्त भऽ जाइत छलैक। कोशीकेँ तँ सहजहि ‘दुखक नदी’ कहले गेल अछि। एहिसँ सब फसिल नष्ट भऽ जाइत छल, महामारीक प्रकोप बढ़ैत छल आ आवागमन एवँ यातायातक सुविधा लुप्त प्राय भऽ जाइत छल। एहना स्थितिमे बरोबरि अकाल हैव स्वाभाविके–१५५५सँ १९७५धरि मिथिलामे कतेको बेर अकाल पड़ल अछि आ महामारीक प्रकोप बढ़ल अछि–१५७३–७४, १५८३–८४, १५व९५–९६, १६३०, आ अंग्रेजक समय १७७०सँ १९००क बीच १५–२०बेर अकालक दर्शन लोककेँ भेल छलैक। १६३०क अकाल तँ अद्वितीय छल। ओहि साल मिथिलासँ बहुत रास लोगकेँ दोसर ठाम चल गेल छल। मिथिलामे बाढ़ि तँ वार्षिक क्रम जकाँ अबैत अछि आ एहेन शायद कोनो वर्ष होएत जाहिमे बाढ़ि नहि आएल हो। बाढ़ि आ अकाल मिथिलाक आर्थिक इतिहासक एकटा अभिन्न अंग मानल जाइत अछि।
१७७०क अकाल मिथिलाक इतिहासमे अद्वितीय छल आ मिथिलाक जनसंख्या घटिकेँ एक दम्म कम्म भऽ गेल छल। १८७३–७४मे पुनः एकटा ओहने अकाल मिथिलामे भेल छल जकर विवरण हमरा फतुरी लाल कविक अकाली कवितसँ भेटइयै–अकाली कवित अप्रकाशित अछि। अकालकेँ दूर करबाक हेतु आ मजूरकेँ राजे देबाक हेतु ताहि कालकेँ रेलगाड़ीक योजना चलाओल गेल जकरा सम्बन्धमे फतुरीलाल लिखैत छथि–
“कम्पनी अजान जान कलनको बनाय शान।
पवन को छकाय मैदानमे धरायो है॥
छोड़त है अड़ादार बड़ा बीच धाय–धाय।
सभेलोग हटाजात केताजात खड़ा है॥
तारकी अपारकार खबरि देत वार वार।
चेत गयो टिकसदार रेल की उवाई है॥
करत है अनोर शोर पीछे कत लगत छोर।
जोर की धमाक से मशीन की बड़ाई है॥
कम्पूसन पहरदार कोथी सब अजबदार।
कोइला भर करल कार धूआँसे उड़ायो है॥
बाजा एक बजन लाग हाथी अस।
पिकन लाग जैसा जो चढ़नदार वैसाधर पायो है॥
गंगाकेँ भरल धार उतरि गयो फतूर पार गाड़ीकी।
अजबकार कवित्त यह बनाया है”॥
अकाल, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़ि, अभाव, एवँ प्राकृतिक प्रकोपसँ मिथिलाक आर्थिक जीवन परम्परागत रूपें प्रभावित रहल अछि आ अहुखन अछिये।
अंग्रेजक अमलमे आबिकेँ जखन रेलगाड़ीक सुविधा बढ़ल आ आवागमन एवँ यातायात आ संचार व्यवस्थामे सुधार भेल तखन मिथिलाक आर्थिक इतिहासक रूपरेखामे परिवर्त्तन हैव स्वाभाविक भऽ गेल। उद्योग आ व्यापारक प्रगति सेहो भेल परञ्च ओकरा अखनो पर्याप्त नहि कहल जा सकइयै। प्राचीन कालहि मिथिलामे उद्योग–व्यापार विकसित अवस्थामे छल आ मध्य कालक विशिष्ट भागमे एकर से स्थिति बनल रहलैक मुदा इस्ट–इण्डिया कम्पनीक समयमे आबिकेँ एहिमे थोड़ेक ह्रास अवश्य भेलैक। खाद्य सामग्रीक अतिरिक्त मिथिलाक क्षेत्रमे कुसियार, तम्बाकु आ पाट आ मिरचाई बेस मात्रामे उपजैत अछि एहि लऽ कए मिथिलाक व्यापारो अछि। सब प्रकारक खादीक कपड़ा सेहो एहिठाम बनैत अछि। कोकटीक हेतु तँ मिथिला सर्वप्रसिद्ध अछिये। मिथिलामे व्यापारक प्रसिद्ध केन्द्र छल–हाजीपुर, लालगंज, बगहा, गोविन्दपुर, सतराघाट, दरभंगा, कमतौल, खगड़िया, रोसरा, पूसा, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, रानीगंज, नबाबगंज, नाथपुर, साहेबगंज, राजगंज, रामपुर, अलीगंज, खबासपुर, दुलालगंज, कलियागंज, देवगंज, किसनगंज, बहादुरगंज, बारसोई, बेगूसराय, तेघड़ा, दलसिंहसराय इत्यादि। एहिमे नाथपुर तँ अंतराष्ट्रीय व्यापारक मुख्य केन्द्र छल जाहिठाम प्रचुरमात्रामे नेपाली लोकनि सामान लऽ कए अबैत छलाह आ एहिठामसँ सामान लऽ कए जाइत छलाह। अंग्रेजक अमल धरि नाथपुर एक प्रख्यात व्यापारिक केन्द्र छल। १८३६ नारेदिगर आ नाथपुरक सर्वेक्षण अंग्रेज द्वारा कैल गेल जकर रेकर्ड सम्प्रति सुरक्षित अछि। सिन्दूर, कागज, आ अफीमक व्यापार बेस होइत छल। अफीमक कारखाना विदुपुर, लालगंज, दरभंगा, वैगनी नवादा, आदि स्थानमे छल। पाटक कारबार पुर्णियाँ आ सहरसामे सबसँ बेसी होइत छल आ नीलक सम्बन्धमे पूर्ण विवरण हम पूर्वहिं दऽ चुकल छी।
एतवा होइतहुँ मिथिलामे २०म शताब्दीमे कोशीक प्रकोपक बढ़लासँ आर्थिक स्थिति दयनीय भऽ गेल छल। रेलमार्ग सबटा टूटि फाटि गेल, गामक गाम उजरि गेल छल। नाथपुरक व्यापारिक महत्व नष्ट भऽ गेल छल आ जे प्राचीन उपलब्धि आर्थिक दृष्टिकोणे मिथिलाक छल से आब इतिहासक वस्तु बनिकेँ रहि गेल। राष्ट्रीय आन्दोलन आ स्वदेशीक पुनरूत्थानक क्रममे कोकटीक हेतु प्रसिद्ध तिरहूत (मिथिला)केँ पुनः अखिल भारतीय खादीक प्रधान केन्द्र बनाओल गेल आ मधुबनीमे एकर मुख्यालय राखल गेल। बहुत गोटएक गुजर एखनो एहिसँ चलि रहल अछि। १९५५मे कोशीकेँ बन्हबाक प्रयास भेल आ वीरपुरमे कोशी बैरेजक निर्माण भेलासँ दरभंगा, सहरसा, पूर्णियाँ आ उत्तर मूंगेर आ भागलपुर पूर्णतः लाभान्वित भेल अछि। मिथिलामे आ सब नदीकेँ जँ बान्हल आ नियंत्रित कैल जाइक तँ मिथिलाक आर्थिक स्थितिक रूप रेखा बदलि जेतैक। पूर्णियाँ–सहरसा जतबे कष्ट कोशीक कारणे भोगने छल अखन ततबे सुभ्यस्त आ सम्पन्न भऽ गेल अछि। स्वर्गीय ललित नारायण मिश्र जखन रेल मंत्री बनलाह तखन ओ एहि सभ क्षेत्रक टुटल फाटल रेलवे लाइनकेँ चालू करौलन्हि। एहिसँ एहि क्षेत्रक आर्थिक विकासक संभावना आ बढ़ि गेल आ दुर्भाग्यक गप्प इ एहने एक लाइनक उद्घाटनक हेतु जखन ओ ०२/०१/७५केँ समस्तीपुरमे पहुँचलाह तँ ओतए एक संदिग्ध स्थितिमे बम बिस्फोटक कारणे मारल गेलाह।

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